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आगे बढ़ा एक कदम

संपादकीय /  December 16, 2018

पोलैंड के कैटोविस में संपन्न 24वें संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन ने पेरिस जलवायु समझौते का वर्ष 2020 से क्रियान्वयन सुनिश्चित कर दिया है। ऐसा दुनिया के सबसे बड़े प्रदूषक अमेरिका के पेरिस समझौते से बाहर रहने और विकसित देशों के उत्सर्जन कटौती लक्ष्य को बढ़ाने और वैश्विक हरित कोष में योगदान बढ़ाने से अनिच्छा जताने के बावजूद हुआ है। हालांकि साझा लेकिन विभेदीकृत जिम्मेदारियों और वित्त एवं तकनीक तक पहुंच के मामले में विकासशील देशों की कुछ प्रमुख चिंताओं पर या तो गौर नहीं किया गया है या फिर उन्हें अगले साल की मंत्रिस्तरीय बैठक के लिए छोड़ दिया गया है। 

 
अमेरिकी प्रशासन ने वाशिंगटन से एक बयान जारी कर यह कहा है कि पेरिस समझौते के समर्थन में वह कोई भी दायित्व या वित्तीय वादा नहीं करता है। कई अन्य समृद्ध देशों ने भी बड़े तेल उत्पादक एवं निर्यातक देशों के साथ जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल में कटौती करने का कड़ा विरोध किया है। खुद पोलैंड भी अपने कुल बिजली उत्पादन का 80 फीसदी हिस्सा कोयले से पैदा करता है। यह साफ है कि कैटोविस में एक सकारात्मक सहमति होने के बाद भी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में निकट भविष्य में कमी आने की संभावना कम है और वैश्विक तापमान में वृद्धि की प्रक्रिया भी जारी रहने के आसार हैं। विकसित देश जलवायु परिवर्तन पर गठित अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की रिपोर्ट स्वीकार करने को राजी नहीं हुए। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक ताप वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर रखने का पेरिस समझौते का लक्ष्य हासिल कर पाने में नाकाम रहने के प्रलयंकारी सामाजिक-आर्थिक दुष्परिणाम हो सकते हैं। पेरिस समझौते में जलवायु संरक्षण संबंधी संकल्प पूरा करने के लिए कोई बाध्यता नहीं होने से यह अनिश्चित है कि कैटोविस सम्मेलन के निष्कर्ष वैश्विक तापन से होने वाले नुकसान की भरपाई कर पाने के लिए काफी होगा या नहीं। आईपीसीसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि धरती का औसत तापमान पहले ही पूर्व-औद्योगिक काल से एक डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है और वर्ष 2030-2052 के दौरान यह कभी भी 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार कर सकता है। ऐसा होने पर भारी बारिश की तीव्रता एवं आवृति बढऩे के साथ ही भीषण अकाल की घटनाएं भी बढ़ेंगी। इसके अलावा मच्छरों से पैदा होने वाली मलेरिया एवं डेंगू जैसी बीमारियों का प्रकोप बढ़ेगा जो मानव उत्पादकता को कम करेगा और गरीबी बढ़ेगी। इससे भी बुरी बात यह है कि वैश्विक तापन का भार गरीब पर गैर-आनुपातिक रूप से पड़ेगा। वैश्विक तापन के लिए सबसे कम जिम्मेदार होने के बावजूद गरीब इसके दुष्परिणामों से निपट पाने में अक्षम हैं। इसके बावजूद कुछ बेहतर न होने से पेरिस समझौता ही मानवजाति के लिए उम्मीद की इकलौती किरण है। 
 
सम्मेलन में पेरिस समझौते को ठीक से लागू करने के नियम बनाया जाना अच्छा कदम है। सहमति वाली योजनाओं में कुछ तकनीकी दिशानिर्देशों का जिक्र है। इनसे वातावरण में उत्सर्जित होने वाले ग्रीनहाउस गैस की गणना हो सकेगी। इससे जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने की देशों की प्रगति की पारदर्शी निगरानी हो सकेगी। इससे देशों के बीच यह भरोसा कायम करने में मदद मिल सकती है कि सभी देश वैश्विक तापन से निपटने के लिए अपनी भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि ज्यादातर देशों ने उत्सर्जन में कमी के प्रयास तेज करने के लिए कार्बन ट्रेडिंग जैसी प्रणाली का सुझाव दिया लेकिन इस पर सहमति नहीं बन सकी। इस मसले का जल्द समाधान होने पर ही स्वच्छ तकनीकों में निजी निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा। 15 साल की ग्रेटा थुनबर्ग ने जलवायु संकट के प्रति कमजोर वैश्विक प्रतिक्रिया को दमदार तरीके से आवाज दी। ग्रेटा ने एक सशक्त संदेश दिया लेकिन दुर्भाग्य से कुछ विकसित देशों के नेताओं ने उसकी अनदेखी की। 
Keyword: environment, world, india, IPCC, pollution, green house gas,,
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