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आपके कंप्यूटर पर सरकार की नजर!

अर्चिस मोहन और आशिष आर्यन / नई दिल्ली December 21, 2018

मोदी सरकार ने दस केंद्रीय एजेंसियों को किसी भी कंप्यूटर में मौजूद जानकारी को देखने, उसकी निगरानी करने और उसकी गुप्त भाषा को समझने के लिए अधिकृत किया है। सरकार ने गुरुवार रात इस संबंध में एक आदेश जारी किया। इस मुद्दे पर आज संसद में जमकर हंगामा हुआ। विपक्ष ने इसे मौलिक अधिकारों पर हमला बताया और सरकार पर आरोप लगाया कि वह देश के प्रत्येक नागरिक पर निगरानी रखना चाहती है। दूसरी ओर सरकार का कहना था कि उसके नए आदेश में किसी भी सुरक्षा या कानून का प्रवर्तन कराने वाली एजेंसी को कोई नई शक्ति नहीं दी गई है।
 
केंद्र ने यह भी कहा कि एजेंसियों को 2009 के नियमों के तहत अधिकार दिए गए हैं जो कांग्रेस की अगुआई वाली संप्रग सरकार के दौरान बनाए गए थे। सरकार ने विपक्ष दलों के जासूसी के आरोप को खारिज करते हुए कहा कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं और बिना वजह तिल का ताड़ बना रहे हैं। लेकिन आने वाले दिनों में यह मुद्दा उच्चतम न्यायालय में जा सकता है। निजता के अधिकार पर शीर्ष न्यायालय के फैसले के मद्देनजर इसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है। राज्य सभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद ने आरोप लगाया कि देश में अघोषित आपातकाल ने अंतिम आकार ले लिया है और सभी केंद्रीय एजेंसियों को खुली छूट मिल गई है। सदन के नेता और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि कांग्रेस उन अधिकारों पर हल्ला मचा रही है जो खुद उसी की सरकार ने दिए थे। 
 
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट किया, 'मोदी जी देश को पुलिसिया राज्य में तब्दील करके आपकी समस्याओं का हल होने वाला नहीं है। इससे एक अरब से अधिक भारतीयों को यह विश्वास हो जाएगा कि आप सही मायनों में कितने असुरक्षित तानाशाह हैं।' पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि पूर्ण निगरानी कानून सम्मत नहीं है। साइबरलॉज.नेट के अध्यक्ष पवन दुग्गल ने कहा कि सरकार ने अपनी शक्तियों के दायरे में रहते हुए यह आदेश जारी किया है क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने 2015 में धारा 69 की कानूनी वैधता को बरकरार रखा था। लेकिन शीर्ष अदालत ने बाद के अपने फैसले में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया था इसलिए इस प्रावधान की समीक्षा करने की जरूरत है। इस तरह की व्यापक शक्तियों का सही इस्तेमाल करना भी अपने आप में चुनौती होगी। केंद्रीय गृह मंत्रालय के साइबर एवं सूचना सुरक्षा प्रभाग द्वारा गुरुवार देर रात गृह सचिव राजीव गाबा के जरिये यह आदेश जारी किया गया। आदेश के मुताबिक दस केंद्रीय जांच और खुफिया एजेंसियों को अब सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत किसी कंप्यूटर में रखी गई जानकारी देखने, उन पर नजर रखने और उनका विश्लेषण करने का अधिकार होगा। इन 10 एजेंसियों में खुफिया ब्यूरो (आईबी), नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी), राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग (रॉ), सिग्नल खुफिया निदेशालय (जम्मू-कश्मीर, पूर्वाेत्तर और असम में सक्रिय) और दिल्ली पुलिस शामिल हैं। गृह मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि आईटी कानून, 2000 में पर्याप्त सुरक्षा प्रावधान किए गए हैं। टेलीग्राफ कानून में भी इस तरह के प्रावधान पहले से ही मौजूद हैं। मंत्रालय ने कहा कि कंप्यूटर में ताकझांक, निगरानी और गुप्त भाषा को बूझने के लिए सक्षम अधिकारी यानी केंद्रीय गृह सचिव से अनुमति लेनी होगी।मंत्रालय ने सूचना प्रौद्योगिकी नियम 2009 के नियम 4 का इस्तेमाल करते हुए अपना यह तर्क रखा है। इसमें कहा गया है कि कोई उपयुक्त प्राधिकारी सरकार की किसी एजेंसी को किसी कंप्यूटर में सृजित, प्रेषित, प्राप्त या रखी गई सूचनाओं की निगरानी करने, रोकने या उसका विश्लेषण करने के लिए अधिकृत कर सकता है लेकिन यह कानून की धारा 69 के उप वर्ग (1) में जिक्र किए गए उद्देश्यों के लिए किया जाएगा। इसमें कहा गया कि यह अधिसूचना इंटरनेट सेवा प्रदाताओं, दूरसंचार सेवा प्रदाताओं, बिचौलियों आदि को अधिसूचित करने के लिए जारी किया जा रहा है। मंत्रालय के आदेश में यह भी कहा गया कि यह शक्तियां आईटी नियम 2009 के मुताबिक राज्य सरकार के उपयुक्त प्राधिकारियों के पास मौजूद है। 
 
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा ने कहा, 'यह गंभीर घटनाक्रम है। इस आदेश के जरिये भाजपा सरकार भारत को निगरानी राज में तब्दील कर रही है। यह नागरिकों की निजी स्वतंत्रता पर सीधा हमला है तथा उच्चतम न्यायालय के उस निर्णय का प्रत्यक्ष उल्लंघन है जिसमें कहा गया था कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है। उन्होंने कहा, हम साथ मिलकर आदेश का विरोध करते हैं। यह हमारे लोकतंत्र में अस्वीकार्य है।' अरुण जेटली ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कांग्रेस इस मुद्दे पर राई के बिना ही पहाड़ बना रही है। जेटली ने स्पष्ट किया कि सरकार ने इस मामले में कुछ भी नया नहीं किया है तथा इन एजेंसियों को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के कार्यकाल में ऐसी ही जिम्मेदारी दी गई थी। 
 
क्या कहती है गृह मंत्रालय की अधिसूचना
 
1. एजेंसियां किसी भी कंप्यूटर से तैयार, प्रेषित, प्राप्त या भंडारित सूचना को देख सकती हैं, उसकी निगरानी कर सकती हैं और उसकी गुप्त भाषा का विश्लेषण कर सकती हैं।
 
2. ग्राहक/सेवा प्रदाता इन एजेंसियों को सभी तरह की सुविधाएं और तकनीकी मदद देने के लिए बाध्य है।
 
3. अगर सेवा प्रदाता एजेंसियों को तकनीकी सहयोग देने में नाकाम रहते हैं तो उन्हें सात साल की जेल जाना/जुर्माना भरना पड़ सकता है।
 
4. गृह मंत्रालय की अधिसूचना सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा 69 (1) पर आधारित है।
 
क्या कहती है सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा 69 (1)
 
देश की संप्रुभता या अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राष्ट्रों के साथ अच्छे संबंधों के हित में या सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने या उत्तेजना को रोकने के लिए सरकार किसी भी एजेंसी को किसी भी कंप्यूटर के जरिये प्रेषित हो रही किसी भी जानकारी को देखनेे-रोकने का आदेश दे सकती है। ग्राहक या कंप्यूटर चला रहे किसी भी व्यक्ति को सूचना की गुप्त भाषा का पता लगाने के लिए सभी तरह की सुविधाएं और तकनीकी सहयोग देना होगा। अगर वह ऐसा नहीं करता है तो यह माना जाएगा कि उसने अपराध किया है। 
Keyword: govt, computer, cyber, law,,
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