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वोडाफोन मामले पर है सबकी नजर

पार्थसारथि शोम /  December 25, 2018

वोडाफोन पर अतीत की तिथि से प्रभावी होने वाले कराधान मामले में अंतरराष्ट्रीय निर्णय पर सबकी निगाहें हैं। इस बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं पार्थसारथि शोम

 
भारत सरकार इस समय वोडाफोन मामले में एक अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता प्रक्रिया में है, ऐसे में इस मामले पर एक बार पुन: नजर डालना श्रेयस्कर है। अंतरराष्ट्रीय कराधान मामलों में क्या करें और क्या न करें इसे लेकर कुछ रोचक अंतर्दृष्टि हमें मिलती है। वर्ष 2007 में हॉन्गकॉन्ग की बहुराष्ट्रीय कंपनी हचिंसन ने केमन द्वीप स्थित अपनी पूर्ण स्वामित्व वाली अनुषंगी कंपनी का परिचालन लाइसेंस वोडाफोन के पूर्ण स्वामित्व वाली डच अनुषंगी को 1,100 करोड़ डॉलर में बेच दिया। यह भारत में स्थित परिसंपत्ति का अप्रत्यक्ष स्थानांतरण था जिसे दो विदेशी कंपनियों ने देश के बाहर अंजाम दिया था।
 
अप्रत्यक्ष स्थानांतरण के कराधान पर आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) का नजरिया कुछ इस प्रकार है, 'केंद्रीय अवधारणात्मक मुद्दा यह है कि आखिर कर अधिकारों का आवंटन उन देशों के बीच कैसे किया जाए जहां परिसंपत्ति मौजूद है और जहां यह लेनदेन किया गया। क्या जहां परिसंपत्ति स्थित है उसका ऐसे स्वामित्व के अप्रत्यक्ष स्थानांतरण पर प्राथमिक अधिकार होना चाहिए जो देश के बाहर होता है? कम से कम उन परिसंपत्तियों के मामले में जहां आर्थिक दर स्थान विशेष से ताल्लुक रखती हो तथा अन्य अचल परिसंपत्तियां संबंधित हों, वहां इसका उत्तर हां है।' यह सही है कि ओईसीडी का यह विचार एकदम ताजा है और यह प्रासंगिक भी है। वोडाफोन के मामले में उसने हचिंसन का कर नहीं रोका था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि हचिंसन की कोई परिसंपत्ति भारत में शेष नहीं है। भारतीय राजस्व सेवा का अपनी विधिक स्थिति के आधार पर यह मानना था कि वोडाफोन को हचिंसन से कर प्राप्त करना था। उन्होंने हचिंसन से हुए पूंजीगत लाभ के आधार पर 260 करोड़ डॉलर के कर का दावा वोडाफोन पर किया। परंतु वर्ष 2012 में न्यायिक प्रक्रिया के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में भारत सरकार के बजाय वोडाफोन के पक्ष में निर्णय दिया।
 
असल समस्या तब शुरू हुई जब सरकार ने कानून में पिछली तारीख से परिवर्तन करके इस अप्रत्यक्ष स्थानांतरण को कर योग्य बना दिया। वोडाफोन इस मामले को भारत-नीदरलैंड द्विपक्षीय निवेश संधि के तहत अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के लिए ले गया। उसका दावा था कि कानून में बदलाव सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय स्थिति को बदलने के लिए किया गया। इससे पहले अतीत से लागू कराधान के आर्थिक वृद्घि और समृद्घि पर पडऩे वाले नकारात्मक प्रभाव के बारे में लिखा था। मैंने लिखा था कि कैसे यह कारोबारी मॉडल को व्यवहार्य बनाए रखने पर इसका नकारात्मक असर होगा। 
 
दलील एकदम साफ है: जब कोई कारोबार निवेश पर विचार करता है तो वह जोखिम को ध्यान में रखकर निर्णय लेता है। इसके अलावा वह मौजूदा श्रम कानूनों, निवेश, कर और व्यापार आदि का आकलन करता है। अगर भविष्य में इनमें संशोधन होता है और वह बदलाव लागू होता है तो जोखिम मॉडल को भविष्य के लिए नए सिरे से तैयार किया जा सकता है। अगर कानून को अतीत की तिथि से बदला जाता है तो लिए जा चुके कारोबारी निर्णयों पर इसका उलटा प्रभाव पड़ता है। जाहिर है कारोबारी नतीजे प्रभावित होते हैं। उदाहरण के लिए अगर भविष्य में किसी समय अनपेक्षित कर चुकाना पड़े तो पहले तय की गई लागत, आय और मुनाफे का आकलन आदि गलत हो जाते हैं। जाहिर है इसे जोखिम उठाना नहीं बल्कि अनिश्चितता के माहौल में काम करना कहा जाना चाहिए।
 
वोडाफोन का मामला रोचक है क्योंकि भारत सरकार ने कहा कि उसने वोडाफोन को इस मामले में हचिंसन से कर लेकर सरकार को चुकाने के लिए पर्याप्त अवसर और चेतावनी दी थी। वोडाफोन ने इस पहलू पर गौर किया लेकिन उसने इसे नकार दिया और जोखिम लेने का तय किया। यद्यपि उसे पता था कि भारतीय अदालतें देश के कर अधिकारियों के पक्ष में निर्णय सुना सकती हैं। जब सर्वोच्च न्यायालय आयकर अधिनियम के आधार पर वोडाफोन के पक्ष में निर्णय सुना दिया तो वोडाफोन का जोखिम लेने का फैसला सही साबित हुआ। परंतु उसने यह अनुमान नहीं लगाया था कि सरकार अतीत की तिथि से लागू होने वाला कानून बनाकर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के आधार को ही समाप्त कर देगी और दोबारा कर की मांग करेगी।
 
यहां पुराने घटनाक्रम को याद किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय से पहले उच्च न्यायालय ने सरकार के पक्ष में निर्णय दिया था। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने उसे पलट दिया। वोडाफोन ने इस मामले को खत्म मान लिया था लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं माना क्योंकि उसने पहले भी वोडाफोन को संभावित कराधान के बारे में जानकारी दी थी। यही कारण है कि सरकार ने कानून में बदलाव किया। सामान्य परिस्थितियों में इसकी उम्मीद रहती क्योंकि मामला संभावना पर आधारित होता लेकिन कानून को सन 1961 से बदला गया, यानी आयकर अधिनियम 1961 के लागू होने के वर्ष से। ऐसे में समस्या खड़ी होनी ही थी। यह सवाल उत्पन्न हुआ कि क्या कानून में अतीत की तिथि से संशोधन केवल इसलिए किया गया क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वोडाफोन मामले में दिए गए निर्णय को पलटना था? या फिर यह कानून में वास्तविक संशोधन था जो पहले मूल लक्ष्य को प्राप्त करने की राह में बाधा बना हुआ था। कानून को पिछली तिथि से लागू करना कारोबारी निर्णयों और निवेश के मामलों में अनिश्चितता के मसले को उजागर करता है। सन 2012 में भारत सरकार की एक विशेषज्ञ समिति ने अप्रत्यक्ष स्थानांतरण के मसले को संबोधित किया था। मैं इस समिति का अध्यक्ष था। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में भी तय अवधि के लिए ऐसे अतीत की तिथि से लागू होने वाले प्रावधान देखने को मिल चुके हैं। स्वीडन जैसे यूरोपीय देशों ने इससे परहेज किया है। भारत इनमें से किसी का का चयन क्यों करे इसकी कोई खास वजह नहीं है। हां यह अवश्य है कि देश की आर्थिक विकास की अवस्था ऐसी है कि उसे विदेशी निवेश की आवश्यकता है। इसका सीधा संबंध कर अनुपालन से जुड़ी कारोबारी अनिश्चितता से है।
 
अब तक वोडाफोन का यही कहना है कानून का अतीत से लागू किया जाना उचित नहीं है जबकि भारत सरकार का कहना है कि वोडाफोन ने उचित सलाह दिए जाने के बावजूद जानबूझकर यह जोखिम उठाया। कुल मिलाकर देखा जाए तो भारत में स्थित परिसंपत्तियों के अप्रत्यक्ष स्थानांतरण से अर्जित होने वाले कर राजस्व पर भारत का दावा स्पष्ट है और इसे भविष्य में भी लागू किया जाना चाहिए। ओईसीडी के बेस इरोजन ऐंड प्रॉफिट शिफ्टिंग (बीईपीएस) संबंधी कदम स्रोत आधारित कराधान का समर्थन करते हैं। केवल अतीत की तारीख से लागू करना ही विवाद का विषय बना हुआ है क्योंकि कुछ देश इसका इस्तेमाल करते हैं जबकि कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण देश ऐसा नहीं करते। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता से इसका क्या निष्कर्ष निकलता है इसमें न केवल कर नीति निर्माताओं की बल्कि दुनिया भर के विशेषज्ञों की दृष्टि होगी।
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