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मध्य प्रदेश के लिए मुफीद हो सकते हैं कमलनाथ

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  December 14, 2018

वह लंदन और न्यूयॉर्क में खुद को शायद अधिक सहज महसूस करते हैं। लेकिन अब कमलनाथ खुद को भोपाल और इंदौर में अधिक तनहा पाएंगे। आखिर वह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। वैसे यह पहला मौका है जब वह राज्य स्तर पर कोई पद संभालने वाले हैं। यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि वह किस तरह से चुनौतियों का सामना करते हैं? कमलनाथ अपने-आप में असामान्य तरह के व्यक्ति हैं। उनके परिवार का कोई भी सदस्य राजनीति में नहीं है लेकिन वह मौजूदा लोकसभा के सबसे अनुभवी सांसद हैं और अपनी लोकसभा सीट छिंदवाड़ा से नौ बार निर्वाचित हो चुके हैं। वह एक ऐसे दल में शामिल उद्योगपति हैं जिसके प्रमुख नेता अब भी खुद को समाजवादी मानते हैं। खुदरा क्षेत्र को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के लिए खोलने के प्रस्ताव का कांग्रेस के तीन कैबिनेट मंत्रियों ने विरोध किया था। ये मंत्री ए के एंटनी, वयलार रवि और कमलनाथ थे। इनमें से दो मंत्री वामपंथी रुझान वाले राज्य केरल से ताल्लुक रखते हैं। हालांकि कमलनाथ का विरोध खुदरा क्षेत्र को खोलने को लेकर नहीं था बल्कि सरकार के इस क्षेत्र में एफडीआई के लिए समुचित कदम नहीं  उठाने को लेकर था। उनकी राय थी कि सरकार को एफडीआई की राह में कई तरह की अड़चनें नहीं लगानी चाहिए और राज्यों को खुद अपने नियम तय करने की छूट देनी चाहिए। आखिरकार सरकार ने यही फैसला लिया था और बाद में आई नरेंद्र मोदी सरकार भी कमलनाथ की उस राय पर ही चली है।

 
कमलनाथ के पास बड़ा कारोबारी साम्राज्य है लेकिन उनके खिलाफ घोटाले या जांच का कोई मामला सामने नहीं आया है। उन्हें कांग्रेस के कई दिग्गजों के साथ भी जद्दोजहद करनी पड़ी है। पी चिदंबरम के साथ एसईजेड के मसले, मोंटेक सिंह आहलूवालिया के साथ सड़कों और राजमार्गों के निर्माण ठेकों के आवंटन के मसले और विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में व्यापार वार्ताओं के दौरान व्यापार मंत्री रहते समय उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से भी दो-दो हाथ किए थे। चर्चाओं के बावजूद वह अपने मंत्रालय के अधिकारियों के साथ खड़े रहे और दबाव के आगे झुकने से मना कर दिया था। उन्होंने सड़क एवं राजमार्ग मंत्री रहते समय अपने कुछ अफसरशाहों के खिलाफ आरोप लगने के बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को जांच की इजाजत भी दी थी। वह ऐसे मंत्री रहे हैं जिनकी तारीफ उनके राज्यमंत्रियों ने खुलकर की थी। इसकी वजह यह है कि कमलनाथ अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों को काम सौंपते भी रहे हैं। उनका नेटवर्क काफी दूर तक फैला हुआ है। अब कोई भी 1984 के सिख-विरोधी दंगों में उनकी कथित संलिप्तता को लेकर सवाल नहीं पूछता है।
 
कमलनाथ की नई नियुक्ति एक और वजह से दिलचस्प है। उनका न तो जन्म मध्य प्रदेश में हुआ था और न ही वह इस राज्य में पले-बढ़े हैं। उन्होंने केवल लोकसभा में इस राज्य का प्रतिनिधित्व किया है। जब उन्हें मध्य प्रदेश में कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया तो उसकी वजह संभवत: यह थी कि उन्हें राज्य के दो बड़े नेताओं ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह ने खतरे के तौर पर देखा था। बहरहाल कमलनाथ को ऐसी रणनीतियां बनाने का श्रेय दिया जाना चाहिए जिनके बूते कांग्रेस को जीत मिली। उन्होंने इस चुनाव में अपना निजी पैसा लगाया, खेमों और गुटों में बंटी पार्टी को एकजुट किया और अपने दशकों पुराने दोस्त दिग्विजय सिंह की सलाह को अहमियत दी। उन्होंने पूरे अभियान और मतगणना की निगरानी बेहद करीब से की। बूथ स्तर के कांग्रेस कार्यकर्ताओं से कहा गया था कि भाजपा जीत के लिए किसी भी हद तक जा सकती है लिहाजा उन्हें मतगणना की प्रक्रिया में कुछ भी गड़बड़ दिखे तो वे तत्काल विरोध कर मतगणना रुकवाएं और उसकी शिकायत दर्ज कराएं। दूसरी तरफ भाजपा का चुनाव अभियान कुछ हद तक अपनी चमक इसलिए भी खो बैठा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पास दिग्विजय के मुख्यमंत्री रहने के दौरान की दुखद स्थिति के बारे में कहने के सिवाय कुछ रह ही नहीं गया था। लेकिन इस चुनाव में मतदान करने वाले बहुतेरे युवा मतदाताओं ने तो केवल भाजपा का ही शासन देखा है, लिहाजा उनके मन में कांग्रेस को लेकर किसी तरह का दुराव नहीं था।
 
लेकिन अब कमलनाथ पर प्रदर्शन करने का दबाव होगा। छिंदवाड़ा से बार-बार चुनाव जीतना एक बात है और पूरे मध्य प्रदेश के लिए कारगर रणनीति बनाना एकदम अलग बात है। उन्हें कृषि क्षेत्र की समस्याओं को दूर करना है, राज्य में निवेश सुनिश्चित करना है और सबसे बढ़कर, उन्हें हमेशा अपने पीछे खड़े समर्थन पर नजर रखनी है। कांग्रेस को राज्य में मामूली अंतर से मिले बहुमत को देखते हुए इसमें कोई संदेह नहीं है कि भाजपा उनकी सरकार का तख्तापलट करने की कोशिश करेगी। 
 
कमलनाथ के सामने कुछ अन्य चुनौतियांं भी हैं। मध्य प्रदेश मानव विकास सूचकांक में काफी नीचे है। वहीं महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में यह राज्य सबसे ऊपर है। आम तौर पर कानून का पालन करने वाले किसानों में भी असंतोष गहराता जा रहा है। लेकिन ढांचागत विकास और कारोबार के क्षेत्र में अपने अनुभव के चलते वह मध्य प्रदेश की कमान संभालने के लिए शायद सबसे मुफीद शख्स हैं। 
 
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