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त्रासद स्थिति से गुजर रहा शिक्षा का क्षेत्र

शंकर आचार्य /  December 18, 2018

केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा गंभीर और व्यवस्थित शैक्षणिक सुधारों के बिना भविष्य बहुत अंधकारमय नजर आ रहा है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं शंकर आचार्य 

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आशा की किरण
 
आम जनता देश की स्थायी वृद्घि और विकास के लिए सबसे बड़ी संसाधन है। 130 करोड़ की आबादी में से आधे 25 वर्ष से कम उम्र के और करीब दोतिहाई 35 वर्ष से कम उम्र के हैं। करीब 85-90 करोड़ लोग कामगार उम्र के हैं और इनमें से आधे श्रम शक्ति का हिस्सा हैं। ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि देश के आर्थिक महाशक्ति बनने में अधिक समय नहीं है। चीन को देखिए, वह इसका उदाहरण है। दुर्भाग्य की बात यह है कि चीन तथा अधिकांश अन्य पूर्वी एशियाई देशों के उलट भारत ने आजादी के बाद से लगातार मूलभूत शिक्षा की अनदेखी की है। 
 
देश में विद्यालयों और शिक्षकों की तादाद नाटकीय अंदाज में बढ़ी है और 6 से 14 की उम्र के बच्चों के नामांकन की दर 95 प्रतिशत से ऊंची है लेकिन हमारे विद्यालय बेहतर शिक्षण प्रदान करने में नाकामयाब रहे हैं। अभी भी इसमें कोई अहम सुधार होता नजर नहीं आ रहा है। देश के लाखों ग्रामीण विद्यालयों में शिक्षा और शिक्षण का क्या हाल है उसके बारे में सबसे अच्छी जानकारी प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन नामक स्वयंसेवी संगठन की वार्षिक शिक्षा रिपोर्ट (असर) देती हैं। हर वर्ष यह रिपोर्ट देश के 560 से अधिक ग्रामीण जिलों के 16,000 से अधिक गांवों के 6 लाख से अधिक बच्चों पर तैयार की जाती है। वर्ष 2005 में जब ऐसी पहली रिपोर्ट जारी की गई और कहा गया कि सरकारी विद्यालयों में कक्षा 5 में पढऩे वाले बच्चों में से बमुश्किल आधे ही कक्षा दो की किताब पढ़ सकते हैं, तो इसे लेकर चर्चा तो हुई लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों ने स्थिति में सुधार का कोई प्रभावी उपाय नहीं किया। असर ने एक बाद एक अपनी रिपोर्ट में शिक्षा क्षेत्र की दुखद स्थिति बयां की। 
 
अप्रैल 2010 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम आया। इसके अलावा स्वचालित प्रोन्नति की व्यवस्था भी की गई। माना तो यही गया था कि इसके आने से ग्रामीण विद्यालयों में छात्रों की तादाद में इजाफा होगा और शिक्षण के नतीजे भी बेहतर होंगे। परंतु हकीकत में इसका एकदम उलटा हुआ: सरकारी विद्यालयों में नाम लिखाने वाले 6 से 14 वर्ष के बच्चों की तादाद में तेजी से कमी आई। जबकि निजी विद्यालयों में होने वाला नामांकन वर्ष 2010 के 24 प्रतिशत से 2014 तक बढ़कर 31 प्रतिशत हो गया। सरकारी विद्यालयों में शिक्षण का गिरता स्तर तो और अधिक निराश करने वाला था। कक्षा 5 के बच्चे जो कक्षा दो की किताबें पढ़ सकते थे, उनकी तादाद 2010 के 51 प्रतिशत से घटकर 2013 में 41 प्रतिशत रह गई। यह वह अवधि थी जब निजी विद्यालयों में इस अनुपात में कोई बदलाव नहीं आया था। वहां यह स्तर लगातार 63-64 प्रतिशत बना रहा। सरकारी विद्यालयों में इस गिरावट को लेकर कोई स्पष्ट वजह सामने नहीं आ सकी है। 
 
गणित सीखने के मामले में रुझान और खराब है। वर्ष 2010 में सरकारी विद्यालयों में कक्षा 5 में पढऩे वाले बच्चों में से केवल 34 प्रतिशत ही भाग देने जैसा सामान्य गणित हल कर सकते थे। वर्ष 2013 आते-आते यह आंकड़ा गिरकर 21 फीसदी रह गया। इस विषय में निजी विद्यालयों का प्रदर्शन भी अच्छा नहीं रहा और यहां भी प्रतिशत 44 से गिरकर 39 पर आ गया। तमाम ग्रामीण विद्यालयों की बात करें तो 2016 तक कक्षा पांचवीं के आधे से कम ही बच्चे कक्षा 2 की किताब पढ़ पाते थे और उनमें से एक चौथाई ही सामान्य भाग दे पाते थे। देश के ग्रामीण इलाकों के विद्यालयों का यह प्रदर्शन खतरे की घंटी है। इसके दूरगामी परिणाम होंगे। 
 
असर 2016 की रिपोर्ट बताती है कि देश के ग्रामीण विद्यालयों में कक्षा 3 में पढऩे वाले केवल एक चौथाई बच्चे ही पढऩे और गणित के सामान्य मानकों पर स्तरीय थे। इसका अर्थ यह हुआ कि तीन चौथाई बच्चे पहले ही पीछे छूट चुके हैं। यानी विद्यालयीन व्यवस्था में  शिक्षण-प्रशिक्षण का काम काफी पीछे है। इतना ही नहीं अधिक आबादी वाले गरीब राज्यों में तो मामला राष्ट्रीय औसत की तुलना में कहीं अधिक खराब है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान,  झारखंड और छत्तीसगढ़ में सरकारी विद्यालयों की कक्षा 3 में 15 फीसदी से भी कम बच्चे गणितीय कौशल में योग्य थे। पहले दो राज्यों में तो यह प्रतिशत 10 से भी कम था। वर्ष 2016 में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के सरकारी विद्यालयों के 90 फीसदी से भी अधिक बच्चे गणितीय पढ़ाई में औसत मानक से काफी पीछे थे। अब अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसके आगे उनका प्रदर्शन कैसा रहा होगा। 
 
वर्ष 2009 में हिमाचल प्रदेश और तमिलनाडु के 15 वर्ष की उम्र के बच्चों ने प्रोग्राम फॉर इंटरनैशनल स्टूडेंट असेसमेंट में भाग लिया जिसका आयोजन ऑर्गनाइजेशन फॉर इकनॉमिक कोऑपरेशन ऐंड डेवलपमेंट ने किया था। भारतीय विद्यार्थियों को यहां 73 देशों में 72वां स्थान मिला था। वे केवल किर्गिजिस्तान से ऊपर थे। इसके विपरीत चीन के शांघाई प्रांत ने अध्ययन, गणित और विज्ञान में शीर्ष स्थान पाया था।  ये आंकड़े एकदम स्पष्ट नतीजे देते हैं। हमने सबके लिए विद्यालयीन शिक्षा का लक्ष्य भले ही हासिल कर लिया हो लेकिन हमारे विद्यालय अभी शिक्षा के स्वीकार्य मानकों से काफी पीछे हैं। तमाम वजहों से हमारे विद्यालयों में बहुत सीमित शिक्षण हो रहा है। इसके आर्थिक और सामाजिक परिणाम बहुत दीर्घकालिक और परेशान करने वाले होंगे। हमारी विद्यालयीन व्यवस्था बहुत सीमित कौशल प्रदान कर रही है, ऐसे में युवा पुरुष और महिलाएं जो हर वर्ष श्रम शक्ति में शामिल हो रहे हैं वे संतोषजनक रोजगार कैसे पाएंगे? वे इस डिजिटल युग से कदमताल कैसे कर पाएंगे? हमारी अर्थव्यवस्था अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी कैसे बन पाएगी जब हमारी श्रम शक्ति ही कमजोर होगी। हम सतत और समावेशी सामाजिक और आर्थिक विकास कैसे हासिल कर पाएंगे जबकि हमारी बुनियादी शिक्षा की जड़ और शाखाएं ही नहीं होगी या वह बहुत कमजोर होगी? बिना केंद्र और राज्य स्तर पर गंभीर और व्यवस्थित शैक्षणिक सुधारों के भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है। 
 
(लेखक इक्रियर के मानद प्रोफेसर और भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: education, school, rural,,
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