बिजनेस स्टैंडर्ड - भूराजनीतिक तनाव का तेल कीमतों पर प्रभाव
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भूराजनीतिक तनाव का तेल कीमतों पर प्रभाव

डीपी श्रीवास्तव /  December 21, 2018

अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव और ओपेक तथा गैर ओपेक देशों से उत्पादन में कटौती के बीच आने वाले दिनों में तेल कीमतों के ऊंचा बने रहने की उम्मीद है। विस्तार से बता रहे हैं डीपी श्रीवास्तव

 
तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक ने गत 7 दिसंबर को कच्चे तेल का उत्पादन कम करने का निर्णय लिया ताकि कीमतों में इजाफा हो सके। यह निर्णय पहले से अपेक्षित था लेकिन इसका वांछित असर होगा या नहीं यह देखने वाली बात होगी। यह कटौती जनवरी 2019 से प्रभावी होगी। कीमतों में मौजूदा तेजी लीबिया के निर्यात में 4 लाख बैरल के नुकसान की वजह से आई है। निर्यात में यह कमी शरारा तेल क्षेत्र के विद्रोहियों के हाथ लग जाने से आई है। लीबिया में रोज 11 लाख बैरल तेल उत्पादन होता है, उस लिहाज से यह मात्रा कम नहीं है। 
 
तेल कीमतों में कमी ने तेल आयातक देशों पर से दबाव कम किया है। भूराजनैतिक हालात भी कीमतों में अहम भूमिका निभाते हैं। ओपेक देशों की बैठक की पूर्व संध्या पर ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने कहा, 'अगर अमेरिका ईरान का तेल निर्यात रोकना चाहता है तो फारस की खाड़ी से तेल निर्यात नहीं किया जाएगा।' यह हाल के महीनों में दूसरा मौका है जब उन्होंने इतना कड़ा वक्तव्य दिया है। गत 4 अक्टूबर को 84.09 डॉलर प्रति बैरल के उच्च स्तर पर पहुंचने के बाद से इसमें लगातार गिरावट आ रही है। इस बीच अमेरिकी कांग्रेस के चुनाव करीब हैं। इस बीच अत्यधिक उत्पादन के कारण कीमतों में कमी आई। महीने के अंत तक कीमतें 10 प्रतिशत गिरकर 75.51 डॉलर प्रति बैरल पर आ गईं। बहरहाल महीने का 79.39 बैरल का औसत अक्टूबर 2014 के बाद का उच्चतम रहा।
 
कम कीमतों के रुझान को अमेरिकी प्रतिबंधों से आठ देशों को मिली रियायत ने भी बल दिया। यह रियायत 5 नवंबर से लागू हुई। इस अवधि में ओपेक का उत्पादन औसतन 32.96 बैरल रोजाना रहा। इस दौरान तेल कीमतें 72.64 डॉलर प्रति बैरल से कम होकर 58.33 डॉलर प्रति बैरल हो गईं। नवंबर महीने में ओपेक के संदर्भ बास्केट की औसत दर में 14.08 डॉलर प्रति बैरल या 17.7 फीसदी की गिरावट आई और यह 65.33 डॉलर हो गई। यह मार्च 2018 के बाद की न्यूनतम कीमत थी।  दुनिया के कुल कच्चे तेल का 40 फीसदी उत्पादित करने वाले ओपेक को रूस के नेतृत्व वाले गैर ओपेक उत्पादक देशों के साथ तालमेल कायम करना होगा ताकि उत्पादन स्तर व्यवस्थित रह सके और कीमतों को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया जा सके। ओपेक तथा इस समूह ने 7 दिसंबर को वियना में बैठक की और तय किया कि अक्टूबर 2018 की तुलना में उत्पादन में 12 लाख बैरल प्रति दिन की कटौती की जाए। इसमें ओपेक की हिस्सेदारी 8 लाख बैरल प्रति दिन है जबकि रूस के नेतृत्व वाले गैर ओपेक देशों की हिस्सेदारी 4 लाख डॉलर रोजाना थी। रूस 2.30 लाख बैरल प्रति दिन की कमी करने को तैयार हो गया जबकि सऊदी अरब 2.50 लाख बैरल की कटौती को राजी है। 
 
कच्चे तेल का उत्पादन स्तर तय करने में ओपेक की कम होती भूमिका के साथ-साथ तेल उत्पादन में स्विंग उत्पादक के रूप में सऊदी अरब के बाद रूस और अमेरिका की भूमिका भी स्पष्ट है। स्विंग उत्पादन दो कारकों पर निर्भर है। रिक्त क्षमता और बजट संतुलन के लिए आवश्यक न्यूनतम कीमत। हालांकि सऊदी अरब में रिक्त क्षमता है लेकिन उसकी बजट मांग के लिए यह आवश्यक है कि तेल कीमतें न्यूनतम 88 डॉलर प्रति बैरल तक रहें। रूस अपनी बजटीय जरूरतों को 53 डॉलर प्रति बैरल पर भी पूरा कर सकता है। जाहिर है उसके पास गुंजाइश अधिक है। अगर ओपेक तेल उत्पादन में कमी करता है तो इसकी भरपाई शेल गैस की आपूर्ति से की जाएगी। अमेरिकी शेल गैस की बात करें तो उसकी कीमत लगातार कम हो रही है और एक अनुमान के मुताबिक वह 40 डॉलर प्रति बैरल तक हो चुकी है। 
 
ओपेक तथा अन्य देशों की बैठक के साथ-साथ दो घटनाएं घटीं। पहली, कतर ने कहा कि वह जनवरी में ओपेक से अलग हो जाएगा। ओपेक के 3.2 करोड़ बैरल उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी 6 लाख बैरल रोजाना की है। ऐसे में कतर के बाहर जाने का शायद कोई खास असर नहीं होगा। कतर की गैस तेल कीमतों से संबद्घ है और एलएनजी के निर्यात से मिलने वाला राजस्व ओपेक नीतियों से प्रभावित होता है। कहा जा सकता है कि यह निर्णय राजनीति प्रेरित है। वह खुद को सऊदी नीतियों से दूर कर रहा है। अगर यह कदम ईरान के ओपेक से बाहर होने की पूर्व पीठिका बनता है तो यह सऊदी अरब के लिए बहुत बड़ा झटका होगा। अब तक ऐसा नहीं लगता क्योंकि ईरान को ओपेक देशों की उत्पादन कटौती से छूट दी गई है। सऊदी अरब के साथ तनावपूर्ण राजनैतिक संबंधों के बीच भी ईरान का हित समूह में बने रहने में है क्योंकि वह तेल कीमतों को ऊंचा बनाए रखता है।
 
दूसरी घटना इस घोषणा की थी कि वर्ष 1949 के बाद पहली बार अमेरिका शुद्घ तेल निर्यातक की भूमिका में आया। अमेरिकी शेल गैस हल्का कच्चा तेल है। वह खाड़ी देशों और ईरान के भारी या मध्यम कच्चे तेल का स्थान नहीं ले सकता। बहरहाल, शेल उत्पादक तेजी से उत्पादन बढ़ा सकते हैं, यह बात ओपेक को प्रभावित करती है। उच्च उत्पादन लागत शेल गैस उत्पादन को सीमित करती है। शेल गैस ओपेक के ऊपरी लाभ को सीमित कर सकती है लेकिन यह उसे प्रतिस्थापित नहीं कर सकती। 
 
ईरान को ओपेक की कटौती से रियायत दी गई है। अमेरिकी प्रतिबंधों ने पहले ही ईरान के कच्चे तेल के निर्यात में कमी कर दी है हालांकि आठ देशों को दी गई रियायत से इसका प्रभाव कम हुआ है। कच्चे तेल की कमजोर कीमत घटे निर्यात आकार के प्रभाव को मिश्रित कर देगी। क्षेत्र में भूराजनैतिक तनाव गति पकड़ रहा है। अगर अमेरिका ईरान के तेल निर्यात को लेकर दी गई छूट समाप्त करता है तो कच्चे तेल की कम कीमत का लाभ समाप्त हो जाएगा। ओपेक की पिछली बैठक में अक्टूबर 2018 के 3.29 करोड़ बैरल प्रति दिन के स्तर से 8 लाख बैरल प्रति दिन की कमी की गई। इससे उत्पादन घटकर 3.217 करोड़ बैरल प्रति दिन रह गया। यह वर्ष 2018 की दूसरी तिमाही के 3.219 करोड़ बैरल प्रति दिन के स्तर से कम है। 
 
ओपेक देशों की कटौती और गैर ओपेक देशों की 4 लाख बैरल प्रति दिन की कटौती में एक किस्म की सुसंगतता है। यह कहना कठिन है कि अमेरिकी शेल तेल उत्पादन को बढ़ाकर ओपेक की कटौती की भरपाई हो सकेगी या नहीं। अगले वर्ष विश्व अर्थव्यवस्था में धीमापन आने और तेल की मांग में कमी के अनुमान के बावजूद ओपेक तथा अन्य देशों की नीतियां कीमतों को ऊंचा बनाए रखेंगे। 
 
(लेखक ईरान में भारत के पूर्व राजदूत तथा विवेकानंद इंटरनैशनल फाउंडेशन के सीनियर फेलो हैं।) 
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