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ऊर्जित का इस्तीफा सरकार और रिजर्व बैंक के लिए नहीं अच्छा

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  December 11, 2018

ऊर्जित रवींद्र पटेल ने सोमवार को 90 से भी कम शब्दों वाले बयान में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर पद से अपने इस्तीफे का ऐलान कर दिया। यह एक ऐसा धमाका था जिसका असर मंगलवार को जारी पांच राज्यों के विधानसभा नतीजों जितना होने की संभावना थी। आरबीआई के 24वें गवर्नर पटेल ने निजी कारणों का हवाला देते हुए तत्काल प्रभाव से अपना पद छोडऩे की घोषणा की और तीन साल के कार्यकाल में नौ महीने बाकी रहते ही वह इस दायित्व से अलग हो गए। पटेल का इस्तीफे वाला बयान सोमवार को शेयर बाजार बंद होने के बाद सामने आया था।

 
इसके बाद गेंद सरकार के पाले में आ गई कि वह पटेल को उत्तराधिकारी की तलाश पूरी होने तक आरबीआई गवर्नर के तौर पर बने रहने को कहती या उनका इस्तीफा तत्काल प्रभाव से स्वीकार कर लेती। सरकार आरबीआई के डिप्टी गवर्नरों में से ही किसी एक को पूर्णकालिक गवर्नर की तलाश पूरी होने तक कार्यवाहक गवर्नर भी नियुक्त कर सकती थी। मंगलवार को सरकार ने पूर्व अफसरशाह शक्तिकांत दास को आरबीआई का नया गवर्नर नियुक्त कर दिया। पटेल के इस्तीफे का वक्त ऐसा है कि हर कोई इस बात को लेकर अटकलें लगा रहा है कि पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हुई उनकी मुलाकात और मौजूदा समय के बीच आखिर क्या बदला? प्रधानमंत्री के साथ पटेल की वह बैठक आरबीआई और सरकार के बीच तमाम मुद्दों पर उभरे मतभेदों की पृष्ठभूमि में हुई थी। बैंकिंग नियमन एवं आरबीआई के कामकाज से संबंधित कई मुद्दों पर मतभेद खुलकर सामने आए थे।
 
आरबीआई के पास सुरक्षित रखे गए पैसे सरकार को हस्तांतरित करने, सार्वजनिकबैंकों के लिए न्यूनतम पूंजीगत अनिवार्यता संबंधी मानकों को शिथिल करने और फंसे कर्जों की पहचान के संबंध में नियामकीय सहनशीलता दिखाने के मुद्दे पर तनातनी चल रही थी। प्रधानमंत्री के साथ आरबीआई गवर्नर की अनौपचारिक मुलाकात आरबीआई बोर्ड की दो तूफानी बैठकों और आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य की तरफ से केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता के साथ खिलवाड़ करने पर बाजार का कोपभाजन बनने की चेतावनी के बाद हुई थी।
 
ऐसा लगा था कि मोदी-पटेल की मुलाकात के बाद आरबीआई और सरकार के बीच संघर्ष-विराम हो गया है। लेकिन सोमवार को पटेल के इस्तीफे ने इन सारे अनुमानों को गलत साबित कर दिया। पटेल के पूर्ववर्ती गवर्नर रघुराम राजन ने भी अपना कार्यकाल पूरा होने के पहले ही इस्तीफा दे दिया था लेकिन उन्होंने तत्काल प्रभाव से पद नहीं छोड़ा था। उन्होंने 18 जून, 2016 को जारी अपने बयान में कहा था कि वह सितंबर 2016 में तीन साल का अपना कार्यकाल पूरा होने के बाद पद पर बने रहने के इच्छुक नहीं हैं। उस समय सरकार को राजन के उत्तराधिकारी की नियुक्ति के लिए समय मिल गया था। पटेल के अप्रत्याशित इस्तीफे ने एक ऐसी अनिश्चितता पैदा कर दी है जिससे बचा जाना चाहिए था। पटेल मोदी सरकार के दौरान पद छोडऩे वाले तीसरे उच्च-पदस्थ अर्थशास्त्री हैं। अरविंद पानगडिय़ा ने कार्यकाल पूरा होने के पहले नीति आयोग के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था और फिर अरविंद सुब्रमण्यन ने भी अपना विस्तारित कार्यकाल पूरा होने के पहले मुख्य आर्थिक सलाहकार का पद छोड़ दिया था। पानगडिय़ा और सुब्रमण्यन के इस्तीफे पर कोई विवाद नहीं हुआ था लेकिन पटेल ने आरबीआई और सरकार के बीच मतभेदों के बीच इस्तीफा दिया है।
 
पटेल का इस्तीफा इस वजह से भी परेशान करता है कि आरबीआई की शीर्ष टीम पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव हो सकता है। खासकर पटेल की पसंद रहे विरल आचार्य पर इसका असर देखा जा सकता है जिन्होंने सरकार को प्रतिकूल असर की चेतावनी दी थी। यह सवाल पैदा होना लाजिमी था कि पटेल की जगह कौन लेगा? ऐसी संभावना जताई जाने लगी थी कि सरकार भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) संवर्ग के किसी अधिकारी को अगले साल आम चुनाव पूरा होने तक आरबीआई का जिम्मा देने के बारे में सोच सकती है। अतीत में कई सरकारें आरबीआई जैसी संस्थाओं का नेतृत्व आईएएस अधिकारी को सौंप चुकी हैं। आरबीआई की अगुआई का दायित्व किसी आईएएस अधिकारी को सौंपना इस लिहाज से भी माकूल लग रहा है कि सरकार नहीं चाहेगी कि अगले आरबीआई गवर्नर के साथ भी स्वायत्तता के मसले पर किसी तरह की तनातनी पैदा हो। सरकार के लिए किसी आईएएस अधिकारी से तालमेल रखना कहीं अधिक आसान होगा।
 
केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता बनाए रखने के सवाल पर पटेल का गवर्नर पद छोडऩे का यह निर्णय उनके कार्यकाल को एक नया आयाम देता है। उन्हें हमेशा ऐसे आरबीआई गवर्नर के तौर पर याद किया जाएगा जिनकी निगरानी में नोटबंदी के समूचे अभियान को अंजाम दिया गया जिससे बड़े पैमाने पर आर्थिक गतिरोध पैदा हुआ और आर्थिक सुस्ती का भी जन्म हुआ। लेकिन आरबीआई की स्वायत्तता बनाए रखने के सवाल पर इस्तीफा देने से पटेल को आगे चलकर एक ऐसे गवर्नर के तौर पर भी याद किया जाएगा जिसने सिद्धांत के सवाल पर अपना पद छोडऩे से भी गुरेज नहीं किया।
 
हालांकि इस बात में कोई संदेह नहीं है कि जिस तरह से उन्होंने  आरबीआई गवर्नर का पद छोड़ा है उसका गंभीर परिणाम होगा। आरबीआई को वर्षों की जद्दोजहद से संस्थागत मजबूती हासिल की है और वित्तीय क्षेत्र में अपने लिए नियामकीय परिवेश बनाया है, उसके लिए इस इस्तीफे का असर गंभीर होगा। सरकार और रिजर्व बैंक के बीच मतभेदों का खुलकर सामने आना और आरबीआई गवर्नर का अचानक इस्तीफा दे देना न तो मोदी सरकार और न ही केंद्रीय बैंक के लिए कोई बढिय़ा शकुन है।
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