बिजनेस स्टैंडर्ड - अवसर का पूरा लाभ उठाने की जरूरत
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अवसर का पूरा लाभ उठाने की जरूरत

नीलेश मूंदड़ा /  December 17, 2018

लॉजिस्टिक्स और परिवहन के क्षेत्र में उपलब्ध अवसरों का पूरा लाभ उठाए जाने की आवश्यकता है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं नीलेश मूंदड़ा  

 
वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के रूप में देश के सबसे बड़े कर सुधारों की तारीफ भी हुई और आलोचना भी। एक वर्ष बीतने के बाद आम राय यही है कि जीएसटी ने आपूर्ति शृंखला को मजबूत किया है, हालांकि उच्च अनुपालन बोझ और जटिल स्लैब दरों को लेकर कुछ चिंताएं भी बरकरार रहीं। अधिकांश कंपनियों ने अपनी आपूर्ति शृंखला को नए सिरे से तैयार कर लिया था। उनका अनुमान था कि जीएसटी का एकतरफा प्रभाव होगा और स्टॉक ट्रांसफर डिपो बंद होंगे तथा यह काम मूल गोदाम के पास चला जाएगा। इस नजरिये में एक बात की अनदेखी की गई है, वह यह कि जीएसटी आधारित आपूर्ति शृंखला बदलाव जीवन में एक बार आने वाला अवसर प्रदान करता है। यही वह अवसर है जब किसी कंपनी के सभी महत्त्वपूर्ण भाग मसलन बिक्री, आपूर्ति शृंखला, खरीद और विनिर्माण आदि नेटवर्क पर पुनर्विचार के लिए एकजुट होने के इच्छुक हैं।
 
जीएसटी को लेकर मचे हो हल्ले के बीच कंपनियों में देश के लॉजिस्टिक क्षेत्र की लंबी अवधि को लेकर सीमित समझ के बीच कंपनियां देश में कुछ रुझानों को रेखांकित करती हैं जो आपूर्ति शृंखला को नया आकार देने में सक्षम हैं। इसने आपूर्ति शृंखला बदलाव के जरिये हासिल हो सकने वाले ऊपरी मूल्य को सीमित कर दिया है। अच्छी खबर यह है कि वे अभी भी नीचे उल्लिखित चार अहम रुझानों की मदद से देश में आपूर्ति शृंंखला के लिहाज से अहम मूल्यों को हासिल कर सकते हैं।
 
पहला रुझान: मौजूदा बुनियादी निवेश की उत्प्रेरक शक्ति
 
देश का बुनियादी ढांचा क्षेत्र सरकारी और निजी निवेश के क्षेत्र में अप्रत्याशित दरों का सामना कर रहा है। ये निवेश और मेक इन इंडिया के रूप में नीतिगत उत्प्रेरक दोनों देश के विनिर्माण क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाने में सक्षम हैं। इनका असर माल परिवहन नेटवर्क में भी नजर आएगा। सरकार ने रेलवे, सड़क (भारतमाला) और नौवहन (सागरमाला) परियोजनाओं के लिए करीब 22 लाख करोड़ रुपये का बजट बनाया है। सरकार ने पेशेवर प्रबंधन वाले राष्ट्रीय निवेश एवं अधोसंरचना फंड (एनआईआईएफ) के लिए 20,000 करोड़ रुपये की प्रतिबद्घता जताई है। यह फंड मूल बुनियादी क्षेत्रों मसलन लॉजिस्टिक्स, बंदरगाह, सड़क, विमानन, बिजली आदि पर ध्यान देगा। पांच प्रमुख औद्योगिक कॉरिडोर (उदाहरण के लिए डीएमआईसी, बीएमआईसी) विकसित करने, 14 तटीय आर्थिक क्षेत्र (सीईजेड) और 29 विनिर्माण क्लस्टर (16 थोक और 13 पृथक)। 
 
इन बुनियादी विकासों से लाभान्वित होने के लिए कंपनियों को इन उभरते विनिर्माण केंद्रों और नए परिवहन माध्यमों (उदाहरण के लिए तटीय परिचालन) को अपनी नई आपूर्ति शृंखला बदलाव के खाके में शािमल करना होगा। हकीकत में कुछ प्रमुख लॉजिस्टिक्स कारोबारी पहले ही एक छोर से दूसरे छोर तक लॉजिस्टिक सेवा प्रदान करने की दिशा में अग्रसर हैं। इन्हें उभरते नीतिगत बहुमॉडल हब्स के साथ सुसंगत बनाया जाएगा। 
 
दूसरा रुझान: बदलावपरक नियामकीय बदलाव 
 
देश का वाणिज्यिक वाहन उद्योग दो नियामकीय बदलावों के प्रभावों का अनुभव कर रहा है। ये ऐसे बदलाव हैं जो मांग और क्षमता संबंधी आवश्यकताओं को नए सिरे से परिभाषित कर सकते हैं। इन बदलावों के तहत ट्रक के इंजन और ट्रेलर को अलग करने और इसकी अधिकतम एक्सल लोड क्षमता बढ़ाना शामिल हैं। 
 
पहला, ट्रेलर को खींचने वाले वाहन को अलग करने से इसके उपयोग में इजाफा हो सकता है क्योंकि ऐसा करने से कई ट्रेलरों का पंजीयन एक इंजन या वाहन से करने से अब अलग-अलग ट्रेलर अब यात्रा के अलग-अलग चरण में काम आ सकते हैं। अब ट्रेलर के भार रहित होने की स्थिति में इन्हें नहीं रोका जा सकता। इससे कंपनियों को प्रोत्साहन मिलेगा कि वे देश में ट्रांसशिपमेंट हब निर्मित करें। ऐसे हब दुनिया भर में पिछले कई दशकों से परिचालित हो रहे हैं। 
 
सरकार ने भारी वाहनों के अधिकतम एक्सल लोड को भी 20 से 25 प्रतिशत बढ़ाकर अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप कर दिया। उसके इस कदम से अधिकांश सड़क परिवहन की परिवहन लागत में कमी आ सकती है और देश भर में अल्पावधि की ट्रक क्षमता में इजाफा होगा। कंपनियां इस अवसर का इस्तेमाल अपने मौजूदा उत्पाद-ट्रक मिश्रण का नए सिरे से आकलन करने में कर सकती हैं। इसी आधार पर वे अपने परिवहन व्यय को भी बेहतर बना सकती हैं। 
 
तीसरा रुझान: देश में शहरीकरण और उपभोक्ताओं की उभरती आवश्यकता
 
मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट (एमजीआई) के प्रकाशन: वृद्घि और बदलाव के पांच अवसर (2016) में अनुमान जताया गया है कि भारत के शहरीकरण की दर सन 2030 तक 41 फीसदी हो सकती है। मांग बढऩे और खुदरा कारोबार के विस्तार के साथ खपत का रुझान भी नाटकीय अंदाज में बदल रहा है। उदाहरण के लिए अधिक से अधिक संख्या में लोग ऑनलाइन खरीदारी कर रहे हैं। इससे यह स्पष्ट हो रहा है कि वे खुदरा दुकानदारों से क्या चाहते हैं। उद्योग जगत को अब नए मांग केंद्रों और सूक्ष्म बाजारों के उभार की उम्मीद करनी चाहिए। ये उपभोक्ताओं की बदलती आकांक्षाओं को पूरा करने का काम करेंगे जो किफायत, सेवा और संचार से संबंधित हैं। 
 
जैसे-जैसे कंपनियां अपना नेटवर्क मजबूत कर रही हैं, उन्हें ऐसे भौगोलिक क्षेत्रों और स्थानों की पहचान करनी होगी जहां वे अपनी पहुंच बना सकती हैं। देश में जिलावार जीडीपी वृद्घि से जुड़ा एमजीआई का अध्ययन बताता है कि बीते पांच वर्ष में मांग के जो केंद्र रहे हैं, अब उनमें बदलाव आएगा। अगर इस रुझान की अनदेखी की गई तो नई योजना के तहत तैयार किया गया नेटवर्क इन नए सूक्ष्म बाजारों की सेवा करने में नाकाम साबित हो सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इनमें शीघ्र हिस्सेदारी पाने के लिए उच्च सेवा स्तर की आवश्यकता होगी।
 
चौथा रुझान: एससीएम 4.0 का प्रभाव 
 
यह स्पष्ट है कि आपूर्ति शृंखलाओं को सही मायनों में कुशल बनाने के लिए डिजिटल और एनालिटिक्स को इस बदलाव से जोडऩा होगा। मांग को अनुमन्य एनालिटिक्स के साथ आकार देना, मार्ग का अनुरूप अल्गोरिदम, परिचालन उत्पादकता के लिए स्वचालित व्यवस्था, लेनदेन के विवरण पर आधारित अनुमन्य परिवहन, समूचे नेटवर्क में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए क्लाउड आधारित ऐप्लीकेशंस तथा अन्य तकनीक आधारित नवाचारों से आपूर्ति शृंखला में आमूलचूल बदलाव लाया जा सकता है। भारत में 50 से अधिक स्टार्टअप पहले ही आपूर्ति शृंखला को अलग-अलग स्तरों पर प्रभावित कर रही हैं। अब जबकि कंपनियां अपनी आपूर्ति शृंखला संबंधी नीति को नए सिरे से तैयार कर रही हैं तब सलाह यही होगी कि कम से कम इनमें से कुछ के पास पहुंचकर समझा जाए कि वे पारंपरिक मॉडलों में किस तरह का विचलन या कितना मूल्यवर्धन कर सकते हैं। अभी ढेर सारी गुंजाइश बाकी है जिसका आकलन किया जाना है। कंपनियां इन सभी रुझानों के आधार पर नए सिरे से आकलन कर आपूर्ति शृंखला में सफल बदलाव ला सकती हैं। अवसर उपलब्ध है। इसका लाभ तत्काल लिया जाना चाहिए। 
Keyword: logistic, GST, store, stock,,
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