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राहुल को सुननी चाहिए मनमोहन सिंह की बात

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  December 23, 2018

अधिकांश टीकाकारों ने पांच साल पहले ही पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का राजनीतिक मृत्यु लेख लिख दिया था। मैं भी उनमें शामिल था। क्या हमने कल्पना की थी कि हम 2018 के अंत में नए चुनाव की तैयारी के बीच उनकी संभावित वापसी के बारे में लिख रहे होंगे? अब वह 'मौन मोहन' नहीं रहे। वह नपेतुले अंदाज में ही सही, बोलने लगे हैं। वह जब भी बोलते हैं, पूरा भारत सुनता है। उनके नीरस औपचारिक भाषण भी वायरल हो जाते हैं। उनके तमाम बयान सोशल मीडिया पर नजर आते हैं।

 
वह अचानक कांग्रेस के चुनाव प्रचारक नहीं बने हैं लेकिन संसद और उसके बाहर उनकी बातों का वजन बढ़ा है। ऊर्जित पटेल के इस्तीफे पर उनके संक्षिप्त प्रभावशाली वक्तव्य को देखिए। या फिर बीते दिनों उनकी किताबों के लोकार्पण का मौका जब उन्होंने कहा कि वह चुप्पे नहीं थे और कभी मीडिया के सवालों का जवाब देने में घबराए नहीं। उनके बयान में राजनीतिक हाजिरजवाबी साफ झलक रही थी और वह कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना का शानदार उदाहरण था। उन्होंने मोदी पर हमला करने के लिए अपनी कमजोरी का प्रयोग किया। 
 
एक 86 वर्षीय गैर राजनीतिक नेता के लिए यह वापसी बुरी नहीं है। पार्टी के युवा नेता जो उनके दूसरे कार्यकाल में उनसे असहमत दिखते थे और प्रणव मुखर्जी के रूप में कहीं 'अधिक राजनैतिक' प्रधानमंत्री की मांग कर रहे थे। वे जो 10 जनपथ जाकर उनके निर्णयों को खारिज कराते थे, उन्होंने अपना समय राजनीतिक बियाबां में किताबें लिखते हुए बिताया। वे उनसे अपनी किताब का लोकार्पण कराने की राह तकने लगे क्योंकि उनके पास वक्त था और उनका एक कद था। उन्हें लगता कि उनकी किताब थामे सिंह की तस्वीरें उनकी ही गरिमा बढ़ाएंगी। हाल के दिनों में ऐसे आयोजनों में उनकी मौजूदगी सुर्खियां बटोरने लगी हैं। इससे किताब को सुर्खियां मिल रही हैं और पार्टी की राजनीति को मजबूती।
 
वह आज भी जन नेता नहीं हैं। वह बहुत कम बोलते हैं और सावधानी से बोलते हैं। शुरू से यही उनकी शैली रही है। जब हर्षद मेहता से जुड़े घोटाले ने शेयर बाजार को हिला दिया और उनकी सरकार संदेह के दायरे में थी तब उन्होंने संसद में केवल यह कहा था कि वह शेयर बाजार के लिए अपनी नींद नहीं गंवाएंगे। परंतु जब परमाणु समझौते को लेकर उनकी सरकार मतदान का सामना कर रही थी तब उन्होंने गुरु गोविंद सिंह की सबसे भावुक पंक्तियों में से एक का प्रयोग किया, 'देह शिव वर मोहे...निश्चय कर अपनी जीत करूं।' इसके बाद उन्होंने आडवाणी की चुटकी लेते हुए कहा कि वह अपने भविष्यवक्ता की उस बात पर भरोसा किए बैठे हैं कि एक दिन देश के प्रधानमंत्री बनेंगे।
 
वर्ष 2009 में उनके दूसरे कार्यकाल में पार्टी ज्यादा सीटों के साथ सत्ता में आई। लोगों ने उन्हें दोबारा सत्ता में कमजोर नेता होने की वजह से नहीं भेजा। उन्होंने तो देश के सामरिक रुख में पूर्ण बदलाव के लिए अपनी सरकार तक दांव पर लगा दी और वाम दलों की समर्थन वापसी का सामना किया। परमाणु समझौते में सबसे महत्त्वपूर्ण था अमेरिका का सहयोगी बनना। सिंह को इसी बात का पुरस्कार मिला कि वह एक मजबूत नेता साबित हुए। अपनी नीतियों को पलटने के बजाय उन्होंने उन्हें आगे बढ़ाया।
 
उसके बाद क्या कुछ हुआ इस बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है। मैं भी इस बारे में विस्तार से लिख चुका हूं कि कैसे जब उनका पार्टी नेतृत्व उन्हें और उनके कार्यकाल को नीचा दिखा रहा था तब इस्तीफा न देकर उन्होंने खुद को और अपने प्रशंसकों को नीचा दिखाया। वह आलेख मैंने उस समय उत्तेजित होकर लिखा था जब कोयला घोटाला मामले में सीबीआई उनसे पूछताछ कर रही थी। मोदी ने भी संसद में उनका मजाक उड़ाते हुए कहा था कि वह खुद को पाकसाफ बताते हैं जबकि उन्होंने भ्रष्टाचार होने दिया। उन्होंने इसकी तुलना रेनकोट पहनकर नहाने से की थी। कुल मिलाकर सिंह आसान शिकार थे।
 
तो आखिर अब क्या बदलाव आया है? इसकी शुरुआत 2016 के अंतिम दिनों में नोटबंदी से हुई। उन्होंने संक्षिप्त लेकिन मारक बात कही कि नोटबंदी एक संगठित और व्यवस्थित लूट है। शायद तब पहली बार उनकी पार्टी को भी उनके कद का अंदाजा हुआ। अर्थशास्त्र उनका क्षेत्र है इसलिए नोटबंदी पर बोलना आसान था। बाद में हालात बिगड़े, प्रमुख अर्थशास्त्री सरकारी पद छोड़कर जाने लगे, आंकड़ों से छेड़छाड़ की गई और संकट का माहौल बन गया। तब उनकी बात को और अधिक तवज्जो मिली। किसी भी अन्य क्षेत्र की तरह राजनीति के बाजार में भी तमाम चीजों के बीच अंतर होता है। इस कड़वाहट भरी राजनीति के दौर में भी उन्हें गंभीरता से लिया जा रहा है तो इसकी एक वजह यह है कि वह गरिमापूर्ण व्यवहार करने वाले नेता हैं। जब नरेंद्र मोदी सोनिया गांधी को 'विधवा' कह रहे हैं और राहुल गांधी मोदी के लिए 'चौकीदार चोर है' का प्रयोग कर रहे हैं तब मनमोहन सिंह की आलोचना भी स्तरीय होती है। वह इकलौते ऐेेेसे व्यक्ति नहीं हैं। किसानों के असंतोष के बावजूद शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश में लगातार चौथा कार्यकाल हासिल करने का जादू दिखाते-दिखाते रह गए तो इसमें उनके स्वभाव की विनम्रता का भी योगदान है।
 
अपने 'वाक द टॉक' साक्षात्कार में मैंने पीवी नरसिंह राव से पूछा था कि न तो उनका व्यक्तित्व करिश्माई था, न ही वह कुशल वक्ता या ऊंचे राजनीतिक कद के मालिक थे तो आखिर वह शीर्ष पर कैसे आए? 'मैं सुकून लेकर आया' उनका जवाब था। मनमोहन सिंह के राजनीतिक निर्देशक के रूप में वह पार्टी के लिए उनके इस योगदान को देखकर खुश होते। क्योंकि अगर राव संकटग्रस्त देश में सुकून लाए तो सिंह ने भी पुनरुत्थान से गुजर रही पार्टी को जरूरी विश्वसनीयता प्रदान की। परंतु दोनों पूर्व प्रधानमंत्रियों के सेवानिवृत्ति के पश्चात के जीवन में काफी अंतर है। सत्ता गंवाने के बाद कांग्रेस को राव की कोई उपयोगिता नहीं लगी। पार्टी ने उन्हें त्याग दिया। वह भ्रष्टाचार के मुकदमे खुद लड़ते रहे और एकांत में उनकी मृत्यु हुई। हालांकि वह सभी मामलों में बरी हो गए। पार्टी ने सिंह के साथ भी यही किया होता। अपने गरीब विरोधी आर्थिक सुधारों, घोटाले रोकने में अक्षमता आदि के कारण उन्हें आसानी से 2014 की करारी हार का दोषी ठहराया जा सकता था। ए के एंटनी एक और रिपोर्ट पेश कर सकते थे जो उनकी पहली रिपोर्ट जैसी होती जिसमें सन 1996 की हार के लिए राव के सूटबूट वाले अर्थशास्त्र को जवाबदेह ठहराया गया था।
 
तीन बातों ने अंतर पैदा किया। पहला, गांधी परिवार के साथ उनका व्यक्तिगत लगाव। दूसरा, नोटबंदी पर उनके शुरुआती वक्तव्य का असर और तीसरा, 2जी और कोयला घोटाले समेत उनके कार्यकाल के बड़े घोटालों का अदालतों में नाकाम रहना। सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी की कांग्रेस उनकी बात सुनेगी? बेहद सादगी से रहने वाले सिंह आधुनिक भारत को संपन्न  बनाने वाले सबसे प्रमुख व्यक्ति हैं। वह वैध कारोबारी और कर चुकाने वालों के प्रति उदार रहे हैं। सन 1991 के बाद के सारे आंकड़े देख लीजिए, वह अमीर नहीं हैं लेकिन इस आडंबरपूर्ण सामाजिक राजनीतिक व्यवस्था में संपत्ति जुटाने वालों के प्रति कोई पूर्वग्रह भी नहीं रखते। वह इकलौते प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने पूरी प्रतिबद्धता से अर्थव्यवस्था में कारोबारी जिजीविषा जगाने की बात कही। वह यह भी समझते हैं कि वृद्धि से असमानता पैदा होती है। वह मानते हैं कि ऐसे में राज्य को हस्तक्षेप करके गरीबों की सहायता करनी चाहिए, उन्हें बाजार की दया पर नहीं छोड़ा जा सकता।
 
राहुल गांधी के नेतृत्व में उनकी पार्टी अंबानी-अदाणी के खिलाफ वैसे ही गरजती बरसती है जैसे सन 1970 के दशक में टाटा-बिड़ला के खिलाफ बरसती थी। यह त्रासद अतीत का दोहराव है। किसानों की कर्ज माफी की जा रही है और सरकारी उपक्रमों का गौरव लौट रहा है। जब राहुल गांधी राफेल जैसे उन्नत पश्चिमी लड़ाकू विमान बनाने के लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को सर्वश्रेष्ठ कंपनी बताते हैं तो सिंह सोचते होंगे कि ऐसा नहीं है। ऐसे में सवाल यह है कि अब जबकि खोने को कुछ नहीं है तो क्या सिंह राहुल गांधी को आधुनिक सुधारवादी अर्थशास्त्र का पाठ पढ़ाएंगे? या फिर वह एक बार फिर 2010-14 की तरह आत्मदया भरी असहायता दिखाएंगे जो कहती थी, 'मैं क्या कर सकता हूं?' हमें यह भी देखना होगा कि क्या इस बार राहुल गांधी उनकी बात सुनेंगे।
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