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देश की अर्थनीति का हाल बताती दो बड़ी रैलियां

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  December 18, 2018

पिछले दिनों एक पखवाड़े के दरम्यान दिल्ली के रामलीला मैदान में दो बड़ी रैलियां हईं। इन रैलियों ने दिखाया कि कौन सी ताकतें आगामी आम चुनाव लडऩे की तैयारी में हैं। पहले विभिन्न वाम संगठनों के लाल झंडे तले एकत्रित हजारों किसानों ने रैली निकाली और कृषि से जुड़ी समस्याओं को हल किए जाने की मांग की। उसके बाद विश्व हिंदू परिषद और उसके सहयोगी संगठनों ने अपनी ताकत दिखाई। भगवा कपड़ों में हजारों की तादाद में युवा अयोध्या में राम मंदिर की मांग के साथ राजधानी में एकत्रित हुए। ये दोनों रैलियां मोटे तौर पर यह दिखाती हैं कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार देश की अर्थव्यवस्था का प्रबंधन करने में पूरी तरह नाकाम रही है।

 
अब यह बात लगभग सभी मानते हैं कि कृषि संकट कमोबेश देशव्यापी समस्या है। यह संकट उन इलाकों में खासतौर पर है जो खेती के लिए बारिश पर निर्भर हैं या जहां सिंचाई की व्यवस्था भरोसेमंद नहीं है। इसके लिए कई वजह जिम्मेदार हैं। यह स्पष्ट है कि मॉनसून के बारे में अनुमान लगाना अब लगातार कठिन होता जा रहा है। मौसम का अतिरंजित व्यवहार बढ़ता जा रहा है। बहुत पहले से कहा जा रहा है कि यह जलवायु परिवर्तन का असर है। भारत हमेशा से जलवायु परिवर्तन से सर्वाधिक जोखिम वाले देशों में शुमार रहा है। किसान इससे सबसे अधिक प्रभावित होंगे, यह भी तय है। इसके अलावा तमाम प्रशासनिक नाकामियां भी तय हैं। सरकारी बीमा योजनाओं में बार-बार फेरबदल के बावजूद उनके डिजाइन में कोई सुधार नहीं है। किसानों को उनके जरिये होने वाले भुगतान में देरी हो रही है या फिर भुगतान नहीं हो पा रहा है। 
 
एक रहस्यमय बात यह है कि बीमा कंपनियां किसानों को पैसे चुकाने के बावजूद काफी मुनाफा कमा रही हैं। गेहूं और चावल के अलावा अन्य फसलों की सरकारी खरीद की सही व्यवस्था नहीं बन सकी है। सरकारी खरीद की व्यवस्था इतनी व्यापक भी नहीं है इसलिए किसान सर्वाधिक संवेदनशील नजर आ रहे हैं। ग्रामीण भारतीयों को अन्य प्रकार के हस्तांतरण के प्रयास किए गए लेकिन इस हस्तांतरण पर पूरा भरोसा नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि कृषि ऋण को माफ करने की पुरानी प्रवृत्ति भारतीय राजनीति में स्थायी रूप से घर कर गई है और रामलीला मैदान पर एकत्रित हुए किसानों की रैली में यह एक प्रमुख मांग थी। अन्य आय समर्थन योजनाओं के अभाव में किसान यही उम्मीद करेंगे कि राष्ट्रीयकृत बैंक उनको जरूरत के वक्त पैसे दें जबकि इसका पुनर्भुगतान वैकल्पिक हो। 
 
इस बीच राम मंदिर निर्माण की मांग के साथ नाराज युवाओं का जुटान हमें यह याद दिलाता है कि बेरोजगारी की सामाजिक स्तर पर क्या कीमत चुकानी पड़ सकती है। रोजगार की कमी केवल सामाजिक पिछड़ापन ही नहीं लाती बल्कि रोजगार-धंधे से जुड़ी पहचान का अभाव कहीं अधिक घातक रूप ले लेता है। पश्चिमी देशों में रोजगार की कमी और रोजगार बाजारों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने प्रवासियों के खिलाफ भावनाओं को बहुत हद तक भड़काने का काम किया है। ये भावनाएं पहले भी मौजूद थीं लेकिन तब वे दबी-ढकी रहती थीं। यहां भी वैसा ही कुछ नजर आ रहा है। इसका यह अर्थ नहीं है कि ऐसे आंदोलन का प्राथमिक कारक धार्मिक कट्टरपंथ नहीं है। इसका अर्थ केवल यह है कि धार्मिक कट्टरता कई व्यक्तियों के जीवन में अहम भूमिका निभाती है। सन 2000 के दशक में देश ने ऐसी उम्मीद नहीं की थी। उस वक्त कई लोगों ने पूरे भरोसे के साथ कहा था कि ऐसे आंदोलन अपनी उपयोगिता खो बैठे हैं। यहां तक कि अयोध्या आंदोलन से जुड़े रहे नेता लालकृष्ण आडवाणी जब प्रधानमंत्री बनने की होड़ में थे तब उन्होंने भी अपने अभियान में इसे बहुत कम तवज्जो दी। 
 
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी शुरुआती महीनों में यह सब नजर नहीं आया। अपनी कट्टर छवि के बावजूद उन्होंने कहा था कि देश को बिना आंतरिक संघर्ष के 10 वर्ष तक संपदा निर्माण के काम में लगना है। अभी वर्ष 2014 तक करोड़ों रोजगार तैयार होने की बात की जा रही थी। परंतु समय बीतने के साथ ये बातें हवाई साबित होती गईं। इस बीच नोटबंदी ने कई नौकरियां छीन लीं। अब जबकि 2019 शुरू होने वाला है, इतने बड़े पैमाने पर नौकरियों की संभावना बहुत कम नजर आ रही है। सरकार मौजूदा रोजगारों के औपचारिकीकरण पर केंद्रित नजर आ रही है। ऐसा करके उसका इरादा कर्मचारी भविष्य निधि का विस्तार करना और सूक्ष्म, लघु और मझोले उपक्रमों को ऋण में इजाफा करना है। सरकार का मानना है कि यही उद्यमिता को बढ़ावा देना है। परंतु इससे रोजगार से जुड़ी अनिश्चितता समाप्त नहीं होती बल्कि बढ़ती है। यहां तक कि ईपीएफओ का जबरन विस्तार भी भविष्य में नियोक्ताओं की लागत बढ़ाएगा। इससे भविष्य में उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार तैयार करने के लिए उत्साह भी कम होगा। 
 
ये दो नाकामियां यानी कृषि उपज का उचित प्रतिफल दिलाने में नाकामी और अद्र्घ शहरी इलाकों में सुनिश्चितता भरे रोजगार तैयार करने में विफलता आपस में जुड़ी हुई हैं। लोग अब तक खेती के काम में बंधे हुए हैं क्योंकि उनके पास दूसरा कोई काम नहीं है। इससे औसत उत्पादकता में कमी आती है। आज अगर आप केवल खेती से जुड़ी आय पर निर्भर हैं तो आप गरीबी के भंवर से बाहर भी नहीं निकल पाएंगे। अगर आप कोई अन्य काम तलाश करेंगे तो आपको केवल अनिश्चित रोजगार मिलेंगे। ऐसे में आप पहचान आधारित राजनीतिक लामबंदी में जुट जाएंगे।
 
देश में सुरक्षित, स्थिर और समृद्घ समाज तैयार करने की संभावनाएं कम हो रही हैं। अगर 2014 के पहले कांग्रेस तथा वैसी सोच वाले अन्य दलों की इसलिए आलोचना होती थी कि उनकी नीतियां लोगों को राज्यों पर निर्भर बनाए रखती हैं तो वहीं मोदी की पार्टी यही काम बहुसंख्यकवादी पहचान के सहारे कर रही है। भारत को ऐसी राजनीतिक ताकत की आवश्यकता है जो बदलावपरक आर्थिक नीतियां लागू करे जो देश के लोगों के जीवन स्तर में बदलाव लाने में सक्षम हों।
Keyword: economy, BJP, congress, election,,
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