बिजनेस स्टैंडर्ड - भाजपा के लिए 10 कड़वे सबक
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भाजपा के लिए 10 कड़वे सबक

शेखर गुप्ता /  December 12, 2018

तीन हिंदी-भाषी राज्यों में भाजपा को मिली हार उसके लिए कुछ कड़वे सबक दे गई है। आम चुनावों में भाजपा की संभावनाओं के मद्देनजर कुछ जरूरी सुझाव दे रहे हैं शेखर गुप्ता

 
यह परंपरागत समझ है कि अमूमन जीत की गहमागहमी में विजेता की तुलना में हारने वाला ही हार से अधिक सबक सीखता है। देश के केंद्रीय भूभाग में मिली तिहरी शिकस्त से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) 10 कड़वे सबक सीख सकती है।
 
1. भाजपा का आलाकमान अंदाज वाला प्रबंधन अब टूट चुका है। इसके कारगर होने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने दम पर राज्य चुनावों का नतीजा भी पार्टी के पक्ष में लाने की काबिलियत दिखानी होती है। वह उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों तक ऐसा करने में सफल भी रहे हैं। लेकिन कर्नाटक के चुनाव में उनकी सीमाएं पहली बार नजर आईं और भाजपा सत्तारूढ़ कांग्रेस के खिलाफ मुकाबले में पिछड़ गई। तीन राज्यों में हुए इन चुनावों ने उनकी इस सीमा को और भी अधिक जाहिर कर दिया है। अगर आपके पास एक ऐसा सर्वोच्च नेता नहीं है जो आपको अपने दम पर चुनाव में जीत दिला सकता है तो आप सर्वशक्तिमान आलाकमान की व्यवस्था नहीं कायम रख सकते हैं। आपको शक्ति का हस्तांतरण करना ही होगा।
 
2. कांग्रेस-मुक्त भारत बनाने का सपना इतनी खराब कल्पना है कि खुद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने भी उससे खुद को अलग कर लिया था। अब यह स्वप्न टूट चुका है। कांग्रेस 2014 के लोकसभा चुनावों में 44 सीटों तक सिमट गई थी। लेकिन उस बदहाली में भी उसे 10.7 करोड़ मतदाताओं का साथ मिला था जबकि भाजपा को 17 करोड़ मत मिले थे। इतिहास का अपना सबसे बदतर प्रदर्शन करने की हालत में भी 10.7 करोड़ लोगों का समर्थन रखने वाली पार्टी को आप खत्म नहीं कर सकते हैं। हालत यह है कि पिछले एक साल में भाजपा के सामने कांग्रेस-युक्त गुजरात की स्थिति बनी और अब तो समूचा हिंदी हृदय-स्थल ही कांग्रेस के नेतृत्व में आ चुका है। भाजपा अब कांग्रेस को दूर रखने की चाह नहीं रख सकती है।
 
3. भाजपा के विरोधी और उससे भी अहम बात यह है कि उसके सहयोगियों को भी 'एजेंसियों' का डर सता रहा है। भाजपा ने इन एजेंसियों का न केवल काफी इस्तेमाल किया है बल्कि बहुत निर्मम भी रही है। हालांकि अतीत में कांग्रेस ने भी इन एजेंसियों का बेजा इस्तेमाल किया है लेकिन वह इस काम को थोड़ी नफासत से अंजाम देती थी ताकि लोगों की आंखों में न चुभे। भाजपा के कार्यकाल के अधिकांश मामले इतने बिगड़ गए कि वे एक सिरे पर ही जा गिरे। एजेंसियां सूचनाओं को लीक कर और प्रायोजित कर अपने शिकारों को दंडित करती हैं। आज कोई भी खराब प्रचार से डरता नहीं है क्योंकि लोग आम तौर पर इन पर यकीन नहीं करते हैं। क्रिश्चियन मिशेल से अब आपको कोई चुनावी लाभ नहीं मिलेगा। 
 
4. संस्थाओं के दमन का दौर खत्म हो चुका है। इन राज्यों के नतीजे उच्चतम न्यायालय, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) में उठे बगावती तेवरों के बाद आए हैं। इन घटनाओं ने मोदी सरकार और भाजपा की उस सख्त छवि को तगड़ी चोट पहुंचाई है जिससे भिडऩे का साहस कोई नहीं करता है। लेकिन अब ऐसा नहीं रह गया है। संस्थान अब इनके डर से मुक्त हो रहे हैं। ये चुनाव उस डर के बचे-खुचे अवशेष को भी खत्म कर देंगे।
 
5. संसद के दोनों सदनों पर वर्ष 2022 तक दबदबा बना लेने और संविधान एवं शासन प्रणाली में महत्त्वपूर्ण बदलाव कर पाने की क्षमता हासिल करने का सपना अब ध्वस्त हो चुका है। असल में, संविधान निर्माताओं ने बहुसंख्यक अतिरेक को रोकने के लिए ऐसी द्विसदनीय व्यवस्था बनाई है कि अब यह कहा जा सकता है कि सिद्धांत रूप में किसी भी दल को दोनों सदनों में एक साथ बहुमत नहीं मिल सकता है, चाहे 2019 के चुनाव का नतीजा जो हो। लिहाजा, मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली सशक्त भाजपा समेत हरेक दल को मोलभाव सीखना होगा।
 
6. भारतीय मतदाता 2018-19 में मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू या इंदिरा और राजीव गांधी के खिलाफ मत नहीं डालने वाले हैं। मतदाता या तो आपके लिए या आपके खिलाफ वोट कर रहे हैं, किसी के दादा-परदादा के लिए नहीं। लिहाजा इस टाइम मशीन के जाल से बाहर निकलिए। 2019 की जंग इस समय में लड़ी जाएगी, उस समय में नहीं। 
 
7. 'मेरा देश बदल रहा है' भाजपा का नारा है। संभवत: यह सच्चाई है। लेकिन एक बात नहीं बदल रही है कि मतदाता अहंकारी और पहुंच से दूर रहने वाले नेताओं को अब भी उसी तरह नापसंद करते हैं। मतदाता गाली-गलौज से भरी भाषा वाले चुनाव अभियान को भी पसंद नहीं करते हैं। हालिया चुनावों में भाजपा की तरफ से 'विधवा-अली-बजरंग बली' जैसे प्रतीकों का इस्तेमाल करना एक भयंकर भूल थी। आखिर 2014 के चुनाव में 'विकास' और 'अच्छे दिन' के सकारात्मक वादों ने ही आपको जबरदस्त जीत दिलाई थी।
 
8. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ भारत के उन 'हिंदू' राज्यों में शामिल हैं जहां भाजपा की कांग्रेस से सीधी टक्कर रहती रही है। इसका यह मतलब है कि इन राज्यों में मुस्लिम मत राष्ट्रीय औसत के आधे से भी कम होता है। लिहाजा, आप बड़ी मुस्लिम आबादी वाले उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में भले ही मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने में सफल हो सकते हैं लेकिन हिंदू-बहुल राज्यों के लोग उत्तर प्रदेश, केरल, कश्मीर, असम या पाकिस्तान के मुस्लिमों के खिलाफ मतदान नहीं करने वाले हैं। उनकी चिंता केवल अपने भविष्य को लेकर होती है।
 
9. वर्ष 2014 में आप जातियों के आधार पर बंटे हिंदू मतदाताओं को राष्ट्रवाद और आर्थिक आशावाद के इस्तेमाल से एकजुट करने में सफल रहे थे। लेकिन उस फॉर्मूले की आधी अवधि कुछ समय पहले ही खत्म हो चुकी है। अब, आपको जाति-आधारित दलों में से अपने लिए सहयोगी ढूंढने होंगे, उनके लिए जगह बनानी होगी या अपने प्रमुख मतदाताओं तक पहुंचने के लिए आपको कदम बढ़ाने होंगे।
 
10. और आखिर में, राहुल गांधी को किसी उपहास की तरह न लें। इस चुनाव ने राहुल को एक राजनीतिक नेता के तौर पर मान्यता दे दी है। उन्होंने इसके लिए मेहनत और प्रतिबद्धता दिखाई है। राहुल और उनके परिवार की आलोचना राजवंशीय मद और विदेशी होने की धारणा पर की जाती रही है। राहुल जब तक उदासीन नजर आते रहे और अचानक गुम होते रहे, तब तक यह आरोप कारगर रहा। उस समय आपको सच्चे और देसी सपूत की तरह देखा जाता था। युवा भारतीय मतदाता हकदारी के अहसास से नफरत करता है। लेकिन इस चुनाव में भूमिकाओं की अदला-बदली हो गई है। राहुल अधिक विनम्र, पहुंच के भीतर वाले शख्स, कम हकदार और अधिक सकारात्मक नजर आए हैं।
 
भाजपा इन 10 सबक का सामना किस तरह करती है, उससे काफी हद तक 2019 के नतीजे तय होंगे। एक बार फिर यह दोहराना चाहूंगा कि किसी जीत से विजेता को मिलने वाले सबक से कहीं अधिक सीख हार से पराजित को मिलती है। इसे विनम्रता के साथ स्वीकार करना या दंभ-भरे अंदाज में नकार देना पूरी तरह भाजपा की पसंद है।
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