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ताप और जल विद्युत उत्पादन क्षमता में बढ़ोतरी सुस्त

जयजित दास / भुवनेश्वर December 25, 2018

मौजूदा वित्त वर्ष में अप्रैल-नवंबर की अवधि में ताप विद्युत और जल विद्युत की उत्पादन क्षमता में बढ़ोतरी की दर 69 फीसदी घटी है। इसकी मुख्य वजह यह है कि इस साल प्रदूषण रहित ऊर्जा के उत्पादन में तेजी आई है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) के आंकड़ों से पता चलता है कि इस साल ताप विद्युत में केवल 1,330 मेगावाट की बढ़ोतरी हुई है, जबकि जबकि पिछले वर्ष की इसी अवधि में उत्पादन क्षमता में 4,300 मेगावाट की वृद्घि हुई थी। इस तरह इसमें 69 फीसदी की कमी आई है। जल विद्युत उत्पादन की क्षमता की वृद्धि रिकॉर्ड 70 फीसदी घटी है। यह समीक्षाधीन अवधि में 465 मेगावाट से घटकर 140 मेगावाट रही। ताप और जल विद्युत में वित्त वर्ष 2019 के नवंबर के अंत तक नई क्षमता वृद्घि में 69 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।  

 
उद्योग से जुड़े एक सूत्र ने कहा, 'ताप विद्युत क्षेत्र फंसे कर्ज के जोखिम से दबा हुआ है और इसे और कर्ज हासिल करने में बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। लंबी अवधि के विद्युत खरीद करार भी नहीं हो रहे हैं और इसे अक्षय ऊर्जा के स्रोतों से भारी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है।'   अमेरिका स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ एनर्जी इकनॉमिक्स ऐंड फाइनैंशियल एनालिसिस (आईईईएफए) की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा वित्त वर्ष के अप्रैल-अक्टूबर अवधि के दौरान देश की ताप विद्युत क्षमता 1,100 मेगावाट घटी है। मध्य प्रदेश में माहन सुपर थर्मल प्रोजेक्ट में 600 मेगावाट की वृद्घि हुई लेकिन कई संयंत्रों के बंद होने से ताप विद्युत क्षमता में 1,799 मेगावाट की कमी आई है। इतनी बड़ी कमी के पीछे का कारण दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में स्थित 705 मेगावॉट वाली बदरपुर थर्मल पॉवर स्टेशन और पंजाब में 420 मेगावाट वाली रोपड़ कोल पावर स्टेशन का बंद होना है। विद्युत क्षेत्र में देश की सबसे आधुनिक योजना- राष्ट्रीय विद्युत योजना 2018 (एनईपी 2018) में कहा गया है कि अगले पांच साल में सालाना 4,000-5,000 मेगावाट क्षमता के ताप विद्युत संयंत्र बंद होंगे।   
 
आईईईएफए रिपोर्ट कहती है, 'फंसी हुई परिसंपत्ति में सामान्य तौर पर अनगिनत समस्याएं दिखाई पड़ती हैं जिसमें पुरानी हो चुकी प्रौद्योगिकी, भूमि अधिग्रहण के कानूनी पेच, प्रस्तावित संयंत्र स्थल और कोयला आपूर्ति की दूरी के बीच भौगोलिक असंगतता तथा अव्यावहारिक शुल्क आदि प्रमुख हैं। भारत में टीपीपी प्रस्तावों को शुल्क की जरूरत अमूमन बढ़ी हुई उच्च दरों पर होती है। इसके परिणामस्वरूप भारत की विद्युत वितरण कंपनियां, जो उपभोक्ताओं को आपूर्ति करने के लिए बिजली खरीदती हैं, इसे नहीं स्वीकार करतीं क्योंकि अक्षय ऊर्जा के शुल्क किफायती समाधान हैं।' 
 
इसके उलट भारत का अक्षय ऊर्जा क्षेत्र ग्रिड एकीकरण, सौर उपकरणों पर 25 फीसदी का आयात शुल्क और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से जुड़ी अनिश्चितताओं जैसी बड़ी चुनौतियों के बावजूद तेजी से बढऩे को तैयार है। आईईईएफए को उम्मीद है कि मौजूदा वित्त वर्ष में अक्षय ऊर्जा में कुल 13,000 मेगावाट की वृद्घि होगी जो कि 2017-18 से मामूली कम है। 
Keyword: power, electric, coal,,
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