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मौद्रिक नीति की दिशा पर रखनी होगी नजर

पुनीत वाधवा /  December 17, 2018

बाजार के लिए पिछला हफ्ता हलचलों से भरा रहा क्योंकि इसे भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर के इस्तीफे और पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे का सामना करना पड़ा। जूलियस बेयर के प्रबंध निदेशक और शोध प्रमुख (एशिया) मार्क मैथ्यूज ने पुनीत वाधवा को दिए साक्षात्कार में कहा कि भारत को लेकर वह अंडरवेट बने हुए हैं। अब नजर रहेगी मौद्रिक नीति की दिशा पर। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश...

 
राज्यों के चुनाव के नतीजे और अचानक आरबीआई गवर्नर के बदले जाने को आप कैसे देखते हैं?
 
चुनाव के नतीजे उम्मीद के मुताबिक रहे हैं। अहम यह है कि अब भारतीय जनता पार्टी को साल 2019 में केंद्र में गठबंधन सरकार बनानी पड़ सकती है। बाजार में गिरावट आ सकती है क्योंकि इसे लगता है कि गठबंधन सरकार उसके लिए ठीक नहीं होगी। या फिर इसमें बढ़ोतरी हो सकती है क्योंकि इसे लगता है कि भाजपा कारोबारी समुदाय के प्रतिनिधियों की आवाज पर अब ज्यादा ध्यान दे सकती है। दोनों तरह के विचारों में बाजार समान रूप से बंटी नजर आ रही है, ऐसे में चुनाव का हालांकि शोर है, पर यह काफी कम प्रासंगिक रह सकता है। रघुराम राजन के इस्तीफे के महज दो साल बाद उर्जित पटेल के इस्तीफे से संकेत मिलता है कि केंद्रीय बैंक और सरकार के बीच कुछ ढांचागत विरोध है।
 
विदेशी निवेशक इस घटनाक्रम को कैसे देख रहे हैं?
 
कोई भी घटनाक्रम चौंकाने वाला नहीं है क्योंकि अक्टूबर में सुनने को मिला था कि आरबीआई गवर्नर इस्तीफा देना चाहते हैं और राजनीतिक पंडितों ने संभावना जताई थी कि भाजपा राज्य चुनावों में पराजित हो सकती है। आरबीआई गवर्नर में बदलाव रुपये के लिए सकारात्मक नहीं है।
 
भारत आपके लिए खरीदो और निवेशित रहो वाला बाजार था। अब आपकी क्या राय है?
 
सितंबर के मध्य में हम तटस्थ हो गए और अक्टूबर के शुरू में अंडरवेट। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी, उम्मीद से ज्यादा खराब आय और एनबीएफसी से जुड़े मसलों के अलावा अमेरिकी फेडरल रिजर्व की टिप्पणी के चलते हमने अपना रुख बदला। तब से तेल की कीमतें नीचे आई हैं और कंपनियों के पूंजीगत खर्च में कुछ सुधार हुआ है। एनबीएफसी की समस्या कम हुई है और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की टिप्पणी नरम हुई है।
 
आरबीआई गवर्नर के बदले जाने के बाद बैंकों और एनबीएफसी में सुधार /नीतिगत प्रक्रिया कहां टिकी हुई है?
 
अब मौद्रिक नीति की दिशा पर नजर रखनी होगी। आरबीआई और सरकार के बीच मतभेदों में पीएसयू बैंकों के लिए त्वरित व उपचारात्मक कदम (पीसीए), सरकार को लाभांश का वितरण और उधारी में बढ़ोतरी, एसएमई व एनबीएफसी को सहारा देने की खातिर नकदी के प्रावधान शामिल हैं। अगर नई नीति का झुकाव नकदी/बढ़त को सहारा देने की ओर रहता है तो यह मध्यम अवधि के लिहाज से वित्तीय क्षेत्र के लिए लाभकारी होगा। हमें चुनिंदा खुदरा व कॉरपोरेट ओरिएंटेड बैंक पसंद हैं। मजबूत कारोबार वाले कुछ एनबीएफसी भी हमें पसंद हैं।
 
कंपनियों की आय में बढ़ोतरी को लेकर आपकी क्या उम्मीदें हैं?
 
वित्त वर्ष 2019 में आय में बढ़त की रफ्तार करीब 14 फीसदी रहने की संभावना है, जो पहले के 22-24 फीसदी के अनुमान से काफी कम है। वित्त वर्ष 2020 के लिए यह अभी भी 24 फीसदी की उम्मीद की जा रही है। हमें वित्त वर्ष 2019 में यह 12 फीसदी रहने का अनुमान है जबकि वित्त वर्ष 2020 में यह 17 फीसदी रह सकता है। हमें अच्छी गुणवत्ता वाली वित्तीय कंपनियां, वाहन कंपनियां और सीमेंट कंपनियां पसंद हैं। अगले 12-18 महीने में हमें पूंजीगत खर्च व निवेश चक्र में तेजी आने की उम्मीद है।
 
साल 2019 में संपत्ति वर्ग के तौर पर इक्विटी कैसा रहेगा?
 
यह कहना मुश्किल है कि अगले साल बाजार चढ़ेगा या नीचे आएगा। स्पष्ट तौर पर साल 2018 में निराशा मिली है।
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