बिजनेस स्टैंडर्ड - उपभोक्ताओं के हित में!
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उपभोक्ताओं के हित में!

संपादकीय /  December 24, 2018

भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने डाइरेक्ट टु होम (डीटीएच) सेवा देने वाली कंपनियों से जुड़े ब्रॉडकास्टिंग टैरिफ ऑर्डर में कहा है कि वे अपने ग्राहकों को केवल वही चैनल मुहैया कराएं जो वे देखना चाहते हैं, और उनसे उसी के अनुरूप शुल्क वसूल करें। यह कदम उपभोक्ताओं के हित में है लेकिन यह मान लेना गलत होगा कि इससे उपभोक्ताओं का मासिक बिल अनिवार्य रूप से कम हो जाएगा। आमतौर पर प्रसारक कई तरह के चैनलों को एक साथ इक_ïा देते हैं और दलील दी जाती है कि उपभोक्ताओं को कम भुगतान में अधिक चैनल देखने को मिलते हैं। परंतु ग्राहक वे सारे चैनल नहीं देखते जो उनको दिखाए जाते हैं। ट्राई का कहना है कि उपभोक्ता उन चैनलों का पैसा क्यों दें जो वे देखना ही नहीं चाहते। 

 
इस आदेश के जरिये ट्राई चाहता है कि प्रसारक हर सशुल्क चैनल के लिए अलग से शुल्क लगाए ताकि उपभोक्ताओं को अपनी पसंद से समझौता नहीं करना पड़े। ऐसे परिदृश्य में जो लोग सीमित संख्या में चैनल देखना चाहते हैं, उन्हें पहले की तुलना में कम भुगतान करना पड़ सकता है। परंतु इसके उलट भी एक सच्चाई है। काफी हद तक संभव है कि अलग-अलग श्रेणियों के सीमित चैनल देखने के लिए लोगों को मौजूदा से भी ज्यादा राशि चुकानी पड़ जाए। दूरसंचार (प्रसारण एवं केबल) सेवा टैरिफ आदेश को इसके उपभोक्तान्मुखी लक्ष्य के कारण देश की बड़ी अदालतों की मान्यता प्राप्त है और यह 29 दिसंबर से प्रभावी होगा। इसके मुताबिक डीटीएच सेवा प्रदाता और प्रसारक चैनलों का मूल्य पारदर्शी ढंग से निर्धारित करेंगे जो सभी वितरण प्लेटफॉर्म पर बिना किसी भेदभाव के काम करेगा। यह कीमत केबल टीवी के किराये और मूल्य के समरूप होगी। इसमें दो राय नहीं कि प्रसारण प्लेटफॉर्म और टेलीविजन चैनलों ने अक्सर अपने राजस्व के लिए उपभोक्ताओं की अनदेखी की। एक और बात, ट्राई की यह दलील भी सही हो सकती है कि जरूरी नहीं कि चैनलों को एक साथ समूह के रूप में ग्राहकों को देना हमेशा लागत की दृष्टिï से किफायती ही साबित हो। कई मामलों में इसका उलट भी हो सकता है। किसी भी तरह के गलत व्यवहार के आकलन के लिए नियामक को कदम उठाना चाहिए लेकिन उसे उद्योग जगत के गणित के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। उदाहरण के लिए नियामक को यह पता होना चाहिए कि डीटीएच सेवा प्रदाता और केबल क्षेत्र के सेवा प्रदाताओं को समान नहीं माना जा सकता है क्योंकि वे अलग-अलग काम करते हैं और उनके कारोबारी मॉडल भी अलग हैं।
 
इसके अलावा किसी भी अन्य कारोबार की तरह प्लेटफॉर्म मालिक और प्रसारकों के पास यह अधिकार होता है कि वे आपसी सहमति के समझौते कर सकें। ट्राई के आदेश के बाद ऐसी बातचीत की गुंजाइश बहुत सीमित हो जाएगी।  इस निर्णय के अन्य पहलुओं को देखें तो प्रसारक और प्लेटफॉर्म मालिक इस बात को लेकर चिंतित हैं कि उनके कारोबार को नुकसान हो सकता है क्योंकि सामूहिक मूल्य निर्धारण के चलते वे पैकेज में कुछ ऐसे चैनल भी शामिल कर देते हैं जिनकी टीआरपी या लोकप्रियता कम होती है। इससे संतुलन बना रहता है। अगर नई व्यवस्था के तहत टीआरपी व्यवस्था कुछ समय के लिए स्थगित होती है तो इसका असर विज्ञापनों पर भी पड़ेगा। शुल्क दरों में नियामक का हस्तक्षेप शायद इस उद्योग के भविष्य के लिए बेहतर न हो। दूरसंचार क्षेत्र की तरह नियामक को यहां भी उद्योग जगत से दूरी बनाकर रखनी चाहिए। टेलीविजन चैनलों का मूल्य निर्धारित करने में ट्राई की भूमिका बहुत हल्की होनी चाहिए। ऐसा नहीं है कि ट्राई ने दूरसंचार की शुल्क दरों में हस्तक्षेप का प्रयास नहीं किया। परंतु दूरसंचार विवाद निस्तारण और अपील पंचाट ने हाल ही में आक्रामक मूल्य निर्धारण संबंधी उसके निर्णय को पलट दिया था। 
Keyword: TRAI, TV, viewership, DTH,,
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