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कृषि क्षेत्र की मौजूदा स्थिति पर अपनी राय दें केंद्रीय कृषि मंत्री

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  December 19, 2018

राधा मोहन सिंह कहां हैं? बहुत संभव है कि यह प्रश्न बार-बार दोहराया गया हो लेकिन मौजूदा संदर्भ में इसे पूछा जाना आवश्यक है। वह नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले केंद्रीय मंत्रिमंडल में कृषि मंत्री हैं। उन्होंने 26 मई, 2014 को कृषि एवं कृषक कल्याण मंत्री का पद भार संभाला। इस अवधि में सिंह ने देश के किसानों की बेहतरी के लिए कई घोषणाएं कीं। इनमें इस वर्ष के आरंभ में न्यूनतम समर्थन मूल्य में इजाफा करने की घोषणा भी शामिल है। परंतु पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों को लेकर उनका कोई बयान सामने नहीं आया है। यह बात चकित भी करती है और एक पहेली भी है।

 
जिन पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम पिछले दिनों सामने आए, वे सभी मोटे तौर पर कृषि आधारित राज्य हैं। उनकी अधिकांश आबादी अपनी आजीविका के लिए खेती तथा उससे जुड़े हुए कामों पर निर्भर है। इन पांच राज्यों में से कम से कम चार राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और तेलंगाना में कृषि संकट का मुद्दा तमाम अन्य मुद्दों पर हावी रहा। इन राज्यों में चुनाव लड़ रहे राजनीतिक दलों कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के चुनाव घोषणा पत्र में यह मुद्दा प्रभावी रहा।
 
जाहिर है विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद यह बात सबके लिए एकदम स्पष्ट हो जानी चाहिए कि खेती को लाभदायक बनाने के लिए क्या कुछ करने की जरूरत है। खासतौर पर भाजपा के लिए यह अहम है क्योंकि उसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में हार का सामना करना पड़ा। तेलंगाना में दोबारा सत्ता में आई टीआरएस के लिए भी इसकी अहमियत कम नहीं है। परंतु लगता है कि केंद्र के कृषि मंत्री को अब तक यह संदेश समझ में नहीं आया है। कई मीडिया वेबसाइटों की जांच से पता चलता है कि 16 दिसंबर को सिंह ने ओडिशा सरकार को सूचित किया कि उसने 2016-17 में अन्न उत्पादन में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए एक करोड़ रुपये का नकद पुरस्कार दिया जाता है। परंतु 11 दिसंबर को विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद से कृषि या उससे जुड़े किसी अन्य मुद्दे पर सिंह का कोई वक्तव्य नहीं आया है। 
 
ऐसा नहीं है कि सिंह वक्तव्य जारी करने में शर्माते हैं। परिणाम आने के पहले 6 दिसंबर को उन्होंने इस बात को नकारा था कि नोटबंदी से किसानों के बीच खरीदने पर बुरा असर हुआ है। इससे पहले 1 दिसंबर को सिंह ने केंद्र की पिछली कांग्रेसनीत सरकार पर हमला करते हुए कहा था कि उसने उच्च न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर स्वामीनाथन आयोग की अनुशंसा का क्रियान्वयन नहीं किया। उन्होंने भाजपा सरकार द्वारा प्रस्तुत तीन अन्य कृषि सुधारों का भी उल्लेख किया। ये थे-कृषि बाजारों की इलेक्ट्रॉनिक लिंकिंग ताकि किसानों को बेहतर मूल्य मिले, सुधरा हुआ कृषि बीमा कार्यक्रम और 2,000 करोड़ रुपये का एक कार्यक्रम ताकि किसानों के लिए 22,000 ग्रामीण बाजार बनाए जा सकें और  उनकी आय दोगुनी करने में सहायता मिले।
 
कांग्रेस ने तीन कृषि प्रधान राज्य भाजपा से छीन लिए हैं। उसने कर्ज माफी और एमएसपी में इजाफा करने समेत तमाम वादे किए हैं। ऐसे में सिंह को देश को बताना चाहिए कि आखिर कृषि को लेकर उनकी सरकार की नीतियों में कहां कमी रह गई और आने वाले दिनों में क्या कुछ किए जाने की आवश्यकता है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री पहले ही अपने-अपने राज्य में किसानों की कर्ज माफी की घोषणा कर चुके हैं और राजस्थान में भी ऐसा होगा। परंतु क्या इससे इन राज्यों में किसान समस्या हल होगी?
 
किसान कर्ज माफी इन दिनों चलन में है। भाजपा ने भी उत्तर प्रदेश में ऐसा ही वादा किया था और चुनाव भी जीती थी। महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार ने बिना चुनाव के ही किसानों का कर्ज माफ करने की घोषणा की। पंजाब, कर्नाटक और राजस्थान में भी कर्ज माफी हो चुकी है। 2017 और 2018 में पांच राज्यों ने किसानों का 1.22 लाख करोड़ रुपये का कर्ज माफ किया। इसके बावजूद किसानों की दिक्कत खत्म होने का नाम नहीं ले रही।  इसके विपरीत तेलंगाना ने दिखाया कि कर्ज माफी का वादा चुनाव जिताने की गारंटी नहीं है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ने किसानों के लिए 2 लाख रुपये तक की कर्ज माफी की बात कही थी जो टीआरएस के वादे से दोगुनी थी। इसके बावजूद वहां किसानों ने भाजपा और कांग्रेस को वोट नहीं दिया। 
 
किसान शायद टीआरएस के साथ इसलिए बने रहे क्योंकि उसने हर मौसम में किसानों को दिया जाने वाला नकद समर्थन 25 फीसदी बढ़ाकर 5,000 रुपये प्रति एकड़ करने की बात कही। इससे पहले प्रति फसल सीजन 4,000 रुपये प्रति एकड़ राशि दी जाती थी। इसी राशि के चलते सालाना करोड़ रुपये का बोझ आता था जो अब बढ़कर 15 हजार करोड़ रुपये हो जाएगा। सिंह को इस प्रश्न का जवाब देना चाहिए कि कर्ज माफी की योजना वित्तीय क्षेत्र के ऋण अनुशासन के लिए किस तरह के असर समेटे हुए है? यह करदाताओं पर कैसा बोझ डालती है और तेलंगाना की रैयतु बंधु जैसी नकद समर्थन योजना बेहतर हैं या नहीं। सिंह कह सकते हैं कि किसानों की समस्याओं को हल करने का काम राज्यों के स्तर पर बेहतर अंंजाम दिया जा सकता है क्योंकि स्थानीय प्रशासन उनकी खास जरूरतों को बेहतर समझने की स्थिति में रहेगा। 
 
चाहे जो भी हो भाजपा नेतृत्व और उसके कृषि मंत्री को इस बात पर विचार करना चाहिए कि देश के कृषि जगत को इस समय किस तरह के कदमों की आवश्यकता है। क्या कर्ज माफी जैसे अल्पकालिक उपाय या नकदी हस्तांतरण के स्थान पर कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ाने जैसे कहीं अधिक अहम कदम उठाए जाने चाहिए और क्या कृषि उत्पादकता और तकनीक का उपयोग बढ़ाने की दिशा में काम करना चाहिए? इस पर उन्हें अपनी राय रखनी चाहिए। वह जितनी जल्दी नीतिगत स्पष्टता लाएंगे, देश के कृषि और कृषक जगत को मौजूदा संकट से निपटने में उतनी ही सुविधा होगी।
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