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सरकार बनाम आरबीआई

कणिका दत्ता /  12 25, 2018

कई महीनों की अटकलों के बाद भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर ऊर्जित पटेल ने आखिरकार 10 दिसंबर को इस्तीफा दे दिया। आर्थिक उदारीकरण के बाद वह अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले इस्तीफा देने वाले आरबीआई के पहले गवर्नर हैं। पिछले कुछ महीनों खासकर अगस्त से मोदी सरकार और केंद्रीय बैंक के बीच तनाव की स्थिति बन रही थी जब सरकार ने अपने दो वफादारों एस गुरुमूर्ति और सतीश मराठे को आरबीआई बोर्ड में नियुक्त किया। गुरुमूर्ति स्वतंत्र अकाउंटेंट और स्वदेशी जागरण मंच के सह संयोजक हैं जबकि मराठे कोऑपरेटिव बैंकर हैं और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कोषाध्यक्ष रह चुके हैं। उनकी नियुक्ति को सरकार और आरबीआई के जटिल संबंधों में खटास पैदा करने के कदम के तौर पर देखा गया। संयोग से इसी दौरान केंद्रीय बैंक पर अपने आरक्षित भंडार का एक बड़ा हिस्सा सरकार को देने और त्वरित उपचारात्मक कार्रवाई (पीसीए) व्यवस्था में शामिल सरकारी बैंकों को बीमार लघु एवं मझोले उपक्रम क्षेत्र को ऋण देने में नियमों में ढील देने के लिए दबाव बनाया गया।  सरकार ने आरबीआई पर निर्णय लेने की व्यवस्था में परामर्श प्रक्रिया को व्यापक बनाने के लिए भी जोर डाला। यानी निर्णय प्रक्रिया में बोर्ड के सदस्यों को ज्यादा अधिकार देना। 
 
आरबीआई ने इसे सीधे तौर पर अपने केंद्रीय बोर्ड को कमजोर करने की कोशिश के तौर पर देखा। केंद्रीय बैंक और सरकार में तनाव बढऩे के बीच आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने एक भाषण में दीर्घकालीन वित्तीय स्थिरता के हित में केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता की वकालत की।  इसे सीधे तौर पर सरकार के लिए संदेश के रूप में देखा गया। इस तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं कि सरकार अपनी मांगें मनवाने के लिए पहली बार आरबीआई कानून की धारा 7 का इस्तेमाल कर सकती है। पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे आने से एक दिन पहले और आरबीआई बोर्ड की बहुप्रतीक्षित बोर्ड बैठक से दो दिन पहले पटेल ने इस्तीफा दे दिया। दो दिन बाद आर्थिक मामलों के पूर्व सचिव शक्तिकांत दास को उनका उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया गया। दास नोटबंदी के दौरान सरकार के मुख्य प्रवक्ता रहे थे। लगता है कि बोर्ड बैठक बिना किसी हंगामे के संपन्न हुई लेकिन अभी तो यह नई कहानी की शुरुआत है।
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