बिजनेस स्टैंडर्ड - सक्षम राज्य कर सकते हैं किसानों का कर्ज माफ
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सक्षम राज्य कर सकते हैं किसानों का कर्ज माफ

एके भट्टाचार्य /  12 25, 2018

हासिल कर लिया जाएगा विनिवेश लक्ष्य और गैर-कर राजस्व लक्ष्य

बिजनेस स्टैंडर्ड सक्षम राज्य कर सकते हैं किसानों का कर्ज माफआकाशवाणी के समाचार सेवा प्रभाग के लिए बिज़नेस स्टैंडर्ड के एके भट्टाचार्य को दिए गए साक्षात्कार में केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने यह भी कहा कि इस साल विनिवेश के लक्ष्य और गैर-कर राजस्व के लक्ष्य को हासिल कर लिया जाएगा। उन्होंने ताजा राजस्व आंकड़ों पर चिंता जताई जिनके मुताबिक दूरसंचार, उड्डयन और रियल एस्टेट क्षेत्रों के कमजोर प्रदर्शन के कारण वस्तु एवं सेवा कर में सेवा कर की हिस्सेदारी में कमी आई है। उन्होंने कहा कि बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के ताजा दौर का मकसद बैंकों को आरबीआई की त्वरित उपचारात्मक कार्रवाई व्यवस्था में जाने से रोकना है। संपादित अंश: 

भारतीय अर्थव्यवस्था की तीन सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं?  

चुनौतियां लगातार बदल रही हैं। अगर आपने यह सवाल मुझसे दो महीने पहले पूछा होता तो मैं कहता कि तेल की कीमतें प्रमुख समस्या है। लेकिन लगता है कि फिलहाल हम उस दौर से निकल चुके हैं। इसलिए चालू खाते के घाटे पर इसका प्रभाव कम हुआ है। चालू खाता अब भी घाटे की स्थिति में है लेकिन शायद यह उतना अहम नहीं रह गया है जितना हमने दो महीने पहले सोचा था। व्यापार युद्घ का भारत में कोई बहुत ज्यादा असर नहीं है। शुरुआत में हम पर डॉलर के मजबूत होने का असर पड़ रहा था। लेकिन अब लगता है कि हम उस स्थिति से उबर गए हैं। इसलिए अगर अमेरिकी बाजार ढहते हैं तो हम पर उतना असर नहीं होगा।

अब कृषि क्षेत्र को मजबूत करने, उसमें निवेश लाने और उसे लाभकारी बनाने की चुनौती है। भारत अब भी ऐसे दौर में है जहां वह लोकलुभावन और नीति के बीच संघर्ष कर रहा है। पिछले तीन-चार साल से निजी निवेश एक बड़ी चुनौती बना हुआ था लेकिन पिछले एक साल के दौरान इसमें उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

विभिन्न क्षेत्रों पर नजर डालने पर अलग तरह की समस्या नजर आती है। उदाहरण के लिए जब हम राजस्व की स्थिति देखते हैं तो जीएसटी में सेवा कर की हिस्सेदारी में उल्लेखनीय कमी आई है। पहले सेवा कर का एक बड़ा हिस्सा दूरसंचार क्षेत्र से आता था। गलाकाट प्रतिस्पर्धा से शुल्क में कमी आई है और कर संग्रह भी प्रभावित हुआ है। विमानन क्षेत्र में भी यही स्थिति है। रियल एस्टेट में मंदी आई है, जो एक अलग समस्या है। पिछले दो महीने से वाहनों की बिक्री में ठहराव का भी असर पड़ा है। इन चार क्षेत्रों को छोड़ दिया जाए तो राजस्व के मोर्चे पर सबकुछ सही है। 

कृषि संकट से निपटने के लिए क्या नीतिगत व्यवस्था होनी चाहिए? 

मेरा मानना है कि नीतिगत व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिससे किसानों की आय में बढ़ोतरी हो। खेती और किसानों के जीवनस्तर में सुधार के लिए सरकार को हरसंभव मदद दी जानी चाहिए। आपको उनकी जिंदगी आसान बनानी होगी और खेती को लाभकारी बनाना होगा। इसके एक हिस्से को हम प्रभावकारी ढंग से आगे बढ़ा रहे हैं। हम गांव में जीवन स्तर में सुधार ला रहे हैं। उन्हें मकान, शौचालय, बिजली, सड़कें और गैस सिलिंडर दिए जा रहे हैं। इसका दूसरा हिस्सा सिंचाई में निवेश, किसानों को कम से कम ब्याज दर पर ऋण की उपलब्धता और खेती से जुड़े सामान को किफायती दर पर उपलब्ध कराने से जुड़ा है। अगर सरकार सक्षम हो तो खरीद समर्थन या आय समर्थन पर विचार किया जाना चाहिए।

आपने आय समर्थन योजना की बात की। क्या आपका इशारा किसानों के लिए सार्वभौमिक मूल आय की तरह की व्यवस्था लाने की तरफ है? कर्ज माफी पर आपकी क्या राय है? 

जहां तक सार्वभौमिक मूल आय (यूबीआई) का सवाल है तो मेरा मानना है कि जब भारत की राजनीति परिपक्व होगी और असली मुद्दों को समझेगी, तो वह उस दिशा में आगे बढ़ेगी। लेकिन मुझे लगता है कि आज अगर आप सब्सिडी की जगह इसे लाए तो तभी यह काम कर सकता है। देश की राजनीति कहेगी कि हमें दोनों चाहिए। लेकिन कोई भी व्यवस्था इसे वहन नहीं कर सकती। अगर राज्य सरकारें कर्ज माफी का फैसला करती हैं और वे इसे वहन करने में सक्षम हैं तो वे ऐसा कर सकती हैं।

लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि अगर किसानों ने कर्ज का भुगतान बंद कर दिया तो सरकार को भुगतान करना होगा। अगर राज्य के पास भुगतान करने की क्षमता नहीं है तो फिर ऋण चक्र टूट सकता है। इसलिए किसान कर्ज माफी की घोषणा करने वाले हर राज्य को यह सुनिश्चित करना होगा कि कर्ज चक्र न टूटे। अगर बैंकों को इस साल उनका पैसा वापस नहीं मिलता है तो अगले साल की फसल के लिए वे कैसे ऋण दे सकते हैं? 

क्या राष्ट्रीय स्तर पर किसान कर्ज माफी की गुंजाइश है?

अभी राजकोषीय घाटे की स्थिति तंग है। मैं अभी इस पर टिप्पणी करने की स्थिति में नहीं हूं। अगर राज्य के पास गुंजाइश है तो वे किसानों का कर्ज माफ करने के लिए स्वतंत्र हैं। 

क्या आप करीब 7.5 फीसदी की मौजूदा विकास दर से खुश हैं। रोजगार में कम वृद्घि का मुद्दा भी इससे जुड़ा है। 

दुनिया हमारी विकास दर को अच्छा मानती है। लेकिन हमने उम्मीदों में बदलाव किया है। हम चाहते हैं कि यह आठ फीसदी से ऊपर जाए। अगर ऐसा हुआ तो यह अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में दिखना शुरू होगा और रोजगार में भी बढ़ोतरी होगी। 

क्या राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.3 फीसदी पर का लक्ष्य हासिल हो जाएगा? 

800 अरब रुपये का विनिवेश लक्ष्य आसानी से हासिल हो सकता है। मुझे नहीं लगता है कि गैर-कर राजस्व में कोई कमी होगी। प्रत्यक्ष कर के मोर्चे पर हम लक्ष्यों को पार करने की स्थिति में हैं। अप्रत्यक्ष कर के मामले में हमें यह याद रखना चाहिए कि हम जीएसटी के 18वें महीने में हैं और हमने केंद्र और राज्यों के लिए कठिन लक्ष्य रखे थे। करीब आधे राज्यों में इस लक्ष्य को हासिल कर लिया है या इसके करीब हैं। 15 राज्य लक्ष्य से 10 से 30 फीसदी दूर हैं। जीएसटी के तीन-चार साल में कई और राज्य इसके करीब पहुंच जाएंगे। पिछले वित्त वर्ष का औसत मासिक संग्रह 890 अरब रुपये रहा था। इस साल यह 970 से 980 अरब रुपये रहा है। यह अब भी 8 प्रतिशत अधिक है। इसमें शक नहीं कि इस साल जीएसटी लक्ष्य पूरा नहीं हो पाएगा। इसकी भरपाई विनिवेश या प्रत्यक्ष कर से हो पाएगी या खर्च में कमी करने से काम बनेगा यह देखना होगा। हम इस पर निगरानी रख रहे हैं और मुझे पूरा भरोसा है कि हम 3.3 प्रतिशत के आस-पास होंगे।  

भारत में करदाताओं के नियम अनुपालन को लेकर आप क्या सोचते हैं?

भारत में कर अनुपालन का लेखा-जोखा खराब रहा है। मुझे लगता है कि पिछले कुछ सालों के दौरान कर अनुपालन सुधरा है और अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने के लिए हमने कई कदम उठाए हैं। पिछले पांच सालों में आय करदाताओं की संख्या में दोगुना इजाफा हो गया है। जीएसटी पर भी इसका असर हुआ है। कई लोगों ने स्वयं को जीएसटी के तहत पंजीकृत कराया है और सभी अपना लेखा-जोखा नहीं दे रहे हैं। कई लोग कारोबार का लेखा-जोखा तो दे रहे हैं, लेकिन कर भुगतान नहीं कर रहे हैं। इससे कम से कम हमें उनके कारोबार का तो पता जरूर चल रहा है। आधार बढऩे से कम से कम भविष्य में व्यवहार में बदलाव जरूर आएगा।

पिछले कुछ महीनों से आरबीआई के साथ सरकार के संबंध उतार-चढ़ाव वाले रहे हैं। आरबीआई के जमा और प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (पीसीए) ढांचे को लेकर मतभेद उभरे थे। अब क्या हालत है? 

मुख्य रूप से नकदी और साख दो मुद्दे थे। अर्थव्यवस्था की भलाई चाहने वाला व्यक्ति यह जरूर कहेगा कि पिछले कुछ महीनों में नकदी और साख एक गंभीर समस्या थी। अगर कर्ज देने वाले 11 बैंक पीसीए में हों और इनके मानक बेसल मानदंडों से अधिक हों, जिनका पालन दुनिया करती है तो उस परिस्थिति में नकदी पर अंकुश लगाना विकास दर पर तुषारापात करने जैसा होगा। मौद्रिक नीति तय करने का अधिकार आरबीआई के पास है। केंद्रीय बैंक स्वायत्त हैं और इसे रहना भी चाहिए, लेकिन सरकार लोगों के प्रति उत्तरदायी होती है और उसे अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाले मुद्दे उठाने पड़ते हैं। जब हमें लगा कि आरबीआई संबंधित मुद्दों पर चर्चा नहीं कर रहा है तो हमें समस्या के समाधान के लिए आवश्यक उपाय करने पड़े। पीसीए से जुड़ा मुद्दा आरबीआई के समक्ष है। मैं उम्मीद करता हूं कि नए गवर्नर इस पर ध्यान देंगे। इस बीच, हमने बैंकों को अतिरिक्त नकदी दी है। जहां तक आरबीआई के जमा भंडार का सवाल है तो हमने इस साल वित्तीय घाटा पाटने के लिए यह रकम नहीं मांगी थी। आरबीआई के पास कितनी रकम होनी चाहिए यह मुद्दा संप्रग सरकार ने भी उठाया था और इस पर चर्चा करने की बात कही थी। 

आरबीआई के जमा भंडार व पीसीए के समाधान के लिए कोई समय सीमा तय की गई है?  

इस संबंध में समिति गठित होने ही वाली है। जैसे ही आरबीआई इसकी घोषणा करेगी वैसे ही हम यह सुनिश्चित करेंगे कि इस पर जल्द फैसला लिया जाए।

बैंकों को पूंजी देने के हाल की कवायद में आपने प्रदर्शन का कोई मानदंड भी तय कर रखा है?  

हमारा मुख्य उद्देश्य नकदी का बेहतर प्रवाह सुनिश्चित करना है। कुछ बैंक पीसीए में जाने की कगार पर खड़े हैं और इन पर खतरा मंडरा रहा है। कुछ ऐसे बैंक हैं, जो इससे बाहर आ सकते हैं। हमारी कोशिश है कि अब और किसी बैंक के पीसीए में जाने की नौबत नहीं आए और जो बैंक बाहर आ सकते हैं वे बाहर आ जाएं। इसके बाद कुछ नियामकीय शर्तों का भी अनुपालन करना है। 

पिछले साल आपने 2.1 लाख करोड़ रुपये पूंजी देने का कार्यक्रम घोषित किया था और ऐसा लगता है कि आपने यह वादा पूरा कर लिया है?

कुछ रकम बैंकों को बाजार से जुटानी होगी। कुछ रकम जुटाई जा चुकी है। चूंकि, बाजार की हालत अच्छी नहीं थी, इसलिए बैंकों को बाजार से 420 अरब रुपये जुटाना शेष है। इनके अलावा हम अतिरिक्त 410 अरब रुपये दे रहे हैं, जिससे बैंकों को कुल 830 अरब रुपये मिलना शेष है।

इन्सॉल्वेंसी बोर्ड के भविष्य और आईबीसी प्रक्रिया पर कुछ सवाल उठाए गए हैं? 

इन्सॉल्वेंसी बोर्ड ने अहम भूमिका निभाई है। इसे बने रहना चाहिए। आईबीसी प्रक्रिया जरूरी थी। कर्जदाताओं को काफी पूंजी मिल चुकी है। न्यायालयों में याचिका दायर करने और इस पर बहस होने के बजाय कर्जदाता ऋण भुगता कर रहे हैं। एक दूसरा पहलू यह है कि अनुच्छेद 29 (ए) के आने के बाद आईबीसी प्रक्रिया में शामिल होने की कगार पर खड़ी कंपनियां इससे बचने के लिए भुगतान कर रही हैं। पहले संस्थान स्थापित करने की चुनौती थी और बाद में इसका क्षमता विस्तार करना था। मैंने संकेत दिए हैं कि शुरुआती मामलों के समाधान के बाद यह तय होगा कि आईबीसी के साथ हमें एक अन्य समाधान प्रक्रिया की जरूरत है या नहीं।

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