बिजनेस स्टैंडर्ड - आयात शुल्क पर करार से खाद्य तेल पर मार
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आयात शुल्क पर करार से खाद्य तेल पर मार

दिलीप कुमार झा / मुंबई December 18, 2018

मलेशिया से खाद्य तेल की डंपिंग शुरू होने के बाद घरेलू पेराई एवं प्रसंस्करण उद्योग में तिलहनों की मांग घटने के आसार हैं। इससे तिलहन की कीमतों में गिरावट आ सकती है जो किसानों के लिए चिंताजनक बात है। मलेशिया के पास खाद्य तेल का बड़ा भंडार है और वह अपना निर्यात बढ़ाने के लिए शुल्क में कटौती का इंतजार कर रहा है। भारत सरकार ने अक्टूबर, 2010 में मलेशिया-भारत व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते पर दस्तखत किए थे। इसके तहत मलेशिया से भारत में आने वाले सभी उत्पादों पर प्रभावी शुल्क दोनों के बीच सहमति की सीमा से अधिक नहीं होगा। कच्चे पाम तेल (सीपीओ) और रिफाइंड खाद्य तेल पर शुल्क क्रमश: 40 फीसदी और 45 फीसदी से अधिक नहीं होगा। भारत पाम तेल और रिफाइंड खाद्य तेल का बड़ा आयातक है। इस समझौते के प्रावधान 1 जनवरी, 2019 से लागू हो जाएंगे। 
 
इसका मतलब है कि सीपीओ और रिफाइंड तेल पर आयात शुल्क की प्रभावी दर स्वत: ही क्रमश: चार फीसदी और नौ फीसदी कम हो जाएगी। इस समय दोनों पर शुल्क क्रमश: 44 फीसदी और 54 फीसदी है। वर्तमान शुल्क दरों पर भी भारत अपनी सालाना 250 लाख टन मांग का करीब 65 फीसदी मलेशिया, इंडोनेशिया और अर्जेन्टीना से आयात करता है।  भारत में खाद्य तेल और तिलहन क्षेत्र की शीर्ष प्रतिनिधि संस्था सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन (एसईए) के कार्यकारी निदेशक बीवी मेहता ने कहा, 'आयात शुल्क में कमी से भारतीय किसानों के हितों को तगड़ी चोट पहुंचेगी। इस कदम से मलेशिया से भारत में ज्यादा खाद्य तेल आएगा। इससे भारत डंपिंग का मैदान बन जाएगा क्योंकि मलेशिया के पास खाद्य तेल का भारी मात्रा में स्टॉक है। आयात बढऩे का मतलब है कि खाद्य तेल और तिलहनों की घरेलू कीमतें कमजोर रहेंगी।' रोचक बात यह है कि भारतीय आयातकों ने शुल्क में संभावित कटौती को मद्देनजर रखते हुए पहले से ही सतर्कता बरतना शुरू कर दिया है। भारत का वनस्पति तेल (कच्चा एवं रिफाइंड) आयात नवंबर, 2018 में नौ फीसदी घटकर 11.3 लाख टन रहा है। यह पिछले साल नवंबर में 12.5 लाख टन रहा था।
 
मेहता ने कहा कि आयात शुल्क में संभावित कमी को देखते हुए भारत का खाद्य तेल आयात फिलहाल धीमा हो गया है लेकिन कम आयात शुल्क के कारण जनवरी 2019 से इसमें इजाफे के आसार हैं। इसके अलावा पाम ऑयल की कीमतें 10 साल के निचले स्तर पर चल रही हैं और पाम तथा मृदु तेल के बीच का अंतर बढ़ गया है। इससे भारत द्वारा पाम ऑयल का आयात अधिक आकर्षक हो रहा है। दिलचस्प बात यह है कि खाद्य तेलों की कीमतें दो साल से भी अधिक समय से सुस्त पड़ी हुई हैं क्योंकि ज्यादातर बीजों के दाम उनके न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे रहे हैं। उदाहरण के लिए बेंचमार्क अलवर (राजस्थान) बाजार में सरसों का भाव 4,200 रुपये प्रति क्विंटल के एमएसपी से नीचे 4,180 रुपये प्रति क्विंटल चल रहा था। इसी तरह महाराष्ट्र केअकोला में सोयाबीन 3,396 रुपये प्रति क्विंटल पर चल रही थी। यह भाव 3,399 रुपये प्रति क्विंटल के एमएसपी से कुछ कम था।
 
कारगिल ब्रांड खाद्य तेलों की उत्पादक कारगिल इंडिया के पूर्व चेयरमैन सिराज चौधरी ने कहा कि यह निश्चित तौर पर भारतीय किसानों के लिए नकारात्मक बात है। एमआईसीईसीए मलेशिया से भारत में कच्चे और रिफाइंड तेल का आयात बढ़ाएगा और घरेलू खाद्य तेल की कीमतों में कमी आएगी। खाद्य तेल की कीमत में गिरावट से बीज की कीमतों में भी इसी अनुपात में कमी होगी। इस बीच कम कीमतों के कारण लाभ में कमी का सामना कर रहे खाद्य तेल उद्योग ने सरकार से डंपिंग रोकने के लिए संभावित मात्रात्मक प्रतिबंधों के साथ-साथ गैर-शुल्क अवरोधक और ऐसे ही अन्य उपाय लागू करने का आग्रह किया है। उद्योग के एक शीर्ष अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार समझौते (साफ्टा) के तहत बांग्लादेश के माध्यम से भारत में भारी खाद्य तेल आयात हुआ करता था। सरकार ने नियमों का उल्लंघन किए बिना सफलतापूर्वक इसे रोक दिया। हमने इस मामले में भी सरकार से इसी तरह केउपाय अपनाने की सिफारिश की है।
 
मलेशिया में अनुकूल जलवायु स्थिति के कारण इसका भंडार कई सालों के उच्च स्तर को छू रहा है। मलेशियाई पाम ऑयल बोर्ड द्वारा जारी किए गए नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि नवंबर में मलेशियाई पाम ऑयल का स्टॉक 10.5 फीसदी बढ़कर 30 लाख टन हो गया है जो कम से कम 18 सालों का सबसे ऊंचा स्तर है। अक्टूबर में इंडोनेशिया के 44 लाख टन से अधिक स्टॉक को मिलाकर दुनिया में पाम ऑयल के इन दोनों सबसे बड़े उत्पादकों का संयुक्त भंडार तकरीबन 80 लाख टन है।
Keyword: agri, farmer, pulses, oil, duty,,
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