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आस्था और सहिष्णुता का जटिल है सवाल

नितिन देसाई /  December 24, 2018

सभी नागरिकों को सहिष्णुता के कम से कम कुछ शुरुआती चरण पार करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए ताकि वे लोकतांत्रिक मूल्यों को स्वीकार और दूसरों का सम्मान करें। विस्तार से बता रहे हैं नितिन देसाई

 
आज क्रिसमस का त्योहार है। यह वर्ष का वह समय है जब धार्मिक मान्यताओं के अच्छे पहलुओं को याद किया जाता है। खेद की बात है कि यह सब भारत में संभव नहीं है। इसलिए क्योंकि देश में इस समय धार्मिक हिंसा की घटनाएं बढ़ रही हैं। ये घटनाएं अक्सर बहुसंख्यक समुदाय के उन्मादियों द्वारा प्रेरित हैं। मैं यह सब इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि हाल ही में घटी एक ऐसी ही घटना ने देश में कानून व्यवस्था की बुनियाद के लिए ही चुनौती पैदा कर दी। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में 3 दिसंबर, 2018 को गो-संरक्षकों की एक भीड़ ने एक बहादुर पुलिस अधिकारी इंसपेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या कर दी। देश में संवैधानिक मूल्यों की रक्षा और उन्हें बढ़ावा देने को लेकर प्रतिबद्ध सेवानिवृत्त अफसरशाहों के एक समूह ने इस स्तब्ध करने वाली घटना पर एक पत्र जारी किया। मैं भी इस समूह का सदस्य हूं और पत्र पर मेरे भी हस्ताक्षर हैं। हमारी साझा चिंता को स्पष्ट करने के लिए मैं पत्र में से एक संक्षिप्त हिस्सा आपके सामने रखना चाहता हूं:
 
'देश के सर्वाधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में शासन के आधारभूत सिद्धांत, संवैधानिक मूल्य और मानवीय सामाजिक आचरण पथभ्रष्ट हो रहे हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री बहुसंख्यक श्रेष्ठता और धर्मांधता के इस एजेंडे में शीर्ष पुजारी की भूमिका में हैं। ऐसा लग रहा है कि यह एजेंडा अब शेष सभी चीजों पर भारी पड़ रहा है।'
 
'यह बहुसंख्यकों की ताकत दिखाने का जानबूझकर किया गया प्रयास था और इसके जरिये क्षेत्र के मुस्लिम समुदाय के लोगों को यह संदेश दिया गया कि उन्हें भय में जीना होगा, अधीनस्थ दर्जा स्वीकार करना होगा और बहुसंख्यक समुदाय की बात माननी होगी।'
 
पत्र में इंसपेक्टर सुबोध कुमार सिंह की बहादुरी को सलाम किया गया है और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग की गई है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में अफसरशाही और पुलिस विभाग के प्रमुखों को विधि का शासन सर्वोच्च रखने के उनके संवैधानिक दायित्व की याद दिलाई गई। इलाहाबाद उच्च न्यायालय से अनुरोध किया गया कि वह इस घटना का स्वत: संज्ञान ले। पत्र में यह प्रस्ताव भी रखा गया कि घृणा और हिंसा की राजनीति के खिलाफ नागरिकों के नेतृत्व में राष्ट्रीय अभियान चलाया जाए।
 
बुलंदशहर की घटना कोई इकलौती घटना नहीं है। बीते पांच वर्ष में गौरक्षकों ने 80 से 100 लोगों की हत्याएं की हैं। इनका संबंध प्राय: सत्ताधारी दल से रहा है। झारखंड में हाल ही में एक अदालत ने ऐसे ही कुछ अपराधियों को आजीवन कारावास की सजा दी। इस गौरक्षक समूह के कथित नेता ने कक्षा 7 में पढ़ाई छोड़ दी थी और वह ट्रक पर हेल्पर के रूप में काम करने लगा था। वह डकैती और अवैध कोयला परिवहन में शामिल रहा, कई बार जेल गया और सांप्रदायिक हिंसा में शामिल हो गया। बहुसंख्यक संगठन ऐसे तत्त्वों की तलाश में रहते हैं और अपनी हिंसा में उनका इस्तेमाल करते हैं। गौरक्षक प्रकरण के अलावा हिंसा की ऐसी कई अन्य घटनाएं भी सामने आई हैं।
 
हमारा देश संवैधानिक लोकतंत्र वाला देश है और हम धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं। धार्मिक कट्टरपंथियों द्वारा भड़काई जाने वाली इस हिंसा से बढ़कर संविधान की आत्मा को ठेस पहुंचाने वाली हरकत दूसरी नहीं हो सकती। ये तमाम घटनाएं आपराधिक श्रेणी की हैं और इनसे निपटने का काम उन पुलिसकर्मियों और अधिकारियों का है जिन्होंने संविधान को बरकरार रखने की शपथ ली है। वे यदाकदा ही ऐसा कर रहे हैं और बतौर नागरिक यह हमारा कर्तव्य है कि हम आगे आकर उनके खिलाफ बोलें और कार्रवाई की मांग करें। 
 
परंतु हमें इससे परे जाकर घृणा और हिंसा के खिलाफ जन आंदोलन शुरू करना होगा। हमारे देश में आस्था और धर्म बहुत महत्त्व रखते हैं। शायद ये किसी व्यक्ति की पहचान का सबसे अहम पहलू हैं। समय के साथ इसमें बदलाव आ सकता है लेकिन फिलहाल यही हकीकत है। ऐसे में हमारी चुनौती है संवैधानिक मूल्यों को आगे बढ़ाना जहां किसी को अपनी आस्था त्यागनी न पड़े। यह कैसे होगा? 
 
सबसे पहले लोगों को यह समझना होगा कि बतौर नागरिक हम सभी समान हैं, हमारे अधिकार समान हैं। कुछ राजनेताओं की ओर से विरोधियों को पाकिस्तान भेजने जैसे जो वक्तव्य आते हैं वे पूर्णतया असंवैधानिक और अस्वीकार्य हैं।
 
दूसरा, एक कदम आगे बढ़कर कोई यह भी कह सकता है कि हर किसी को अपना नजरिया रखने का हक है। इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में अल्पसंख्यकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बरकरार रहनी चाहिए। 
 
तीसरा चरण यह है जहां कोई कह सकता है कि अगर आपकी जगह मैं होता तो मैं यह कहता और करता। यह अच्छी संवाद प्रक्रिया की शुरुआत का संकेत है। इस विचार के साथ आगे बढऩे वाले समाज ही व्यावहारिक रूप से अल्पसंख्यक विचारों का समायोजन करते हैं।
 
चौथी और सबसे कठिन बात वह है जहां व्यक्ति अपनी पहचान से एकदम स्वतंत्र होकर विवादास्पद मुद्दों पर नीतिगत निर्णय लेते हैं। अगर मुझे पता ही नहीं हो कि मैं हिंदू हूं या मुस्लिम तो मैं राम मंदिर पर क्या करूंगा? सैद्धांतिक तौर पर नीतिगत स्थानों पर ऐसे लोग होने चाहिए जो जातीय-धार्मिक पहचान आदि से परे होकर काम करें। हममें से कई लोग चरण तक नहीं पहुंच पाते। परंतु हम आपस में कहीं अधिक सह-संबद्घ हैं। हमारा रोजमर्रा का जीवन कहीं अधिक विविधतापूर्ण है और यह प्रयास किया जा सकता है कि सभी नागरिक कम से कम सहिष्णुता का प्राथमिक चरण तो पार करें। उसके लिए हमें लोकतंत्र के सिद्घांतों को स्वीकार करना होगा और दूसरों का सम्मान करना होगा।
 
दूसरों को सुनने की प्रतिबद्घता का होना केवल अपनी बात कहने और दूसरों को ज्ञान देने की तुलना में अधिक आवश्यक है। यही वजह है कि हमें ऐसी अंतरधार्मिक घोषणाओं को महत्त्व देना चाहिए जो सहिष्णुता और तमाम धर्मों की समझ की बात करती हों। ऐसे संदेश तब अधिक ताकतवर होते हैं जब वे ऐसे लोगों से आएं जो किसी खास धर्म से ताल्लुक रखते हों, बजाय कि धर्मनिरपेक्ष उदारवादियों के। 
 
क्रिसमस के अवसर पर बाइबल से एक उद्घरण लेते हैं जिसमें कहा गया है, 'मैं आप बंधुओं से अपील करता हूं कि उन लोगों पर नजर रखें जो बंटवारा करते हैं और आपको दी गई शिक्षाओं में बाधाएं उत्पन्न करते हैं।' हमारे संवैधानिक गणराज्य के अगुआओं ने हमें जो कुछ सिखाया है वही हमारे लिए सर्वोपरि है। 
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