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टेलीविजन रेटिंग को लेकर इतना मुग्ध क्यों है नियामक?

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  December 21, 2018

टेलीविजन रेटिंग से जुड़ा नया मामला है। गत 3 दिसंबर को भारत के प्रसारण नियामक भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने टीवी रेटिंग को लेकर एक और विमर्श पत्र जारी किया। यह टीवी रेटिंग के बारे में ट्राई की तरफ से जारी चौथी रिपोर्ट है। पिछली रिपोर्ट आने के बाद तीन साल पहले टीवी रेटिंग इकाई ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (बार्क) का गठन हुआ था। सवाल है कि इस नई रिपोर्ट के पीछे क्या वजह रही है? विमर्श-पत्र में कहा गया है कि 'मौजूदा रेटिंग प्रणाली की तटस्थता एवं विश्वसनीयता को लेकर कई हितधारक चिंता जताते रहे हैं। इनकी शिकायतें पैनल के विस्तार एवं छेड़छाड़ से संबंधित रही हैं।' ट्राई के मुताबिक प्रसारकों को विज्ञापन से मिलने वाले तगड़े राजस्व की वजह से रेटिंग के पैमाने को दुरुस्त करना जरूरी है।

 
सलाहकार फर्म ईवाई के मुताबिक भारतीय टेलीविजन उद्योग के 660 अरब रुपये के कारोबार में से 267 अरब रुपये अकेले विज्ञापन से आए थे। यह राशि बिना किसी मुश्किल के प्रसारकों के पास पहुंच गई। बाकी 393 अरब रुपये केबल एवं डीटीएच ऑपरेटरों के जरिये जुटाए गए थे लेकिन उनमें से 99 अरब रुपये यानी महज 25 फीसदी राशि ही प्रसारकों की जेब में गई। यह हिस्सेदारी लंबे समय तक 5-15 फीसदी के दायरे में ही सिमटी हुई थी लेकिन डीटीएच सेवा की शुरुआत (2003) और केबल डिजिटलीकरण (2011) के बाद इसमें सुधार आता गया। दुनिया के अधिकांश बाजारों में प्रसारकों की भुगतान में हिस्सेदारी 50-60 फीसदी के बीच होती है। लेकिन भारत में 25 फीसदी राशि ही प्रसारकों के पास पहुंच रही है जबकि इसे 60 फीसदी होना चाहिए। सवाल है कि इस बड़े फासले में शामिल बड़ी नकदी की कोई पहचान ही नहीं हो पाती है। 
 
पारदर्शिता की कमी और उसके चलते बहुत कम भुगतान राजस्व होने से भारत संख्या के मामले में दुनिया का दूसरा बड़ा टीवी बाजार होते हुए भी राजस्व के मामले में हंसी का पात्र बना हुआ है। समकक्ष बाजारों में प्रति उपभोक्ता औसत राजस्व और प्रसारकों का मार्जिन भारत की तुलना में कई गुना होता है। इससे पता चल जाता है कि दुनिया की किसी बड़ी केबल फर्म ने अब तक भारत में निवेश क्यों नहीं किया है? तीन साल पहले भारत सरकार केबल प्रसारण में सौ-फीसदी विदेशी निवेश की अनुमति दे चुकी है। भुगतान राजस्व का एकसमान वितरण होने से जमीनी स्तर पर इस उद्योग में नए रोजगार अवसर पैदा होंगे, सेवाएं बेहतर होंगी, निवेश बढ़ेगा, कर संग्रह बढ़ेगा और कार्यक्रमों का स्तर भी सुधरेगा। अगर प्रसारण नियामक टीवी उद्योग में धन की समस्या को लेकर चिंतित है तो वह लापता 250-300 अरब रुपये पहुंचाने की दिशा में भी काम कर सकता है। ट्राई के विमर्श-पत्र को पढऩे के बाद सबसे पहले यही सवाल खड़ा होता है। दूसरा सवाल यह है कि रेटिंग व्यवस्था सुधारने पर ही ट्राई का जोर क्यों है? रेटिंग इस उद्योग की एक ऐसी मुद्रा है जिसका इस्तेमाल विज्ञापन स्लॉट बेचने और खरीदने में किया जाता है। बार्क का गठन इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन, इंडियन सोसाइटी ऑफ एडवर्टाइजर्स और एडवर्टाइजिंग एजेंसिज एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने मिलकर किया है। अगर किसी प्रसारक, एजेंसी या मार्केटिंग कंपनी को कोई शिकायत है तो शेयरधारक होने के नाते वे बार्क की खबर ले सकते हैं।
 
दुनिया भर में मीडिया कारोबार की पैमाइश या तो बार्क जैसी संयुक्त इकाई या न्यूमेरिस जैसी गैरलाभकारी फर्म या नील्सन जैसी निजी फर्म के जरिये की जाती है। इसमें सरकारों और नियामकों की भूमिका शायद ही होती है। क्या सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने इस तरफ ध्यान दिया कि वर्ष 2014-17 के दौरान पाठकों की संख्या का कोई आंकड़ा ही नहीं जारी किया गया? या फिर फिल्म उद्योग की कमाई का पैमाना माने जाने वाले बॉक्स ऑफिस की गुणवत्ता इतनी खराब क्यों है? ये सभी तथ्य संबंधित उद्योग के कारोबार को प्रभावित करते हैं। लेकिन उद्योग को एक उपयुक्त मापन पद्धति की मांग, उसका गठन और उसके लिए भुगतान भी करना होता है। और अगर उद्योग ऐसा नहीं करता है तो फिर वह उसी पैमाने का हकदार है जो उसे मिल रहा है। शोध बताते हैं कि वैश्विक स्तर पर मजबूत मापन और उद्योग की वृद्धि के बीच सशक्त सह-संबंध होता है। फिर भी भारत में अधिकांश प्रसारक, प्रकाशक, रेडियो ऑपरेटर और निर्माण स्टूडियो आंकड़े जुटाने पर खर्च करने में काफी कोताही बरतते रहे हैं। इस पैमाने के सूक्ष्म-प्रबंधन में उलझना प्रसारण क्षेत्र के नियामक के लिए उचित नहीं है। खासकर 15 साल पहले टेलीविजन वितरण में फैली अव्यवस्था दूर करने में सराहनीय काम करने वाले नियामक को इसमें नहीं उलझना चाहिए। 
 
हालांकि बार्क ने टीवी रेटिंग में इस बदलाव का स्वागत कुछ खास कारणों से किया है। बार्क के मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) पार्थ दासगुप्ता कहते हैं, 'ट्राई के विमर्श-पत्र में रखे गए कई मुद्दों को हम पहले भी उठा चुके हैं। हम पैनल टेंपरिंग पर काबू पाने में उनकी मदद की राह देख रहे हैं। भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों और आरपीडी के जरिये नमूनों का दायरा बढ़ाकर ऐसा किया जा सकता है।' इसका मतलब है कि केबल एवं डीटीएच ऑपरेटरों को सेट-टॉप बॉक्स एवं सर्वर से लिए गए आंकड़े बार्क से साझा करना अनिवार्य कर दिया जाए। ऐसा होने पर एक बड़ा नमूना जुटाया जा सकेगा। इससे टीवी कार्यक्रम एवं ऑनलाइन वीडियो देखने वाले दर्शकों का मिला-जुला आंकड़ा भी जुटाने की संभावना पैदा होगी। कनाडा के प्रसारण नियामक ने हाल ही में आरपीडी को अनिवार्य कर दिया है। इनमें से काफी कुछ तो बार्क और उसके शेयरधारक भी कर सकते हैं। छोटे-छोटे मामलों में विनियामक को क्यों घसीटा जाए? लेकिन भारतीय बाजार तो ऐसा ही है। 
Keyword: media, tv, rating,,
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