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सहकारी संघवाद की खातिर मिलकर काम करें केंद्र और राज्य सरकार

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  December 16, 2018

नरेंद्र मोदी ने जब प्रधानमंत्री के रूप में अपनी पारी शुरू की थी, तब उन्होंने सरकारी संघवाद को बढ़ावा देने का वादा किया था। हालांकि इन शब्दों से उनका क्या मतलब था, इसे लेकर खुलकर कुछ नहीं कहा गया। लेकिन इसका मुख्य लक्ष्य यह था कि केंद्र और राज्य आर्थिक वृद्धि और विकास के लिए मिलकर काम करेंगे। मोदी ने प्रधानमंत्री बनने से पहले एक और बयान दिया था, जिसने भी लोगों का ध्यान आकृष्ट किया था। उन्होंने वर्ष 2014 के आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड जीत से पहले नई दिल्ली में दिए एक भाषण में कहा था कि भारतीय टीम में केवल प्रधानमंत्री और उनकी मंत्रिपरिषद ही शामिल नहीं हैं, बल्कि इसमें प्रधानमंत्री और 30 से अधिक मुख्यमंत्री शामिल हैं। 

 
साढ़े चार साल बाद मोदी के सहकारी संघवाद ने थोड़ा अलग रास्ता पकड़ लिया है। हां, भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री निश्चित रूप से उस टीम इंडिया का हिस्सा हैं, जिसकी वह अगुआई करते हैं। लेकिन यह मोदी के सहकारी संघवाद का सबूत नहीं है। भाजपा शासित राज्यों के पास केंद्र की भाजपा सरकारों के निर्देश के पालन के अलावा और कोई चारा नहीं है। सहकारी संघवाद का असली परीक्षण तो यह है कि वह भाजपा से इतर दलों द्वारा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को कितने बेहतर तरीके से टीम में शामिल कर पाते हैं। जब हम कुछ विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों को देखते हैं तो पाते हैं कि वह सरकारी संघवाद बहुत कम नजर आता है, जिसकी मोदी ने बात की थी। 
 
कुछ महीनों पहले मोदी ओडिशा गए थे। वह जिन कार्यक्रमों में हिस्सा लेने गए थे, उनमें से एक झारसुगुडा हवाई अड्डे का उद्घाटन था। यह एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम था क्योंकि यह ओडिशा में  दूसरा हवाई अड्डा है। इस उद्घाटन समारोह में ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक भी मौजूद थे। लेकिन यह सभी को स्पष्ट दिख रहा था कि मोदी और पटनायक टीम इंडिया से जुड़े सदस्यों की तरह कहीं से नजर नहीं आ रहे थे। असल में उद्घाटन समारोह में मोदी राज्य सरकार और उसके प्रदर्शन के आलोचक थे। 
 
झारसुगुडा हवाई अड्डे पर जो कुछ हुआ, वह केंद्र और विपक्षी दलों द्वारा शासित ज्यादातर राज्यों के बीच कड़वे संबंधों का प्रतीक था। यह सहकारी संघवाद के बयान से बिल्कुल विपरीत है। केरल का ही मामला लें। केरल में बाढ़ से तबाही के समय राज्य को संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की मदद को लेकर केंद्र और केरल के बीच परस्पर विरोधी बयान आए थे। यूएई ने कथित रूप से राज्य में पुनर्वास कार्यों के लिए केरल सरकार को 7 अरब रुपये की पेशकश की थी। हालांकि केंद्र सरकार ने देश में पुनर्वास के लिए किसी विदेशी सरकार की मदद लेने से इनकार कर दिया था। 
 
यूएई की पेशकश को स्वीकार न करने का मोदी सरकार का तर्क समझ से बाहर है। केरल को यूएई की पेशकश इस बारे में एक विवाद बन गई कि केंद्र किस तरह एक राज्य सरकार की चिंताओं को दूर करता है। इससे निश्चित रूप से बचा जा सकता था। यह विवाद इसलिए भी पैदा हुआ क्योंकि केरल में विपक्षी दल की सरकार है और मोदी सरकार का रुख केंद्र और विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों के बीच कटु संबंधों में सटीक बैठता है। इसके बाद दो और विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों का फैसला आया कि वे अपने क्षेत्राधिकार में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को जांच नहीं करने देंगे। पहला राज्य आंध्र प्रदेश था और दूसरा पश्चिम बंगाल। दोनों राज्यों ने आरोप लगाया कि केंद्र सीबीआई का इस्तेमाल राजनीति प्रेरित जांचों के लिए कर रहा है। यह दो राज्यों के अपने यहां सीबीआई को जांच नहीं करने देने का दुर्लभ मामला है। यह देखना होगा कि क्या अन्य विपक्षी राज्य भी इसकी देखादेखी करते हैं। 
 
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी पीछे न रहते हुए सरकारी कर्मचारियों के लिए 2004 में लागू राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली की जगह पहले की पेंशन योजना को बहाल करने की योजना बनाई है। पहले ही पेंशन योजना को फिर से शुरू करने का मतलब है कि इससे वित्तीय बोझ बढ़ेगा, लेकिन इससे बड़ी तादाद में वोट मिल सकते हैं। इससे केंद्र को इस मामले पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। दिल्ली में शहरी विकास परियोजनाओं का उद्घाटन भी केंद्र और केजरीवाल के बीच विवाद की जड़ बन गया है। 
 
15वें वित्त आयोग के अपने सिफारिशें देने में भी अब एक साल से कम समय रह गया है। आयोग केंद्र बंटवारे वाले संसाधनों को राज्यों के साथ साझा करने के तरीके सुझाएगा। 15वें वित्त आयोग के नए नियम एवं शर्तों को लेकर पहले ही कुछ राज्य सवाल उठा चुके हैं। उनका कहना है कि संसाधनों के आवंटन की कुछ शर्तें या तो ठीक से परिभाषित नहीं हैं या केंद्र के कार्यक्रमों को पूरा करने से जुड़ी हुई हैं। उदाहरण के लिए लोकलुभावन योजना को कौन परिभाषित करेगा? 15वें वित्त आयोग के संसाधनों में कटौती की सिफारिश के रूप में उन राज्यों पर जुर्माना लगाने के आसार हैं, जो लोक-लुभावन योजनाओं को अपनाएंगे। राज्यों की तरफ से अलग-अलग तरीकों से चुनौतियां आ रही हैं। केंद्र सरकार इनकी अनदेखी नहीं कर सकता। उसे राज्यों के साथ मिलकर काम करना चाहिए ताकि सहकारी संघवाद का शाब्दिक और भावनात्मक रूप से अनुसरण किया जा सके। 
Keyword: narendra modi, BJP, states,,
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