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'व्यक्तिगत' नहीं 'संस्थागत' है पटेल का इस्तीफा

ओंकार गोस्वामी /  December 13, 2018

ऊर्जित पटेल के इस्तीफे के साथ ही आरबीआई की परिचालनात्मक स्वायत्तता का दौर खत्म हो सकता है। ओंकार गोस्वामी का कहना है कि केंद्रीय बैंक के कामकाज में बढ़ सकता है केंद्र सरकार का दखल।

 
ऊर्जित पटेल इस्तीफा देने वाले तीसरे गवर्नर हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पहले गवर्नर सर ऑसबर्न स्मिथ ने जून 1937 में अपना कार्यकाल पूरा होने के पहले ही इस्तीफा दे दिया था। उनका कार्यकाल साढ़े तीन वर्षों का था लेकिन दो साल और 90 दिन के बाद ही उन्होंने पद छोड़ दिया। पद छोडऩे की उनकी वजह साधारण थी। विनिमय दर और मौद्रिक नीति पर उनके विचार सरकार के रुख से मेल नहीं खा रहे थे। आरबीआई गवर्नर के पद से इस्तीफा देने वाले दूसरे शख्स सर बेनेगल रामाराव थे। रामाराव ने चौथे गवर्नर के पद से अपना इस्तीफा जनवरी 1957 में तत्कालीन वित्तमंत्री टी टी कृष्णमाचारी के साथ मतभेद गहराने पर दिया था। केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता को लेकर छिड़े विवादों के चलते उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी अपने वित्तमंत्री का साथ दिया जिसके बाद रामाराव को इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा। 
 
इसके 61 साल बाद ऊर्जित पटेल इस सूची में शामिल होने वाले तीसरे गवर्नर हैं। पटेल ने सोमवार को तत्काल प्रभाव से अपना इस्तीफा देकर नौ महीने का शेष कार्यकाल पूरा नहीं करने का फैसला किया है। सवाल है कि पटेल ने इस तरह अचानक पद छोडऩे का फैसला क्यों किया? उन्होंने आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड की अगली बैठक के चंद दिन पहले ही यह फैसला लिया। भले ही पटेल के इस्तीफे में निजी कारणों का हवाला दिया गया है लेकिन आरबीआई और सरकार के बीच पिछले कुछ महीनों से जारी अंदरूनी घटनाक्रम से परिचित शख्स के साथ ही केंद्रीय बोर्ड में शामिल स्वच्छंद एवं नए सदस्य भी निजी बातचीत में यह मानेंगे कि पटेल के इस्तीफे का कारण 'व्यक्तिगत' नहीं था। उनके पद छोडऩे के कई कारण थे और वे सभी संस्थागत हैं।
 
उन रिपोर्टों पर यकीन मत कीजिए जिनके मुताबिक 19 नवंबर को हुई पिछली बोर्ड बैठक काफी हद तक सामंजस्यपूर्ण माहौल में संपन्न हुई थी। उस दिन दोपहर तक हर कोई यही प्रार्थना कर रहा था कि पटेल और उनके द्वारा चुने हुए डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के इस्तीफों के साथ वह बैठक न खत्म हो। 19 नवंबर की उस शाम को जब ऐसा कुछ नहीं हुआ तो लोगों ने राहत की सांस ली और अगले दिन सुर्खियां यही बनी कि दोनों पक्षों के बीच के मतभेदों को सौहार्दपूर्ण तरीके से खत्म कर लिया गया है। 
 
लेकिन ऐसा नहीं था। वह बैठक लंबी, थकाऊ, बेहद मुश्किल और शायद ही सहजीवी थी। केंद्रीय बोर्ड के कुछ प्रमुख सदस्यों की तरफ से कड़ी मांग रखने के अभ्यस्त न रहे गवर्नर और उनके चार डिप्टी गवर्नरों को पहले की तुलना में सबसे ज्यादा सहमति जतानी पड़ी। वित्त मंत्रालय की तरफ से सुभाष चंद्र गर्ग और राजीव कुमार एवं स्वदेशी जागरण मंच के एस गुरुमूर्ति की तरफ से पटेल की टीम पर भारी दबाव डाला गया था।  इसकी पुष्टि के लिए आप 19 नवंबर की बोर्ड बैठक के पहले की आरबीआई की राय और बाद में लिए गए फैसले पर एक नजर डाल सकते हैं। इस बैठक से पहले तीन अहम मुद्दों पर आरबीआई की राय अलग थी। ये मुद्दे थे:
 
पहला, आरबीआई के आरक्षित भंडार से निकासी की वित्त मंत्रालय की क्षमता का था। वर्ष 2013-14 से ही आरबीआई अपना समूचा अधिशेष व्यय के लिए केंद्र सरकार के सुपुर्द करता आया है। यह राशि 65,800 करोड़ रुपये से लेकर 30,659 करोड़ रुपये तक रही। सरकार आरबीआई की आकस्मिक निधि से अधिक रकम चाहती थी और कई बार 3.6 लाख करोड़ रुपये का जिक्र भी किया गया। इस बैठक के पहले आरबीआई ने इस पर सख्त लहजे में नकारात्मक तेवर दिखाया था। लेकिन बैठक के बाद आरबीआई एक विशेषज्ञ समिति के गठन के लिए राजी हो गया जो केंद्रीय बैंक के आर्थिक पूंजीगत ढांचे को तय करेगी। इस समिति के सदस्यों एवं शर्तों का फैसला सरकार और आरबीआई दोनों को मिलकर करना है। दीवार पर लिखी इबारत काफी साफ थी: विशेषज्ञ समिति के गठन का तरीका अपनाकर ऐसा रास्ता बनाया जाए कि आरबीआई के आरक्षित भंडार में से बड़ी रकम का हस्तांतरण सरकार को किया जा सके। पटेल और उनकी टीम यह अहम लड़ाई हार गई थी। 
 
दूसरा मुद्दा 13 अप्रैल को जारी त्वरित उपचारात्मक कदम (पीसीए) ढांचे से संबंधित था जिसमें फंसे कर्ज से बेहाल 11 सार्वजनिक बैंकों और एक निजी बैंक के परिचालन पर सख्ती बरती गई थी। 19 नवंबर के पहले आरबीआई की राय यही थी कि यह ढांचा अलंघनीय है और बैंकिंग प्रणाली की भावी सेहत के लिए इस राह से हटना अस्वीकार्य है। लेकिन 19 नवंबर की बैठक के बाद आरबीआई का शीर्ष नेतृत्व कुछ सार्वजनिक बैंकों के लिए पीसीए मसौदे को नरम करने पर विचार के लिए एक समिति गठित करने पर राजी हो गया। इस तरह ये दोनों मुद्दे वित्त मंत्रालय के पक्ष में गए।
 
तीसरा मुद्दा पूंजी पर्याप्तता अनुपात से संबंधित था। आरबीआई ने जोखिम के आधार पर पूंजी पर्याप्तता अनुपात तय किया था जो बेसल-3 के न्यूनतम मानकों से भी सख्त थे। ऋणग्रस्त परिसंपत्तियों की जल्द पहचान के लिए ये मानक इस साल फरवरी में निर्धारित किए गए थे। केंद्रीय बैंक इस मामले में भी झुकने को तैयार नहीं था। लेकिन 19 नवंबर के बाद आरबीआई इन पूंजी संरक्षण प्रावधानों को पूरी तरह लागू करने के लिए एक साल की मियाद देने को तैयार हो गया। हालांकि इस मोर्चे पर आरबीआई की सीधी हार नहीं हुई लेकिन प्रावधान नरम करना ही भविष्य में अधिक छूट पाने के लिए काफी है। 
 
इस तरह आरबीआई को 19 नवंबर की बैठक में बड़े झटके सहने पड़े। पूर्वानुमान लगाया गया कि समिति की अनुशंसाओं या दूसरे तरीकों से आने वाले महीनों में उस पर अधिक दबाव डाला जाएगा। आरबीआई को पिछले 20-25 वर्षों में अपने रुख में इस तरह शायद ही कभी बदलाव करना पड़ा था। सुर्खियों से परे देखने वालों के लिए यह संदेश साफ था कि इस लड़ाई में वित्त मंत्रालय की जीत हुई है और आने वाले महीनों में वह इस बढ़त को बढ़ाने की पुरजोर कोशिश करेगा। जब आप हमलावर ताकतों के आगे अपना मोर्चा छोड़ देते हैं तो आप उस जंग को न सही तो उस लड़ाई को तो हार ही जाते हैं। असल में, 19 नवंबर की शाम होते-होते आरबीआई को अपना मोर्चा छोडऩे के लिए मजबूर कर दिया गया था। ऊर्जित पटेल को इसका अहसास हो चुका था लिहाजा अपने संस्थान को और शर्मिंदगी से बचाने के लिए उन्होंने अपना इस्तीफा दे दिया। नोटबंदी के दौरान हालात को संभालने वाले गवर्नर की छवि भी उनके संस्थान को नए हमलों से नहीं बचा पाई। मेरा मानना है कि पटेल को 14 दिसंबर की बैठक में भी ऐसे हमलों का अंदेशा था। ऐसी सूरत में उन्होंने इस्तीफा दे दिया और इसकी वजह पूरी तरह संस्थागत है, न कि व्यक्तिगत। 
 
मुझे निराशाजनक तरीके से लेख खत्म करने की इजाजत दीजिए। यह संभवत: आरबीआई की परिचालन-संबंधी स्वतंत्रता के दौर का अंत है। मेरी यह राय थी कि आरबीआई के भीतर एक ऐसा आभामंडल है जो इसके गवर्नरों को संस्थान की संरक्षा करने वाले नेताओं में तब्दील कर देता है। ठीक केंटरबरी के आर्चबिशप थॉमस ऑ बेकेट की तरह। लेकिन दुखद रूप से मुझे भविष्य में ऐसा होता नहीं दिख रहा है। फिर भी मैं उम्मीद करता हूं कि मैं गलत साबित हो जाऊं। यह सरकार इस महान संस्था को जिस तरह झुकाने की कोशिश में लगी है, उससे तो मुझे हालात बिगडऩे का ही अंदेशा है।
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