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आरबीआई गवर्नर के नाम एक खुला पत्र

तमाल बंद्योपाध्याय /  December 20, 2018

केंद्रीय बैंकिंग एक विज्ञान है, न कि कला। अतीत के अधिकतर गवर्नरों ने अपने अनुभव, विशेषज्ञता और अंतर्दृष्टि से इस काम को बखूबी अंजाम दिया है। बता रहे हैं तमाल बंद्योपाध्याय

 
प्रिय गवर्नर,
 
भारत के मुख्य मौद्रिक अधिकारी के तौर पर अपना पद संभालने के दिन ही आपने ट्वीट किया था: 'भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर का पदभार संभाल लिया। आप सबकी शुभकामनाओं के लिए शुक्रिया।' इसके कुछ दिन बाद ही बोर्ड बैठक के बाद आपने फिर ट्वीट कर कहा 'आरबीआई के सेंट्रल बोर्ड की बैठक अच्छी रही। इसमें तमाम मुद्दों पर चर्चा की गई।' दुनिया के अन्य केंद्रीय बैंक प्रमुखों के बारे में तो मुझे मालूम नहीं है लेकिन यह पहला मौका है जब आरबीआई का कोई गवर्नर सोशल मीडिया में अपनी बात रख रहा है। आपने मिंट रोड स्थित आरबीआई मुख्यालय में ग्लासनोस्त लाने की पहल की है। इसके लिए धन्यवाद। 
 
अगर आरबीआई के इतिहास में ऐसा सुना नहीं गया है तो केंद्रीय बैंक में आपके आगमन के पहले की कई घटनाएं भी अभूतपूर्व हैं। असल में, आरबीआई गवर्नर के इस्तीफा देने की घटना पहले भी हुई है लेकिन इससे पहले कभी भी वह कड़वाहट के खुलेआम प्रदर्शन का विषय नहीं बनीं। आप पहले भी आरबीआई बोर्ड का हिस्सा रह चुके हैं और यह आपको बढ़त देता है। वर्ष 1997 में विमल जालान पूर्वी एशियाई वित्तीय संकट के दौर में आरबीआई गवर्नर बने थे। सितंबर 2008 में डी सुब्बाराव के मिंट रोड दफ्तर आने के एक हफ्ते बाद ही अमेरिका का दिग्गज निवेश बैंक लीमन ब्रदर्स धराशायी हो गया और उसके बाद पूरी दुनिया सबसे बड़े आर्थिक संकट की गिरफ्त में आ गई थी। रघुराम राजन ने जब अपना पद संभाला था तो विदेशी निवेशक भारत से फंड निकासी में काफी तेजी दिखा रहे थे।
 
आरबीआई मुख्यालय के कॉर्नर रूम स्थित दफ्तर में आपका प्रवेश भी इसी तरह घटना-प्रधान है लेकिन थोड़ा जटिल है। इसका बाहरी परिवेश से कोई लेना-देना नहीं है। वृहद आर्थिक संकेतक भी बहुत खराब नहीं हैं। मुद्रास्फीति नीचे है, स्थानीय मुद्रा स्थिर बनी हुई है और कच्चे तेल के दाम में तीव्र गिरावट से चालू खाता घाटा बढऩे का खतरा भी कम हो चुका है। लेकिन सरकार और आरबीआई के बीच अविश्वास की खाई गहरी हो चुकी है। मैंने भी बैंकिंग नियामक और बैंकों एवं अन्य बाजार हिस्सेदारों के बीच ऐसा अविश्वास कभी नहीं देखा है।
 
आपने आरबीआई की स्वायत्तता बनाए रखने और हरेक अहम मसले पर सहमति बनाने का वादा कर लोगों को सुकून पहुंचाया है। आपने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकरों से भी संपर्क साधा है। आपका एक ट्वीट केंद्रीय बैंक के प्रति आपके नजरिये का भी आभास देता है जिसमें आपने कहा था: 'तमाम केंद्रीय बैंकों की मौजूदा दौर में बेहद अहम भूमिका है। उनके सामने यह हालात समझने और अपनी जिम्मेदारियों के निर्वहन के लिए निर्णायक कदम उठाने की चुनौती है।' आपकी तात्कालिक चुनौती वैश्विक बाजार को यह बात मनाने की होगी कि आरबीआई अपनी स्वायत्तता नहीं गंवाएगा। दरअसल आरबीआई की स्वायत्तता बनाए रखने के साथ ही स्वायत्तता के बारे में सार्वजनिक राय भी अहम है। इसका मतलब है कि स्वायत्तता के प्रति केवल आपका विश्वास ही काफी नहीं है, आपको अपने क्रियाकलाप से भी इसे दिखाना होगा।
 
निस्संदेह, स्वायत्तता का जिम्मेदारी के साथ गहरा नाता है। इस संदर्भ में, मैं कुछ मुद्दों पर रोशनी डालना चाहता हूं। मैं आपको सलाह या सुझाव देने का साहस नहीं कर सकता। ये मुद्दे लंबे समय से आरबीआई पर नजर रख रहे व्यक्ति के आकलन भर हैं। आरबीआई ने हाल ही में एक प्रवर्तन प्रकोष्ठ गठित किया है जो संगठनात्मक ढांचे में हुआ एक बड़ा बदलाव है। लेकिन विकसित देशों के अधिकांश केंद्रीय बैंकों की तुलना में आरबीआई की बाजार खुफिया गतिविधि खराब है। संभवत: एक समर्पित प्रकोष्ठ होने से यह काम बेहतर हो पाएगा।
 
वित्तीय बाजारों के लिए एक तकनीकी समिति है लेकिन मुझे नहीं पता कि पिछले कुछ वर्षों में इसकी कितनी बैठकें हुई हैं? आपका बाजार में सक्रिय लोगों से सहमत होना जरूरी नहीं है लेकिन उनकी बात सुनने में क्या खराबी है? केंद्रीय बैंक के वरिष्ठ अधिकारियों ने बाजार एवं डेरिवेटिव संगठन फिम्मडा और विदेशी मुद्रा कारोबारियों के संगठन फेडाई की बैठकों में हिस्सा लेना भी बंद कर दिया है। भुगतान पर जारी आरबीआई के दृष्टि पत्र (2015-18) में भुगतान पर एक बाह्य समिति गठित करने की बात की गई थी। लेकिन इस बारे में शायद ही किसी ने कुछ सुना होगा?
 
शायद आपको नियमों एवं शासन संबंधी मामलों पर गौर करने के लिए एक पैनल बनाने की भी जरूरत पड़ेगी जिसमें बेदाग छवि एवं विशेषज्ञता वाले बाहरी सदस्यों को भी जगह दी जाए। फिलहाल वित्तीय पर्यवेक्षण बोर्ड वित्तीय नियमों एवं पर्यवेक्षण पर नजर रखता है लेकिन इसका ध्यान मूलत: निरीक्षण एवं अंकेक्षण पर ही होता है। विभिन्न सहभागियों से मिले फीडबैक के आधार पर नियमों के लिए एक ढांचा भी बनाया जा सकता है। आप तीन अन्य महत्त्वपूर्ण बिंदुओं- मुद्रास्फीति पूर्वानुमान, तरलता प्रबंधन और विदेशी मुद्रा बाजार में आरबीआई का दखल के लिए भी एक ढांचा बनाने के बारे में सोच सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में कई बार आरबीआई का मुद्रास्फीति पूर्वानुमान गलत साबित हुआ है। इससे आरबीआई की विश्वसनीयता कम होती है और नीतिगत दरों पर मौद्रिक नीति समिति के नजरिये को भी प्रभावित करती है। 
 
अभी ओवरनाइट कॉल मनी रेट प्रणालीगत तरलता का मुख्य पैमाना है। लेकिन कॉल मनी समूची वित्तीय प्रणाली का बेहद छोटा हिस्सा है। हमें अस्थायी एवं टिकाऊ तरलता के प्रबंधन के लिए क्या एक ढांचा नहीं रखना चाहिए? सवाल है कि स्थानीय मुद्रा का सही स्तर क्या है? हम विदेशी मुद्रा बाजार में उठापटक को किस तरह आंकते हैं? आरबीआई को रुपया-डॉलर विनिमय की वरीय दर बाजार को बताने की जरूरत नहीं है लेकिन यह तय करने के लिए एक ढांचा तो होना ही चाहिए। आरबीआई को निवेश बैंंकरों, निजी इक्विटी प्रबंधकों और ट्रेजरी विशेषज्ञों का वरिष्ठ स्तर पर स्वागत करना चाहिए। दुनिया भर में केंद्रीय बैंकर अपनी विशेषज्ञता बढ़ाने के लिए ऐसा करते हैं। इसी तरह अपनी दक्षता बढ़ाने के लिए कुछ समय निजी क्षेत्र में बिताने के लिए आरबीआई अधिकारियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। लोकतांत्रिक स्थानांतरण नीति अपनाने के बजाय कुछ अधिकारियों को खास भूमिकाओं में बनाए रखने से भी विशेषज्ञता हासिल की जा सकती है।
 
आरबीआई को बैंकरों की नाखुशी से निपटने के लिए एक अपील निकाय बनाने के बारे में भी सोचना चाहिए। यह निकाय सेबी के आदेशों के खिलाफ अपील अधिकरण के तौर पर गठित सैट की तरह न होकर ब्रिटेन की नियामकीय निर्णय समिति की तर्ज पर बनाया जा सकता है। यह समिति ब्रिटिश बैंकिंग नियामक का हिस्सा होते हुए भी परिचालन के मामले में अलग है। अंत में, अगर आप सलाहकारी बोर्ड को पर्यवेक्षक बोर्ड बनाना चाहते हैं तो आपको भारत के लगभग निष्क्रिय स्थानीय बोर्डों को पुनर्जीवित करने और सेंट्रल बोर्ड के पुनर्गठन की जरूरत होगी। इसमें सरकार की प्रमुख भूमिका होगी और नॉर्थ ब्लॉक से मेलजोल इस काम में मददगार होगा।
 
केंद्रीय बैंक का संचालन एक विज्ञान है, न कि कला। अतीत के अधिकतर गवर्नरों ने अपने अनुभव, विशेषज्ञता और अंतर्दृष्टि से बेहतरीन काम किया है। फीडबैक के लिए तारीफ, सहमति बनाने की कोशिश और विभिन्न नीतियों के लिए अलग ढांचा तैयार करना इस विज्ञान को मुकम्मल बनाएगा।
 
बेहतरीन पारी की शुभकामनाओं के साथ,
 
भवदीय
तमाल बंद्योपाध्याय
 
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ परामर्शदाता एवं लेखक हैं)
Keyword: RBI, viral acharya, fund, bank,,
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