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सर्वोच्च अदालत ने की प्रतिस्पद्र्धा आयोग की भूमिका स्पष्ट

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  December 24, 2018

भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) और भारतीय प्रतिस्पद्र्धा आयोग (सीसीआई) की भूमिकाओं के बीच पारस्परिक क्रिया के बारे में उच्चतम न्यायालय का हालिया फैसला लाइसेंसशुदा  बाजार में सक्रिय कंपनियों को खुशी दे सकता है। दोनों वैधानिक एजेंसियों की भूमिकाओं के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिए इस फैसले का विस्तार से अध्ययन करना जरूरी है। इस मामले से जुड़े तथ्यों के संदर्भ में उच्चतम न्यायालय ने यह पाया कि सीसीआई की पड़ताल के दायरे में शामिल तथ्य एवं कानून से जुड़े सवाल दूरसंचार नियमों की जद में आते हैं। ट्राई लाइसेंस जारी करने वाला नियामक है और वह दूरसंचार सेवाओं के लिए लाइसेंस जारी करता है। वह दूरसंचार सेवाओं की गुणवत्ता, उत्पादकता एवं मानकों के अनुपालन से जुड़े मसलों पर विचार करने वाला अकेला नियामक है। वहीं सीसीआई प्रतिस्पद्र्धा पर नजर रखने वाला, बाजार के दुरुपयोग की शिकायतें सुनने वाला, बाजार में सक्रिय कंपनियों की गुटबाजी और किसी भी कंपनी द्वारा अपनी वर्चस्वकारी स्थिति का गलत इस्तेमाल रोकने का काम करता है। अब मूल मुद्दे की तरफ लौटते हैं। ट्राई को दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के बीच उठने वाले विवादों से जुड़े तथ्यों पर निर्णय करने से रोक दिया गया था जबकि यह उसके नियामकीय दायित्व का अंतर्निहित पहलू था। सीसीआई को यह तय करने को कहा गया कि ट्राई के द्वारा बनाए गए नियमों का उल्लंघन तो नहीं किया गया। लेकिन इसके अजीबोगरीब एवं असंगत परिणाम निकलने लगे। अगर ट्राई को आरोपी कंपनियों को आरोपमुक्त करना था और सीसीआई को उन्हें दोषी ठहराना था तो इससे बेतुके टकराव का ही जन्म होना था। 

 
अब, उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया है कि ट्राई को यह तय करना होगा कि एक मानक प्रावधान का उल्लंघन किया गया और फिर उसके बाद सीसीआई उस पर जरूरी कदम उठाएगा। शीर्ष अदालत ने इस दलील को नकार दिया है कि विनियमित इकाइयों के मामलों में सीसीआई का कोई न्यायाधिकार नहीं होगा। दरअसल, प्रतिस्पद्र्धा कानून को एक सामान्य कानून और दूरसंचार प्रावधानों को विशेष कानून बताने वाला तर्क खारिज करने के साथ ही उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि ये दोनों ही अपने-अपने क्षेत्रों में लागू विशेष कानून हैं। 
 
इस तरह के संघर्षपूर्ण हालात प्रतिभूति बाजार में कई बार देखे गए हैं। पूंजी बाजार की नियामक संस्था सेबी ने ऑडिट की गुणवत्ता को लेकर एक ऑडिटर को नोटिस जारी किया था। वह मामला बम्बई उच्च न्यायालय तक पहुंचा जिसमें यह दलील दी गई कि चार्टर्ड अकाउंटेंट की राष्ट्रीय संस्था आईसीएआई को ही किसी ऑडिट के संदर्भ में गुणवत्ता पर नजर रखने और जवाब-तलब का अधिकार है। न्यायालय ने उस मामले में कहा था कि सेबी के पास यह जांच करने का अधिकार है कि ऑडिट फर्म ने कोई साजिश और साठगांठ तो नहीं की थी। अगर किसी ऑडिट में केवल खराब गुणवत्ता का ही मामला पाया जाता है तो उसमें सेबी का कोई क्षेत्राधिकार नहीं है। हालांकि साठगांठ और धोखाधड़ी के सबूत मिलने पर सेबी उस ऑडिट की जांच कर सकता है। इस निष्कर्ष को किसी भी पक्ष ने चुनौती नहीं दी थी। इस मामले में दिए गए सेबी के अंतिम आदेश के खिलाफ अपील की गई है और फिलहाल यह मामला गुण-दोष के आधार पर विचाराधीन है।
 
इसी तरह धनशोधन रोकथाम के लिए बने कानून पीएमएलए में भी बाजार नियामक सेबी और बैंकिंग नियामक आरबीआई से ऐसे सर्कुलर जारी करने की अपेक्षा की गई है ताकि संदेहास्पद लेनदेन के तौर-तरीकों एवं हालात के बारे में वित्तीय खुफिया इकाई को सूचना दी जाए। ऐसा ही एक सर्कुलर जारी करते समय सेबी ने न केवल पीएमएलए कानून के प्रावधानों का उल्लेख किया था बल्कि सेबी अधिनियम की धारा 11 के तहत हासिल शक्तियों का भी जिक्र किया था। जब सेबी को यह पता चला कि एक ब्रोकर ने जरूरी सूचना नहीं उपलब्ध कराई तो उसके खिलाफ कार्रवाई शुरू कर उस पर जुर्माना लगाया गया। प्रतिभूति अपील अधिकरण ने इस मामले में कहा कि सेबी अधिनियम के प्रावधानों का भी उल्लेख होने से बाजार नियामक को पीएमएलए कानून के समानांतर स्तर पर कार्रवाई का क्षेत्राधिकार मिल जाता है।
 
हालांकि इस मामले के तथ्यों के बारे में उच्चतम न्यायालय के निर्णय का यह मतलब नहीं है कि विनियमित क्षेत्रों में सक्रिय कंपनियों को प्रतिस्पद्र्धा आयोग की कार्रवाई के पहले अपने नियामक द्वारा ही दोषी ठहराए जाने का लाभ हमेशा मिलेगा। उनके कामकाज से जुड़े ऐसे पहलू भी हो सकते हैं जो अपने क्षेत्र के नियामक द्वारा तय मानकों के दायरे में न आते हों और इस दौरान उनका आचरण प्रतिस्पद्र्धा-विरोधी रहा हो। इसी तरह ऐसे अधिकरण भी हो सकते हैं जो पूरी तरह लाइसेंसिंग दर्जा न रखते हों या वे उत्पादकता मानकों की अपेक्षा करते हों। वैकल्पिक रूप से वाणिज्यिक अनुबंध के तौर पर मानक तय करने वाली सरकारी एजेंसियां हो सकती हैं लेकिन वे वाणिज्यिक अनुबंधों से इतर मसलों के वैधानिक रूप से नियमन एवं अनुपालन के लिए अधिकृत नहीं भी हो सकती हैं। लिहाजा एक नियामकीय संस्था की उसके परिचालन क्षेत्र में विशिष्ट निर्देशित वैधानिक भूमिका हो सकती है लेकिन प्रतिस्पद्र्धा-विरोधी आचरण उसके परिचालन के गैर-विनियमित संदर्भों में देखा जा सकता है। ऐसे सभी मामलों में सीसीआई के पास सीधे जांच करने का क्षेत्राधिकार हो सकता है। ऐसी स्थिति में उच्चतम न्यायालय के फैसले से प्रतिस्पद्र्धा आयोग के न्याय-क्षेत्र में कटौती करने को लेकर खुश या दुखी होने का कोई मतलब नहीं है। न्याय-क्षेत्र को लेकर होने वाले टकराव पर तथ्यात्मक ढंग से स्थिति साफ कर दी गई है। विनियमित क्षेत्रों में सक्रिय कंपनियों को अब भी इस बात को लेकर सजग रहना होगा कि वे स्वतंत्र एवं निष्पक्ष प्रतिस्पद्र्धा की राह में किसी तरह की अड़चन न पैदा करें।
Keyword: supreme court, high court, TRAI, CCI,,
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