बिजनेस स्टैंडर्ड - कारोबारी जंग और चीन की संभावनाएं
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कारोबारी जंग और चीन की संभावनाएं

श्याम सरन /  December 19, 2018

अल्प से मध्यम अवधि के दौरान वृद्धि पर असर अवश्य हो सकता है लेकिन अगर चीन को सुसंगत नेतृत्व मिला तो वह तेजी से वापसी कर सकता है। विस्तार से बता रहे हैं श्याम सरन

 
हाल में ब्यूनस आयरस में संपन्न जी-20 देशों की बैठक से इतर अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच हुई शांति वार्ता से पूरी दुनिया ने राहत की सांस ली। ऐसा लगा कि दोनों देशों के बीच शुल्क दरों को लेकर छिड़ी जंग समाप्त हो जाएगी। परंतु ऐसा नहीं हुआ और अब उनका ध्यान ऐसे क्षेत्रों की ओर है जहां चीन के पास रियायत की गुंजाइश बहुत कम है। इनका संबंध चीन की निजी कंपनियों के संचालन में व्याप्त अस्पष्टता, बौद्धिक संपदा और तकनीकी पहुंच आदि से है। पिछले दिनों कनाडा में चीन की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक हुआवेई की मुख्य वित्तीय अधिकारी (सीएफओ) को गिरफ्तार कर लिया गया। आरोप था कि उन्होंने ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन किया। इस बात ने दोनों नेताओं के समझौते पर सवालिया निशान लगा दिए और दोनों देशों के रिश्तों की कड़वाहट को कई गुना बढ़ा दिया। यह सबकुछ ऐसे समय पर हुआ जब अमेरिका अपने मित्रों और गठबंधन सहयोगियों से लगातार कह रहा था कि वे हुआवेई के बनाए उपकरणों का प्रयोग न करें  क्योंकि कंपनी खुफिया तरीके से उनकी गोपनीय जानकारियां जुटा सकती हैं। पिछले कुछ दिनों में बड़ी जापानी दूरसंचार कंपनियों ने भी घोषणा की है कि वे 5जी सेवाएं शुरू कर रही हैं लेकिन वे हुआवेई के उपकरणों का इस्तेमाल नहीं करेंगी जबकि हुआवेई के उपकरणों को सस्ता और अच्छा बताया जाता है। एक अन्य चीनी कंपनी जेडटीई की तरह हुआवेई भी अमेरिका से आयातित उच्च तकनीक वाली माइक्रोचिप पर निर्भर है। इन चिप के आयात पर रोक से कंपनी को नुकसान पहुंच सकता है। जेडटीई पर भी ऐसी रोक लगी थी जिसे शी चिनफिंग के निजी अनुरोध के बाद समाप्त किया गया।
 
अधिकांश भारतीय दूरसंचार कंपनियां 5जी सेवाओं के लिए हुआवेई के उपकरणों और तकनीक पर निर्भर हैं और कंपनी के साथ काम कर रही हैं। मौजूदा घटनाएं इन रिश्तों पर क्या असर डालेंगी यह देखना होगा। सुरक्षा के पहलू से भी इसकी जांच करनी होगी। चीन के कारोबार और उद्योग के ढांचे पर अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश निशाना साध रहे हैं। इसमें यूरोपीय संघ भी शामिल है। तंग श्याओफिंग के सुधारों और उनके उत्तराधिकारियों के काम की बदौलत चीन की सरकार ने निजी क्षेत्र को बाजार आधारित अर्थव्यवस्था में फलने-फूलने का मौका दिया। सरकारी कंपनियों के प्रबंधन को भी सरकार ने नियंत्रणमुक्त कर दिया। अलीबाबा, हेयर और हुआवेई जैसी निजी कंपनियां सफल बहुराष्ट्रीय कंपनी के रूप में उभरीं। पार्टी को कारोबारी संचालन से अलग करने की प्रवृत्ति को अब पलटा जा रहा है। पार्टी समिति अब निजी कंपनियों में भी दखल दे रही है। सितंबर में अलीबाबा के चेयरमैन पद से सेवानिवृत्त होने वाले जैक मा ने कहा कि वह कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य हैं। ऐसे में क्या ये सही मायने में निजी कंपनियां हैं? अगर वे सरकार के आदेश का पालन करती हैं तो क्या उनका अंतरराष्ट्रीय कारोबार चीन के राजनीतिक और सुरक्षा हितों के लिए काम नहीं करेगा? इन मसलों पर भारत में भी चर्चा होनी चाहिए। देश के डिजिटल भुगतान क्षेत्र में अलीबाबा का दबदबा है।
 
अमेरिका, जापान और यूरोपीय संघ ने पहले ही इन मुद्दों को विश्व व्यापार संगठन के सुधारों के जरिये हल करने का नोटिस दिया है। चीन अपने कारोबारी साझेदारों की मदद से इस कारोबारी जंग में अस्थायी शांति स्थापित कर सकता है लेकिन अन्य मोर्चों पर वह दबाव से बच नहीं पाएगा। ऐसे में आगे चलकर उसे शी चिनफिंग की उन नीतियों को पलटना पड़ेगा जिनके तहत वह एक बार फिर हर क्षेत्र में पार्टी को केंद्र में ला रहे हैं। इस वर्ष तंग श्याओफिंग द्वारा शुरू किए गए सुधारों की 40वीं वर्षगांठ है लेकिन उनकी उपलब्धियों और सुधारों की अधिक चर्चा सुनने को नहीं मिली है। पूरा ध्यान शी चिनफिंग की बातों और नीतियों पर ही केंद्रित है। तंग ने सुधारों को पार्टी और देश के बीच अलगाव का जरिया बनाया, उन्होंने सेना को पेशेवर बनाया और कॉर्पोरेट जगत में पेशेवर प्रबंधन लाने का काम किया। पार्टी केवल सर्वोच्च स्तर पर निगरानी करती थी। शी मानते हैं कि उन सुधारों ने पार्टी और राज्य को कमजोर किया और भ्रष्ट बनाया। वह पार्टी को प्रमुख भूमिका में वापस लाए। निजी कंपनियों की तुलना में सरकारी उपक्रमों को प्राथमिकता दी जाने लगी। मेड इन चाइना 2025 योजना को फलीभूत करने में उनकी अहम भूमिका तय की गई। इस योजना का लक्ष्य चीन को कृत्रिम मेधा, रोबोटिक्स, क्वांटम कंप्यूटिंग, इलेक्ट्रॉनिक वाहन जैसे अग्रणी और उच्च तकनीकी क्षेत्रों में सबसे आगे ले जाना है। ये वे क्षेत्र हैं जिनमें चीन को अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियों और स्टार्टअप से काफी मदद मिली है। पश्चिमी देशों के विश्वविद्यालयों और उत्कृष्टता केंद्रों में युवाओं ने बड़ी तादाद में इनका प्रशिक्षण भी लिया है। अब उभरती तकनीक और पश्चिमी कंपनियों के अधिग्रहण के ऐसे मामलों पर स्पष्ट रोक देखने को मिल रही है। 
 
यह निश्चित तौर पर चीन की आर्थिक संभावनाओं के लिए एक झटका है। देखना यह होगा कि यह झटका कितना प्रभावी साबित होता है। एक संदेह यह है कि चीन उच्च तकनीक हासिल करने पर पूरा जोर लगा देगा। कृत्रिम मेधा, फेशियल रिकगनिशन (चेहरे से पहचान करना) तकनीक, क्वांटम कंप्यूटिंग और इलेक्ट्रॉनिक वाहन आदि के क्षेत्र में वह पहले ही अपने पश्चिमी समकक्षों से कहीं आगे निकल चुका है। वह इन क्षेत्रों में अमेरिका की अपेक्षा कहीं अधिक संसाधन व्यय कर रहा है।  अल्प से मध्यम अवधि के दौरान चीन की अर्थव्यवस्था वृद्धि गंवा सकती है और उसमें विसंगति उत्पन्न हो सकती है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे जीडीपी वृद्धि दर में 2 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। चीन अत्यधिक नकदीकृत है और उसका कुल ऋण जीडीपी के 300 फीसदी के बराबर है। अगर वृद्धि दर गिरी और कारोबारी जंग तेज हुई तो वहां भी लीमन ब्रदर्स जैसा वित्तीय संकट उत्पन्न हो सकता है। परंतु 40 वर्ष की बेमिसाल तेजी ने चीन को अत्यंत आधुनिक बुनियादी ढांचा और उच्च गुणवत्ता वाला मानव संसाधन मुहैया कराया है। अगर उसे एकजुट और सुसंगत राजनीतिक नेतृत्व मिला तो वह इनकी सहायता से कभी भी वापसी कर सकता है। हालांकि यह केवल एक अनुमान है जिसे 100 फीसदी भरोसे से नहीं जाहिर किया जा सकता। 
 
(लेखक देश के पूर्व विदेश सचिव और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के वरिष्ठ फेलो हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: america, china, india, G20,,
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