बिजनेस स्टैंडर्ड - खोई जमीन को वापस पाने की उम्मीद में उपेंद्र कुशवाहा
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खोई जमीन को वापस पाने की उम्मीद में उपेंद्र कुशवाहा

आदिति फडणीस /  12 23, 2018

कुशवाहा ने हाल में राजग छोड़कर संप्रग से जुडऩे की घोषणा की है

बिजनेस स्टैंडर्ड खोई जमीन को वापस पाने की उम्मीद में उपेंद्र कुशवाहाहाल के दिनों में लगातार सुर्खियों में रहे उपेंद्र कुशवाहा सीटों के बंटवारे को लेकर महीनों के मोल भाव, तनातनी और नाराजगी के बाद अंतत: राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) से नाता तोड़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के पाले में चले गए। इस घटनाक्रम के निहितार्थ क्या हैं और क्या वाकई में यह कोई मुद्दा भी है? बिहार में उनकी राजनीतिक हैसियत क्या है? एक ओर जहां राज्य के यादव वर्ग राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रमुख लालू प्रसाद के समर्थक माने जाते हैं वहीं कुर्मी और दलित वर्ग में जनता दल (यूनाइटेड) के अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मजबूत पकड़ है। लेकिन वहां कोइरी एक ऐसी जाति है जिसे नीतीश का प्रबल विरोधी माना जाता है। इस जाति का प्रतिनिधित्व करते हैं पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा। 

कुशवाहा कभी लालू प्रसाद के भरोसेमंद लोगों में शुमार किए जाते थे। कहा जाता है कि वह कांग्रेस के प्रबल विरोधी होने के कारण ही लालू के सामाजिक न्याय के बैनर तले खड़े थे। लेकिन जब लालू ने कांग्रेस के साथ नजदीकियां बढ़ानी शुरू की तब कुशवाहा ने अपना रास्ता अलग कर लिया। उसी दौरान नीतीश कुमार के सत्ता में आने से पहले बिहार विधानसभा में उन्हें सुशील मोदी के स्थान पर विपक्ष का नेता चुना गया।

साल 2005 में कुशवाहा को एक जोरदार धक्का लगा। उस विधानसभा चुनाव में वह अपनी ही सीट पर मात खा गए। नीतीश ने अपनी सीट गंवाने वाले रामाश्रय प्रसाद सिंह सहित कई और नेताओं को तो मंत्री परिषद में शामिल किया लेकिन कुशवाहा को इसमें जगह नहीं मिली।

सही या गलत जो भी हो, लेकिन कुशवाहा के मन में असंतोष का बीज पड़ गया था। यह असंतोष तब और गहरा गया जब कुशवाहा को उम्मीद थी कि नीतीश कुमार उन्हें तवज्जो देंगे लेकिन नीतीश ने उनके बजाय दूसरों को तरजीह दी। भले ही नीतीश ने उन्हें राज्य सभा में भेजा लेकिन उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा होने के दो वर्ष पहले ही राज्य सभा से त्यागपत्र दे दिया। 2013 में उन्होंने राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) के नाम से एक अलग राजनीतिक दल की नींव रखी। उसके बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ चुनावी गठबंधन किया। 

बिहार में कोइरी एक पिछड़ी जाति (इस जाति के ज्यादातर लोग भूमिहीन हैं और छोटे कारोबार करते हैं) है, लेकिन इनमें दूसरों को धमकाने की प्रवृत्ति नहीं होती है। इनका स्वभाव यादवों की तरह नहीं होता जो आक्रामक दिखाई पड़ते हैं। केवल कुछ विधानसभा क्षेत्रों में ही कोइरी मतदाता बहुसंख्यक हैं जो चुनावी गणित को बिगाड़ सकते हैं। पूरे बिहार में इनकी संख्या असमान रूप से बंटी हुई है। ज्यादातर विधानसभाओं में इनकी संख्या 2,000 से 4,000 मतों के बीच है। तकरीबन 25 सीटों पर ही इनकी संख्या 10,000 से अधिक है। भाजपा में एक भी कोइरी नेता नहीं है। 

2014 के लोकसभा चुनाव में रालोसपा को तीन सीटों पर जीत मिली थी। भूमिहार जाति से आने वाले अरुण कुमार जहानाबाद से और कुशवाहा काराकाट सीट से सांसद चुने गए थे। सीतामढ़ी की सीट भी रालोसपा के खाते में गई थी जिसके बाद रालोसपा के भीतर विभाजन हो गया। भाजपा यह बात जानती थी कि जबतक कुशवाहा राजग का हिस्सा हैं, कोई भी कोइरी मत कहीं और जाने वाला नहीं है।  

2015 के विधानसभा चुनावों में रालोसपा को 2 फीसदी मत मिले थे। लेकिन रालोसपा के लिए और भी बुरा दौर अभी आना बाकी था। भाजपा और जदयू ने 2019 का लोकसभा चुनाव साथ लडऩे का निर्णय कर लिया और चर्चाओं से छनकर आने वाली खबरों की मानें तो कुशवाहा की पार्टी को चुनाव लडऩे के लिए केवल दो सीटें दी जानी थी। वहीं भाजपा और जदयू 16-16 सीटों पर और गठबंधन के तीसरे घटक लोक जनशक्ति पार्टी के हिस्से बची हुई छह सीटें आनी थी।

जब कुशवाहा से सीटों के बंटवारे को लेकर उनकी राय पूछी गई तो उन्होंने कहा, 'मैंने अपने जीवन में कभी भी 20-20 क्रिकेट नहीं खेला और न ही अब इसे खेलने को इच्छुक हूं। इसके बजाय मैं गिल्ली डंडा खेलना चाहूंगा।' तभी उनकी मंशा जाहिर हो गई थी। इस बात को भांप कर कि बिहार में दलों के बजाय मोर्चों के बीच लड़ाई होनी है और राजग नुकसान में रहने वाला मोर्चा हो सकता है, उन्होंने अपना पाला बदल लिया।  

राज्य के पिछले विधानसभा में मत प्रतिशत की बात करें तो महागठबंधन को जहां औसतन 41.9 फीसदी मत मिले थे वहीं राजग के हिस्से में 34.1 प्रतिशत मत आए थे। मत हिस्सेदारी के मामले में महागठबंधन के प्रदर्शन ने 2010 में भाजपा-जदयू की जोड़ी को मिले ऐतिहासिक मत हिस्सेदारी को पीछे छोड़ दिया। महागठबंधन की 41.9 फीसदी की औसत मत हिस्सेदारी 73.2 फीसदी सीटों में तब्दील हुई थी, जो कि 2010 में जीतने वाले गठबंधन से कम है। इस गठबंधन की औसत मत हिस्सेदारी 39.1 फीसदी रही लेकिन उसने 84.8 फीसदी सीटों पर जीत दर्ज की। लेकिन इस सबके बीच रालोसपा जैसे छोटे समूहों को महसूस हुआ कि उन्होंने अपनी जमीन खो दी है।  

निस्संदेह संप्रग में कुशवाहा के आ जाने के बावजूद उनको लेकर राजद, कांग्रेस एवं अन्य दलों में संदेह बना हुआ है क्योंकि कुशवाहा पहले लालू की पार्टी को पीठ दिखा चुके हैं। लेकिन कुशवाहा के लिए यह लड़ाई जीवन मरण का सवाल है। भले ही उनके विधायकों ने कह दिया है कि वे राजग में बने रहेंगे (इसका मतलब है कि कुशवाहा को फिर से अपनी पार्टी खड़ी करनी पड़ेगी), कुशवाहा के लिए ज्यादा तर्कसंगत यह होगा कि वे उन लोगों के साथ खड़े हों जो उन्हें मौजूदा विकल्पों से अधिक की पेशकश करे। 

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