बिजनेस स्टैंडर्ड - चाय बागान में चीन की तकनीक
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चाय बागान में चीन की तकनीक

अभिषेक रक्षित / कोलकाता December 13, 2018

भारतीय चाय संघ (आईटीए) ने चाइना टी मार्केटिंग एसोसिएशन (सीटीएमए) के साथ एक समझौता किया है। इसके अनुसार अगले साल चीन को किया जाने वाला भारतीय चाय का निर्यात करीब दोगुना होकर 1.5 करोड़ टन हो जाएगा। इसके अलावा भारत को एशिया के अपने सबसे बड़े पड़ोसी देश से किफायती उत्पादन प्रौद्योगिकी की जानकारी भी मिलेगी। प्रमुख यूरोपीय बाजारों और दीर्घकालिक लक्ष्यों में अपनी चाय के साझा प्रोत्साहन के अलावा इस समझौते से भारतीय चाय उत्पादक गुणवत्ता बरकरार रखते हुए बागान के मशीनीकरण को समझ सकेंगे।

 
चीन हर साल अपने कृषि योग्य 2.8 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में 260.9 करोड़ किलोग्राम चाय का उत्पादन करता है। इनमें से ज्यादातर बागान अत्यधिक मशीनीकृत हैं। दूसरी ओर भारत में 5.7 लाख हेक्टेयर क्षेत्र के अंतर्गत चाय की खेती की जाती है जबकि उत्पादन करीब 130 करोड़ किलोग्र्राम रहता है जो चीन के मुकाबले आधा ही है। उद्योग के अधिकारियों का मानना ​​है कि ऐसा मुख्य रूप से इसलिए है क्योंकि भारतीय बागान श्रम-प्रधान हैं जबकि चीन में मशीनीकरण का स्तर ऊंचा है। बागानों में प्राय: अनुपस्थिति और मजदूरी संकट रहने के कारण कई बागान कंपनियां परंपरागत विधि के अंतर्गत हाथ से चाय की पत्तियों की तुड़ाई करने की अपेक्षा अपने उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा मशीन द्वारा संचालित करना पसंद कर रही हैं। हालांकि दुनिया की सबसे बड़ी चाय कंपनी मैकलॉयड रसेल के निदेशक आजम मोनेम और आईटीए के पूर्व चेयरमैन का कहना है कि मशीनीकरण से गुणवत्ता में कुछ बदलाव आ सकता है। चीन के उत्पादन में हरी चाय का योगदान 60 प्रतिशत रहता है जबकि ओलोंग का योगदान 11 प्रतिशत रहता है। भारत में इन दोनों चाय का उत्पादन मुख्य रूप से परंपरागत विधि का उपयोग करते हुए किया जाता है जबकि चीन में यह कार्य मशीन द्वारा किया जाता है। आईटीए के चेयरमैन विवेक गोयनका ने कहा कि यह समझौता भारतीय कंपनियों को सर्वोत्तम मशीनीकरण की सही तकनीक सीखने और कार्यान्वित करने में मदद करेगा।
 
यह अनुमान लगाया गया है कि मशीनीकरण से प्रत्यक्ष रूप में कम से कम 15 प्रतिशत तक उत्पादन लागत कम हो जाएगी। मोनेम ने कहा कि  एक तरफ उत्पादन लागत बढ़ रही है और दूसरी तरफ चाय की कीमतें पर्याप्त उत्साहजनक नहीं हैं। इससे व्यापार में गंभीर असंतुलन पैदा हो रहा है जिससे चाय उत्पादन अव्यावहारिक हो जाएगा। गोयनका ने कहा कि प्रौद्योगिकी सहयोग से भारतीय उत्पादकों को चाय के विभिन्न उपयोग के बारे में जानने में भी मदद मिलेगी। चाय बोर्ड के परामर्श से आईटीए का लक्ष्य चीन को किया जाने वाला निर्यात दोगुना करना है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक है और उसका सालाना आयात करीब तीन करोड़ किलाग्र्राम है। विभिन्न नियामकीय और गैर-नियामकीय नियमों के कारण भारतीय चाय में चीन के साथ समानता होने केबावजूद भारत उसकी तरह सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता के रूप में नहीं उभर पाया है। श्रीलंका इस बाजार में पैठ बनाने में सफल रहा है।
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