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ट्रेड मार्क और कॉपीराइट कानूनों से जुड़े पेच
अदालती आईना
एम. जे. एंटनी /  March 06, 2009

विभिन्न विधान और अंतरराष्ट्रीय संधियां लागू होने के साथ साथ बौध्दिक संपदा अधिकार कानून का तेजी से विस्तार हो रहा है, लेकिन ट्रेड मार्क और कॉपीराइट की बाबत कुछ पुराने सवाल अब भी स्पष्ट व्याख्या का इंतजार कर रहे हैं।

ऐसे मुद्दों पर फैसला लेने में अदालतें जितना समय ले रही हैं वह भी ठीक नहीं है। ट्रेड मार्क से संबंधित किसी मामले के आधे निपटारे में दो दशक का समय लग सकता है जैसा कि हाल ही में ठकराल मेकेनिकल वर्क्स बनाम पीएम डीजल (प्राइवेट) लिमिटेड के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से जाहिर होता है।

दिल्ली उच्च न्यायालय में यह याचिका 1985 में दायर की गई थी और सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ कानूनी मुद्दों पर फैसले के बाद अब इसे बौध्दिक संपदा अपील बोर्ड के पास भेज दिया है। ट्रेड मार्क के इस विवाद में तीन फर्म शामिल थीं।

समस्या अपने आपमें 19वीं शताब्दी की थी, जब कानून निर्माताओं को लगा कि यह खत्म हो गई है। जब साल 1999 में ट्रेड मार्क ऐक्ट को संशोधित किया गया तो 'ट्रैफिकिंग इन ट्रेड मार्क' का मुहावरा हटा दिया गया। कानून में ट्रैफिकिंग को परिभाषित नहीं किया गया था। इसकी व्याख्या का जिम्मा अदालतों पर छोड़ दिया गया था।

सामान्य शब्दों में ट्रैफिकिंग का मतलब है ट्रेड मार्क को कमोडिटी यानी जिंस की तरह व्यवहार करना। एक फर्म अपने उत्पाद या उत्पाद की श्रेणी के लिए ट्रेड मार्क का पंजीकरण इसके इस्तेमाल के इरादे के बिना करवाता है, लेकिन किसी और को इसके इस्तेमाल की इजाजत प्रतिफल के आधार पर देता है।

1986 के एक मामले में (अमेरिकन होम प्रोडक्ट) सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसी कवायद रकम बनाने के लिए किसी और को ट्रेड मार्क के अधिकार को बेचना भर है। न्यायालय ने कहा कि किसी खास ट्रेड मार्क में दिलचस्पी रखने वालों से रकम झटकने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है।

1990 में मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा था - पूरा का पूरा लाइसेंस उसी व्यक्ति के लिए होना चाहिए जो इसका (ट्रेड मार्क) पंजीकरण खुद के इस्तेमाल के लिए कराना चाहता हो। व्यावहारिक रूप से यह सामान्य प्रक्रिया है। पुराने कानून में प्रावधान है कि पंजीकरण के लिए कोई ऐसा आवेदन स्वीकार नहीं किया जा सकता जब तक कि विभिन्न पक्षकारों के बीच ट्रेड मार्क की ट्रैफिकिंग को रोकने की खातिर उल्लिखित नियम के आधार पर यानी शर्तों पर समझौता नहीं हो जाता।

हालांकि कानून बनाने वालों ने इसे अनावश्यक पाया और साल 1999 में इसे छोड़ दिया गया। ट्रेड मार्क के प्रोप्राइटर से उन सभी मामलों पर नियंत्रण की अपेक्षा की जाती है जिनमें यह इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन इससे समस्या का निदान नहीं हो पाया है और विभिन्न मामलों में सामने आ ही जाता है।

ट्रेड मार्क के संबंध में ठकराल विवाद पर फैसला देते समय सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ निश्चित सिध्दांत तय किए हैं। न्यायालय ने कहा - क्या ट्रेड मार्क के पंजीकृत प्रोप्राइटर ने ट्रैफिकिंग का सहारा लिया है या नहीं और इसे कार्यवाही में निश्चित रूप से तय किया जाए। सिध्दांत रूप से संपत्ति के खरीदार की जिम्मेदारी बनती है कि वह पूछताछ करे, इसलिए यह ऐसे मामले में लागू नहीं हो सकता।

पंजीकृत ट्रेड मार्क को किसी और को देने का अधिकार जब तक वैधानिक है और अगर एक बार वैधानिक रूप से इसे किसी और को दे दिया गया तो कानून के मुताबिक लेने वाले के पास भी उतना ही अधिकार होगा जैसा कि देने वाले के पास था। हाल के हफ्तों में सर्वोच्च न्यायालय का एक और फैसला कॉपीराइट कानून की बाबत एक दिलचस्प सवाल पर आधारित था।

(अकेडमी ऑफ जनरल एजुकेशन बनाम बी. मालिनी माल्या)। विद्वान स्वर्गीय कोटा शिवराम कारंत ने अकादमी का निदेशक रहते हुए नृत्य नाटक के नए रूप की खोज की थी। अपनी वसीयत में उन्होंने इसका कॉपीराइट मालिनी माल्या को सौंप दिया था, जो बुढ़ापे में उनकी देखभाल करती थी। साल 2001 में दिल्ली में उन्हें श्रध्दांजलि देते हुए इसका मंचन किया गया था। मालिनी माल्या ने इसे कॉपीराइट का उल्लंघन माना और अकादमी से क्षतिपूर्ति की मांग की।

उस नृत्य नाटक की स्थिति की बाबत सवाल उठ खड़ा हुआ - क्या यह साहित्यिक काम था क्योंकि इसे नाटकीय साहित्य के तौर पर पढ़ा जा सकता था (शेक्सपियर के नाटक की तरह) या फिर यह नाटक से जुड़ा काम था? इसका जवाब काफी कठिन दिखता है। कानून साहित्यिक काम का उदाहरण देता है, जिसमें इसे समेकित करना और कंप्यूटर डेटाबेस शामिल है।

परफॉर्म करने वालों में अभिनेता, गायक और बीन बजाने वाले सपेरे शामिल हैं। लेकिन जब साहित्य और प्रदर्शन एक ही तरह के काम की तरफ अभिमुख हों तो फिर स्थिति स्पष्ट नहीं है। कर्नाटक उच्च न्यायालय को लगा कि नाटक से जुड़ा काम साहित्य का एक रूप है। उनके मुताबिक, नाटक में भी साहित्यिक भाव होता है।

लेखक के काल्पनिक कौशल के बिना न तो साहित्य और न ही नाटक लिखा जा सकता है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों में अंतर कर दिया, न्यायालय का कहना है कि कानून के मुताबिक दोनों में अंतर है। किसी नृत्य नाटक का प्रदर्शन साहित्यिक काम की परिधि में नहीं आता।

इस व्याख्या केप्रभाव के बारे में अभी तक कुछ भी स्पष्ट नहीं है और कानून के मुताबिक इसकी व्याख्या अंडा व मुर्गी जैसे मामले से ज्यादा जटिल हो सकता है। आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में अकादमी को इस नृत्य नाटक के मंचन की इजाजत दे दी, लेकिन कहा कि इस कानून की शर्तों का पालन किया जाना जरूरी है।

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