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टाटा समूह के न्यासों में बदल गई नेतृत्व की परिपाटी

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  December 20, 2018

टाटा समूह के न्यासों (ट्रस्ट) ने एक लंबा कदम बढ़ाया है। इनमें पिछले सप्ताह बुधवार को दो वाइस-चेयरमैन की नियुक्ति की गई है, जिसका मतलब है कि टाटा ट्रस्टों के 126 वर्षों के इतिहास में पहली बार उनका चेयरमैन टाटा परिवार से बाहर का होगा।  इन ट्रस्टों के न्यासियों ने पूर्व रक्षा सचिव विजय सिंह और टीवीएस समूह के चेयरमैन वेणु श्रीनिवासन की वाइस-चेयरमैन के रूप में नियुक्ति का फैसला कर परिपाटी बदल दी है। ठीक इसी तरह टाटा संस में रतन टाटा के बाद टाटा परिवार से बाहर के व्यक्ति की चेयरमैन के रूप में नियुक्ति की गई थी। 

 
अब बहुत से लोग कह सकते हैं कि उत्तराधिकार की योजना काफी लंबे समय से लंबित थी, लेकिन ऐसा लगता है कि यह देर आयद दुरुस्त आयद है। टाटा समूह से सेवानिवृत्ति के बाद रतन टाटा की ट्रस्टों को चलाने में भागीदारी का इन पर असर पड़ा है। इससे कोई भी इनकार नहीं कर सकता। ये ट्रस्ट उन्हें बनाने वालों की विरासत को लेकर अब भी वफादार हैं, लेकिन इनके काम करने का एक निश्चित ढर्रा बन चुका था। टाटा का मानना है कि ट्रस्टों के प्रभाव में बढ़ोतरी के लिए बदलाव जरूरी था। उसका कहना है कि इससे ब्रिजस्पैन ग्रुप को भी जोडऩे में मदद मिली है, जो एक अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन है। यह परोपकारी संगठनों को यह सलाह देता है कि उन्हें कैसे काम करना चाहिए। इससे पिछले कुछ वर्षों के दौरान टाटा ट्रस्टों में बहुत से बदलाव हुए हैं। 
 
दुनियाभर में परोपकारी संस्थानों में बाहरियों को नियुक्त करना एक उभरता रुझान है। रॉकफेलर फाउंडेशन और फोर्ड फाउंडेशन ने भी यही रास्ता अख्तियार किया है। भले ही कोई संगठन किसी व्यक्ति या परिवार की कल्पना या संपत्ति से बना हो। लेकिन उस संगठन का समाज या अर्थव्यवस्था पर अच्छा प्रभाव तभी बना रह सकता है, जब वह अच्छे अगुआ लोगों के हाथ में हो। इन अगुआ लोगों में अनुभव और विशेषज्ञता का एक बेहतर तालमेल कायम करने का कौशल होना चाहिए। ऐसे अगुआ उस परिवार के होना जरूरी नहीं है। संगठनों या ट्रस्टों के संस्थापकों को यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि कोई व्यक्ति आपसे जुड़ा हुआ है तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसके पास अपना काम प्रभावी ढंग से करने के लिए कुशलता और अनुभव दोनों सही मात्रा में हैं। बाहरी अगुआ आपकी ताकत का पूरक बनने में बेहतर साबित हो सकते हैं। उनके तटस्थ रहने की ज्यादा संभावना होती है क्योंकि वे ट्रस्ट से भावनात्मक रूप से नहीं जुड़े होते हैं।
 
ऐसा करने से ट्रस्टों को शुरू करने वाले संस्थापकों के आदर्श एवं उद्देश्य ठीक से बने रह सकते हैं। भारत में बहुत से बड़े फाउंडेशन हैं, जिनकी स्थापना अति धनाढ्य परिवारों या व्यक्तियों ने की है। तकनीक उद्यमी उभर रहे हैं और पश्चिम के बाहर परोपकारिता का प्रभाव बढ़ रहा है, जिससे आने वाले समय में और ट्रस्ट बनने की उम्मीद की जा सकती है। ये ट्रस्ट टाटा के ट्रस्टों द्वारा स्थापित मानकों का अनुसरण कर सकते हैं।  ज्यादातर फाउंडेशनों को उसे स्थापित करने वाले व्यक्ति के परिवार के सदस्य ही चला रहे हैं। वे अब भी फाउंडेशन को चलाने के लिए किसी अन्य व्यक्ति के बारे में नहीं सोच पा रहे हैं। अगर उन्हें किसी व्यक्ति को चुनना भी पड़ रहा है तो वे अपनी जगह अपने जैसे ही व्यक्ति की नियुक्ति कर रहे हैं। ज्यादातर कारोबारी घरानों में यही स्थिति है। अमेरिका की प्रबंधन सलाहकार कंपनी बेन ऐंड कंपनी के एक शोध में पाया गया है कि भारतीय कंपनियों में हर पांच बोर्ड सदस्यों में से केवल एक ने कभी सीईओ के उत्तराधिकारी के बारे में बातचीत की और बोर्ड स्तर पर शीर्ष नेतृत्व तैयार करने के लिए मामूली प्रयास किए गए। कुछ पारिवारिक उद्यम उत्तराधिकार की योजना की प्रक्रिया में इसलिए भी देरी करते हैं क्योंकि उनके फैसलों से परिवार में झगड़े शुरू हो सकते हैं। इसके अलावा मृत्यु जैसे मुद्दों पर चर्चा करना भी असहज हो सकता है। 
 
यह केवल अकेले भारत की ही समस्या नहीं है। हेड्रिक ऐंड स्ट्रग्ल्स और स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी के रॉक सेंटर फॉर कॉरपोरेट गवर्नेंस द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक बोर्ड सीईओ के उत्तराधिकारी की योजना पर साल में केवल 2 घंटे खर्च करते हैं।  करीब 40 फीसदी कंपनियों के पास आंतरिक स्तर पर कोई योग्य उम्मीदवार नहीं है। इससे प्रतिभा प्रबंधन के अभाव का संकेत मिलता है। इसे ध्यान में रखते हुए यह आश्चर्यजनक है कि कारगर उत्तराधिकार योजना नहीं बनाने के गंभीर नतीजे सामने आ सकते हैं। 
 
कई बार संगठनों के लिए ऐसे लोगों को लाना अनिवार्य हो जाता है, जो कंपनी खड़ी करने वाले व्यक्ति के नजरिये से अपनी भूमिका को देखते हैं। वह व्यक्ति उस भावनात्मक बोझ से मुक्त होना चाहिए, जो संगठन में लंबे समय तक टिके रहने से आता है। टाटा संस के साथ अपने सबंधों की प्रकृति के कारण टाटा ट्रस्ट के मामले में पहल और अधिक स्वागत योग्य है। टाटा संस भारत के सबसे बड़े टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी है। टाटा ट्रस्ट परोपकारी न्यास हैं, जिनकी स्थापना टाटा परिवार के सदस्यों ने की है। टाटा ट्रस्टों के पास टाटा संस की 66 फीसदी इक्विटी पूंजी है। टाटा ट्रस्टों में नेतृत्व को लेकर हुई पहल से सभी के लिए टाटा के कारोबारों के हितों पर किसी व्यक्ति या परिवार के नियंत्रण की चिंताएं खत्म होंगी। 
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