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न्यायालय : मुश्किल वक्त से मुकाबले की तैयारी

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  December 23, 2018

न्यायाधीश और स्कूली बच्चे एक साल में सबसे अधिक (करीब 175) छुट्टियों का लुत्फ उठाते हैं। यह तार्किक भी है क्योंकि दोनों को होम वर्क का भारी बोझ उठाना पड़ता है। पाठ्यपुस्तकों में क्यूआर कोड शुरू होने से विद्यार्थियों की पीठ पर बस्ते का भार कम होने और उन्हें भविष्य में कवच की जरूरत नहीं पडऩे की उम्मीद है।  लेकिन उच्चतम न्यायालय के बरामदों में भरे टनों कागज ने 2017 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के इस वादे को झुठला दिया है कि 3 जुलाई, 2017 से अदालतें 'कागजरहित' हो जाएंगी। असल में अदालत ने प्रगति मैदान से आधी जगह अपने कोने मुड़े हुए कागजों को रखने के लिए घेरी हुई है। न्यायाधीश अब भी अपनी कारों में कागजी फाइलों और किताबों का भारी बोझ घर ले जाते हैं। वे अदालत में चार घंटे तक दलीलें सुनने के बाद फैसले लिखने का काम घर पर करते हैं। इस साल अब तक उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश फैसलों के करीब 6,000 पृष्ठ लिख चुके हैं। ऐसे में किसी भी व्यक्ति को इस बात से ईष्र्या का भाव नहीं रखना चाहिए कि कुछ दिन पहले न्यायाधीश दूसरे सबसे लंबे अवकाश पर चले गए हैं।

 
यह सीजन इस साल के घटनाक्रम के आकलन का भी है। डिकेंस के शब्दों में यह अच्छे और खराब घटनाक्रम के विरोधाभासों का वर्ष रहा। अदालत ने आधार मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें निजता के अधिकार को नागरिकों के जीवन के विभिन्न पहलुओं से जोड़ दिया गया। छत की चाहत वाले मध्य वर्ग के लोगों के साथ धोखाधड़ी के लिए रियल्टरों को जेल भेजा गया। एलजीबीटी समुदाय ने अपने आत्मसम्मान की लंबी लड़ाई जीत ली है। विवाह से इतर संबंधों को अपराध मुक्त कर दिया गया है। फिल्मों के विरोध जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमलों का बहादुरी से मुकाबला किया गया है। अदालत के दबाव में मुंबई की हाजी अली दरगाह में महिलाओं के प्रवेश को मंजूरी दी गई। न्यायालय ने सबरीमला में युवा महिलाओं के प्रवेश को मंजूरी दी गई है। तलाक को असंवैधानिक घोषित किया गया। अब हमें सिनेमाघर में बॉलीवुड फिल्म शुरू होने पर राष्ट्रीय गान गाने की जरूरत नहीं है। 
 
यह साल समाप्त होने जा रहा है। इसने 1975 के आपातकाल के बाद सबसे बुरा दौर भी देखा है। आपातकाल के दौरान आंतरिक मतभेदों और बाहरी दबावों के कारण न्यायपालिका बिखरी हुई थी। इस साल की शुरुआत उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ चार सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशों की बगावत से हुई। मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लाने की नाकाम कोशिश हुई। जब यह तूफान शांत हो रहा था, तब भी हवा के कुछ झोंके आ रहे थे। उस समय बगावत करने वाले न्यायाधीशों में से एक ने सेवानिवृत्ति के बाद खुली बगावत को यह कहते हुए सही ठहराया कि उनके पास यही अंतिम रास्ता था। उन्होंने कहा कि मुख्य न्यायाधीश कुछ बाहरी ताकतों के इशारों पर काम कर रहे थे। नए मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई फिलहाल इस संस्थान को शांतिपूर्वक चला रहे हैं। लेकिन वह कब तक इसे शांतिपूर्वक चला सकते हैं, इसमें संदेह है। 
 
आगामी महीनों में उठापटक के डर के पीछे वजह हैं। सबरीमला मामला जनवरी में फिर से खुलने के आसार हैं। इस मामले ने केरल को ही नहीं हिला दिया, बल्कि इस देश के धामिक प्रवृत्ति के लोगों के दिलों को भी झकझोर दिया है। इस अदालत के आदेशों को इस स्तर की चुनौती अभी तक कभी नहीं दी गई। इससे भी चिंताजनक अयोध्या मामला है, जिसे कुछ समय के लिए सुरक्षित रखा गया है। उच्चतम न्यायालय ने अंतिम सुनवाई शुरू करने की कोई अंतिम तारीख तय नहीं की है। न्यायालय ने केवल इतना कहा है कि वह अगले महीने इसकी तारीख तय करेगा। इस मामले से संबंधित दस्तावेज करीब 20,000 पृष्ठ के हैं, जो हिंदी, संस्कृत, उर्दू, पारसी, पाली और अरबी समेत आठ भाषाओं में हैं।  उच्चतम न्यायालय में संपत्ति के विवादों के निपटने में लगने वाले समय को देखते हुए  इस मामले के जल्द निपटारे के लिए दैवीय हस्तक्षेप की जरूरत होगी। न्यायालय ने साफ किया है कि वह केवल संपत्ति विवाद के रूप में 13 याचिकाओं पर सुनवाई करेगा और धार्मिक पक्ष पर विचार नहीं किया जाएगा। इसके बाद बाहर क्या होगा, इसके बारे में कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। 
 
हर चुनाव के बाद हारने वाला पक्ष विभिन्न आपत्तियां लेकर अदालत जाता है। कांग्रेस पहले ही तेलंगाना में मतदाता सूची को लेकर बिगुल बजा चुकी है। अगले साल आम चुनाव भी कुछ अलग नहीं रहेंगे। अगर किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और राष्ट्रपति को सबसे अधिक सांसदों वाले दल को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना पड़ा तो हालात और पेचीदा बनेंगे।   यह एक दुर्लभ संवैधानिक मौका होगा, जब राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल की 'सहायता एवं सलाह' के बिना खुद फैसला लेना होगा। ऐसे हालात में राज्यपालों की भूमिका को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी जाती रही है और बहुत से राज्यपाल आत्मसम्मान के साथ अपना बचाव नहीं कर पाए हैं। न्यायपालिका को आगामी महीनों में ऐसे संवैधानिक संकट का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। 
Keyword: supreme court, high court,,
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