बिजनेस स्टैंडर्ड - भूमिहीन किसानों की अनदेखी से तेलंगाना मॉडल पर उठते सवाल
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, January 18, 2019 03:23 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम निवेश खबर

भूमिहीन किसानों की अनदेखी से तेलंगाना मॉडल पर उठते सवाल

साईं मनीष /  December 25, 2018

करीब 25 साल की विधवा और तीन बच्चों की मां रमावत चल्ली अगस्त 2017 के उस दिन को याद कर अब भी कांप उठती हैं जब तेलंगाना के नलगोंडा जिले के मस्तिपल्ली गांव में रहने वाले उनके पति ने कीटनाशक खाकर आत्महत्या कर ली थी। लम्बाडी समुदाय की रमावत एफआईआर की प्रति भी दिखाती हैं जिसके मुताबिक उनका पति 'दो वर्षों से अपने खेतों में मुनाफा कमाने लायक फसल नहीं उगा पाने से कर्ज में डूब गया था और कीटनाशक पीकर अपनी जिंदगी समाप्त कर ली।' 

 
लेकिन रमावत की जिंदगी में मई 2018 में कुछ अप्रत्याशित सा हुआ। उन्हें अपने पति की आधा एकड़ जमीन के लिए राज्य सरकार से 2,000 रुपये मुआवजे का चेक मिला। तेलंगाना में होने वाले चुनावों से कुछ हफ्ते पहले अक्टूबर में रमावत के बैंक खाते में 2,000 रुपये की दूसरी किस्त भी आ गई। वह कहती हैं, 'मैंने इसमें से कुछ पैसों से चावल खरीदा। मुझे हर महीने 1,000 रुपये की विधवा पेंशन भी मिलती है। मैं सिर्फ अपने खेतों में ही काम नहीं करती बल्कि कपास उगाने के लिए तीन एकड़ जमीन पट्टे पर भी ले रखी है।'
 
वह पूरे तेलंगाना के उन 57 लाख कृषि-भूमि मालिकों में से एक हैं जिन्हें 'रैयतु बंधु' (किसान मित्र) योजना के तहत लगभग 120 अरब रुपये मिले हैं। यह भारत में मतदाताओं को चुनाव के पहले सरकार की तरफ से स्थानांतरित की जाने वाली शायद सबसे बड़ी राशि है। इस योजना के तहत कृषि-योग्य भूमि के हरेक मालिक को फसल सत्र की शुरुआत में प्रति एकड़ 4,000 रुपये मिलते हैं। इस तरह तेलंगाना में 2018 के दौरान रबी और खरीफ दोनों फसल मौसम के लिए प्रत्येक भूमि मालिक को एक एकड़ जमीन के लिए 8,000 रुपये मिले। इस योजना के दायरे में आने के लिए भूमि स्वामित्व की कोई अधिकतम सीमा नहीं तय की गई है। वैसे तेलंगाना के भूमि हदबंदी अधिनियम के तहत किसी भी व्यक्ति के पास 50 एकड़ से ज्यादा जमीन नहीं हो सकती है। इस तरह चाहे किसी व्यक्ति के पास 50 एकड़ जमीन हो या आधा एकड़, इस राशि का भुगतान सभी को किया गया। तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के प्रमुख और मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव की सरकार ने चुनाव से पहले बजट में इस योजन के मद में 120 अरब रुपये आवंटित किए थे। 
 
इस योजना को मतदाताओं को लुभाने या किसानों की मदद के लिए मौलिक प्रयास होने को लेकर बने असमंजस के चलते चुनाव आयोग ने पहले तो रबी सीजन के लिए रकम का भुगतान करने से राज्य सरकार को रोक दिया था। हालांकि बाद में केसीआर सरकार के समझाने के बाद आयोग ने किसानों को रबी का भुगतान करने की मंजूरी दे दी। मतदान से कुछ हफ्ते पहले चुनाव आयोग ने भूमि मालिकों को भुगतान की अनुमति सशर्त दी थी। ये शर्ते हैं- रकम सीधे बैंक खाते में स्थानांतरित हो, योजना में कोई नया लाभार्थी न जोड़ा जाए,  भुगतान के बारे में कोई प्रचार न हो, इस प्रक्रिया से कोई राजनीतिक कार्यकर्ता न जुड़े। 
 
असली खेतिहर किसानों की अनदेखी
 
हालांकि कृषि ऋण संकट के समाधान की दिशा में बड़ा बदलाव लाने वाली इस योजना में खेतों में काम करने वाले लोगों को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है। रैयत बंधु योजना के तहत रकम का भुगतान पट्टे पर खेती करने वाले भूमिहीन पट्टेदारों को नहीं हुआ है।  ये वे लोग हैं जो खेती के लिए साहूकारों से ऊंची ब्याज दर पर कर्ज लेते हैं। गौरतलब है कि तेलंगाना में होने वाली आत्महत्याएं अक्सर इन्हीं छोटे खेतिहर किसानों से जुड़ी होती हैं। रैयत स्वराज्य वेदिका ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के साथ मिलकर 2014 से 2018 की अवधि के बीच किए गए अध्ययन में यह पाया कि किसानों की खुदकुशी के 692 मामलों में से 75 प्रतिशत पट्टेदार किसानों के थे। अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक तेलंगाना के कुछ जिलों में तो यह अनुपात काफी अधिक था। पूरे राज्य में किसानों की खुदकुशी की सबसे ज्यादा घटनाएं नालगोंडा में दर्ज की गई है जहां खुदकुशी करने वाले किसानों में 93 फीसदी लोग पट्टेदार थे।
 
वारंगल जिले में पल्लागुट्टा गांव के भूमिहीन पट्टेदार नीला रवि भी इसकी तस्दीक करते हैं। रवि ने 6 एकड़ जमीन किराये पर ली हुई है जिसके एवज में उन्हें सालाना 24,000 रुपये चुकाने पड़ते हैं। चाहे इस दौरान खेत में फसल हो या नहीं, उन्हें जमीन के मालिक को किराया चुकाना ही होता है। उन्हें एक एकड़ जमीन में कपास की खेती के लिए तीन पैकेट बीज की जरूरत होती है जिसकी कीमत 750 रुपये से 900 रुपये (किस्म के आधार पर) प्रति पैकेट है। उन्हें खेती में लगने वाले श्रम, खाद और कीटनाशकों का भी इंतजाम खुद करना पड़ता है। रवि कहते हैं, 'मुझे मालूम है कि खेत मालिक को रैयत बंधु योजना के तहत पैसा मिलता है लेकिन मैं उनसे रकम में हिस्सेदारी नहीं मांग सकता। अगर मालिक यह जमीन किसी और को लीज पर दे देगा तो मैं क्या करूंगा?' 
 
रवि के ही गांव में रहने वाले पोल्लू रमेश कहते हैं, 'गांव के सरपंच या सरकारी अधिकारी को आकर भूमि के मालिकों से सरकार से मिलने वाली रकम खेतों में कड़ी मेहनत करने वाले किसानों के साथ बांटने को कहना चाहिए। लेकिन इस योजना के बारे में लोगों की राय जानने के लिए कोई नहीं आया है। इस योजना के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी भी नहीं है। इस गांव में वांछित माओवादियों के पोस्टर और चुनाव प्रचार से संबंधित पोस्टर जरूर लगे हैं लेकिन इस योजना के बारे में बताने वाला एक भी पोस्टर नहीं लगाया गया है। जब खेतों में कड़ी मेहनत करने वाले किसानों को नुकसान होने पर कोई मदद नहीं मिल सकती तो उनके पास खुदकुशी करने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाता है।'
 
यह आपका नहीं, मेरा पैसा है
 
पांच एकड़ की खेती के मालिक और संपन्न किसान वेंकट रेड्डी मजदूरों की मदद से धान की खेती करते हैं। वेंकट बताते हैं कि उन्हें सरकार से इस योजना के तहत 40,000 रुपये मिले हैं। वह कहते हैं, 'मैंने अपनी भूमि किसी को पट्टे पर नहीं दी है। लेकिन यदि मैं इसे पट्टे पर देता हूं तो मुझे सरकार से मिलने वाली आधी रकम पट्टे पर खेती करने वाले किसान को देनी होगी।' वह इस मामले में थोड़े उदार लगते हैं लेकिन नलगोंडा और वारंगल जिलों के कई भूमि मालिकों ने बिज़नेस स्टैंडर्ड के साथ बातचीत में यह साफ-साफ कहा कि सरकार से मिलने वाली रकम पर उनका पूरा हक है और वे पट्टेदार किसान के साथ इसका बंटवारा नहीं करेंगे।
 
पेड्डा थांडा गांव में अपनी चार एकड़ भूमि पट्टे पर देने वाले किसान लक्ष्मीरामन कहते हैं, 'मुझे रैयतु बंधु योजना के तहत 32,000 रुपये मिले थे जिसका इस्तेमाल मैंने गांव में अपनी दुकान का विस्तार करने पर किया। मुझे अपने व्यवसाय के लिए पैसे की जरूरत है और मैं इस पैसे को पट्टेदार के साथ साझा नहीं करुंगा। हालांकि मेरी राय में सरकार को इस योजना के तहत भूमि-धारिता पर सीमा तय करनी चाहिए। 20 एकड़ से अधिक भूमि के मालिक को इस पैसे की जरूरत नहीं होती है। वहीं, 50 एकड़ भूमि वाले कई लोग तो भारत में रह भी नहीं रहे हैं। इन लोगों को इस योजना के पैसे की जरूरत ही नहीं है।'
 
पट्टेदारी की पहेली
 
तेलंगाना सरकार ने रैयत बंधु योजना के तहत पट्टेदारों को भुगतान न करने का जो फैसला लिया उसका कारण कानूनी होने के साथ ही   राजनीतिक भी है। आंध्र प्रदेश (तेलंगाना क्षेत्र) पट्टेदारी एवं कृषि भूमि अधिनियम,1950 के तहत राज्य में कुछ अपवादों को छोड़कर पट्टेदारी की अनुमति ही नहीं दी गई है। इस अधिनियम के अनुसार, कुछ मामलों को छोड़कर 1953 के बाद से तेलंगाना में सभी तरह की कृषि भूमि की पट्टेदारी निषिद्ध है। बड़ा अपवाद यह था कि भूमिधारक पांच साल के लिए अपनी जमीन पट्टे पर दे सकता है। उसके बाद उसे पांच-पांच वर्षों के लिए बढ़ाया भी जा सकता है। लेकिन यदि भूमि-स्वामी पट्टा खत्म करना चाहता है तो पांच साल की मियाद पूरी होने के एक साल पहले पट्टेदार को लिखित नोटिस देना जरूरी होगा। इस कानून के वजूद में होते हुए भी पट्टेदारी शायद ही इन शर्तों के हिसाब से होती है। अमूमन तेलंगाना में पट्टेदारी का लिखित समझौता नहीं होता है और भूमि का किराया एवं अवधि मौखिक आधार पर ही तय होते हैं। ऐसे हालात में तेलंगाना सरकार के पास गांवों में भूमि पट्टेदारी की स्थिति को लेकर कम जानकारी ही है। रिपोर्ट के मुताबिक खुद मुख्यमंत्री केसीआर ने जुलाई 2018 में यह स्वीकार किया था कि उनकी सरकार के पास पट्टे पर खेती करने वाले किसानों का कोई रिकॉर्ड ही नहीं है। 
 
तेलंगाना की सामाजिक विकास रिपोर्ट, 2017 के अनुसार राज्य में किराये पर होने वाली खेती में काफी तेजी आई है। रिपोर्ट के मुताबिक 2002-03 में तेलंगाना में शामिल जिलों में कुल खेती में पट्टेदारी का अंशदान महज 4.7 प्रतिशत ही था। लेकिन एक दशक में ही यह बढ़कर 20.1 प्रतिशत हो गया। यदि यही रफ्तार कायम रही है तो इस समय राज्य में कुल खेती का लगभग एक-चौथाई हिस्सा पट्टेदारी पर होना चाहिए। इनमें ऐसे सीमांत किसान भी शामिल हैं जो अकेले अपनी जमीन पर खेती से गुजर नहीं कर पाते हैं। ऐसे में उनके पास किराये पर खेत लेकर खेती करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। रिपोर्ट के मुताबिक 2011 में 2.5 एकड़ से कम भूमि वाले सीमांत किसानों की हिस्सेदारी लगभग 62 प्रतिशत थी लेकिन वे केवल 25 फीसदी भूमि में ही खेती कर रहे थे। 
 
केसीआर की रैयत बंधु योजना तेलंगाना के किसानों की बड़ी तादाद के लिए वरदान ही साबित हुई नजर आती है। लेकिन क्या यह वाकई में सच है? भूमिहीन किसानों को इस योजना से पूरी तरह अलग रखने की वजह से केसीआर की इस योजना की चमक फीकी पड़ गई। अनुमान है कि तेलंगाना के कुल ग्रामीण परिवारों में लगभग 43 प्रतिशत भूमिहीन किसान हैं।
 
आत्महत्या करने वालों को कम राहत
 
किसानों से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाली संस्था रैयत स्वराज्य वेदिका के सह-संयोजक किरण कुमार विस्सा कहते हैं, 'तेलंगाना में लगभग 15 लाख पट्टेदार किसान करीब 40 फीसदी भूमि पर खेती कर रहे हैं। आधे भूस्वामियों के पास पांच एकड़ से अधिक जमीन है। रैयत बंधु के तहत वितरित एक-तिहाई रकम (लगभग 40 अरब रुपये) अनुपस्थित भूमि मालिकों के पास गई है। साफ है कि इस भूमि पर खेती करने का जोखिम लेने वाले पट्टेदारों को इस समर्थन प्रणाली से बाहर रखा गया है। यदि वाकई कर्ज घटाने का मकसद है तो कृषि बाधाएं दूर की जाएं और किसानों की खुदकुशी रोकने की कोशिश की जाए और पट्टेदारों को इसके दायरे में लाया जाए।' विस्सा ने केसीआर की 'निवेश समर्थन योजना' को चुनौती देने के लिए तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में याचिका भी दाखिल की है। उनकी याचिका में कहा गया है, 'सरकार की अपनी रिपोर्टों से पता चलता है कि राज्य में 11 लाख से अधिक लोग दूसरों की भूमि पर खेती कर रहे हैं और वे कृषि संकट के लिहाज से सबसे ज्यादा अशक्त हैं। राज्य ने इस निवेश सहायता के लिए उनकी पहचान के प्रावधान नहीं किए हैं जिसकी वजह से वे न्यूनतम सार्वजनिक मदद से वंचित रहे। साथ ही करोड़ों रुपये का आवंटन उन अनुपस्थित मालिकों के लिए किया गया जो भूमि पर खेती नहीं कर रहे हैं और किसी भी तरह से कमजोर लोगों या कृषि संकट में शामिल आत्महत्या जोखिम समूह में नहीं आते हैं। इसके अलावा 2011 के नियम 18 और कर्ज एवं अन्य लाभों की पात्रता संबंधी नियम (एलईसी) के प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पाने से हजारों पट्टेदार सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित रहे हैं। इनमें ब्याज-मुक्त फसल ऋण, फसल बीमा, आपदा स्थिति में मुआवजा और अन्य सब्सिडी एवं योजनाएं शामिल हैं। इस वजह से उन्हें आत्महत्या करने के लिए बाध्य होना पड़ा।'
 
अधूरा सत्यापन
 
रैयत बंधु योजना के क्रियान्वयन के पहले तेलंगाना सरकार की तरफ से चलाए गए 'भूमि दस्तावेज शुद्धीकरण' अभियान में कई दिक्कतें रही थीं। विस्सा कहते हैं कि सभी सरकारों ने जमीनों के असली रिकॉर्ड का सही तरह से सत्यापन करने के बजाय मौजूदा भूमि रिकॉर्ड को ही कंप्यूटर में दर्ज कर लिया। इनमें से कुछ तो आजादी के पहले के भी हैं। लगभग हरेक गांव में जमीन के ऐसे मालिक मिले जिन्होंने अपनी भूमि के लिए सरकारी राशि नहीं मिलने की शिकायत की। राज्य के जनगांव जिले में नरमेट्टा गांव में शाम को लगने वाले साप्ताहिक बाजार में आसपास के गांवों के किसान आते हैं।
 
 चौदरम गांव से आए किसान एम रामलिंगम कहते हैं, 'जब मुझे पहला चेक मिला तो वह सिर्फ 8,000 रुपये का था। अधिकारियों ने कहा कि मैं सिर्फ दो एकड़ जमीन का मालिक हूं जबकि असल में मेरे पास पांच एकड़ जमीन है। इस पर मैंने कहा कि या तो मुझे पूरी भूमि के लिए रकम दें या फिर कुछ न दें। लेकिन अक्टूबर में सरकार ने मेरे बैंक खाते में सिर्फ 8,000 रुपये जमा करा दिए।' राजस्व और अन्य स्थानीय अधिकारियों को रिश्वत दिए जाने की भी शिकायतें सामने आईं जो 2017 में भूमि रिकॉर्ड दर्ज करने के दौरान काम कर रहे थे। कुछ लोगों ने बताया कि अधिकारियों ने पूरी भूमि के स्वामित्व को सत्यापित करने के लिए उनसे पैसे मांगे और कुछ मामलों में जानबूझकर परेशान करने के लिए उनकी जमीन को कम बता दिया गया। हालांकि बिज़नेस स्टैंडर्ड भूमि निरीक्षण अधिकारियों पर लगे भ्रष्टाचार के इन आरोपों की प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं कर सका है।
Keyword: agri, farmer, crop, telangana,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या गोयल का प्रस्ताव जेट के कर्जदारों को आएगा रास?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.