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संदेहास्पद निवेश

संपादकीय /  December 13, 2018

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉर्पोरेशन (आरईसी) में बहुलांश हिस्सेदारी की बिक्री को मंजूरी दे दी है। यह हिस्सेदारी पावर फाइनैंस कॉर्पोरेशन (पीएफसी) को बेची जाएगी। यह निर्णय एकीकृत सरकारी कंपनी का निर्माण करेगा जो बिजली क्षेत्र के फाइनैंस पर दबदबा रखेगी। खासतौर पर नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को ऋण देने के मामले में। पीएफसी, आरईसी में 52.63 फीसदी हिस्सेदारी खरीदेगी और सरकार के पास केवल 6 फीसदी हिस्सा बचेगा। यानी आरईसी के प्रबंधन पर भी उसका नियंत्रण होगा। भविष्य में आरईसी पूंजी जुटाने के लिए पीएफसी पर निर्भर होगी। संक्षेप में कहा जाए तो यह एक प्रकार से अधिग्रहण है हालांकि सरकार ने जोर देकर कहा है कि दोनों कंपनियों की अलग पहचान बरकरार रहेगी। इससे सरकार को करीब 14,000 करोड़ रुपये की राशि जुटाने की आशा है। ऐसा होगा तो वह 80,000 करोड़ रुपये के विनिवेश के अपने लक्ष्य के करीब पहुंच जाएगी। यह लक्ष्य 2018-19 के बजट में तय किया गया था। इसके अलावा अन्य कारकों का ध्यान रखें तो यह कदम सही नहीं प्रतीत होता।

 
यद्यपि दोनों कंपनियां विद्युत क्षेत्र में हैं लेकिन सच यह है कि वे अलग-अलग तरीके से काम करती हैं। पीएफसी  एक सरकारी गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी है जो बिजली क्षेत्र के बुनियादी ढांचे पर ध्यान देती है जबकि आरईसी एक क्रियान्वयन करने वाली वित्तीय कंपनी है जो उत्पादन पर ध्यान देती है। ऐसे में इनके विलय की कोई उचित वजह नहीं है। कई वजहें हैं जो इसे एक बुरा विचार बनाती हैं। इसे लेकर कोई दूरगामी नीतिगत सोच भी नजर नहीं आती। इससे पहले रखा गया प्रस्ताव इसके एकदम उलट था। उस वक्त आरईसी को पीएफसी को खरीदना था। केंद्रीय बिजली मंत्रालय की सलाह के बाद इसे उलट दिया गया। परंतु यह स्पष्ट है कि केंद्रीय वित्त मंत्रालय केवल उन फंड में रुचि रखता है जो इस सौदे से राजकोष में आएंगे। हालिया वर्षों के ऐसे तमाम अन्य लेनदेन की तरह ही यह भी वास्तविक विनिवेश नहीं है। सरकार ने गत वर्ष विनिवेश का लक्ष्य तब हासिल किया जब तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) ने 40 करोड़ रुपये खर्चकर हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन में हिस्सेदारी खरीदी। अगर कोई सरकारी कंपनी दूसरी ऐसी कंपनी में हिस्सेदारी खरीदती है तो इससे अर्थव्यवस्था में सरकारी नियंत्रण नहीं कम होता। यह तो सरकारी क्षेत्र की नकदी पर सरकार के नियंत्रण का एक तरीका भर है जिससे वह अपने खर्च पूरे करती है। यह न तो विनिवेश का उद्देश्य है और न ही संबंधित कंपनियों या क्षेत्र की सेहत के लिए बेहतर है।
 
इस मामले में दिक्कत यह भी है कि क्रेता कंपनी को इस खरीद के लिए अतिरिक्त ऋण लेना होगा जबकि देश के बिजली क्षेत्र की दिक्कतों के चलते पहले ही दोनों कंपनियों की बैलेंस शीट पर भारी बोझ है। उदाहरण के लिए पीएफसी के बहीखातों में 14,000 मेगावॉट की फंसी हुई परिसंपत्तियां हैं। यानी इस खरीद के बाद संयुक्त कंपनी पर भी यह बोझ बना रहेगा। यह सच है कि बिजली क्षेत्र की स्थिति को देखते हुए पीएफसी को अपना पैसा सरकार को देने के बजाय उसका कहीं अधिक बेहतर इस्तेमाल करना चाहिए। आश्चर्य नहीं कि मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस आरईसी और पीएफसी दोनों की रेटिंग कम कर सकता है। इक्रा ने उनके कर्ज को निगरानी पर रखा है। सरकार का दावा है कि अधिग्रहण के बाद बनी कंपनी कहीं अधिक सस्ती दर पर पूंजी जुटाने में कामयाब रहेगी। निर्णय की समीक्षा की जानी चाहिए और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड तथा रिजर्व बैंक समेत सभी नियामकों को इस मामले में अपनी स्वायत्तता का प्रदर्शन करना चाहिए।
Keyword: REC, PFC, power,,
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