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सड़क निर्माण विकास पूर्वानुभव भी है खास

विवेक देवरॉय /  December 11, 2018

देश में सड़क परिवहन के विकास को समझने पर ऐसा प्रतीत होता है कि आज जो कुछ हो रहा है वह काफी पहले भी हो चुका है। इस दोहराव के बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं विवेक देवरॉय 

 
सड़क परिवहन के विकास को समझने के लिए हमें वर्ष 1908 के इंपीरियल गजेटियर को पढऩा होगा। इसमें लिखा गया है, 'सही मार्ग को बनाए रखना और आम चलन वाले रास्तों पर लोगों के जान माल की रक्षा को कभी भी नजरअंदाज नहीं किया गया। मुगल बादशाहों ने खासतौर पर देश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर वस्तुओं के साथा आवागमन करने वाले व्यापारियों के काफिलों की निगरानी के लिए रास्तों पर सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की...आमतौर पर इन रास्तों की निगरानी थोड़ी-थोड़ी दूरी पर चौकियों की स्थापना करके की जाती थी। चौकियों के बीच के रास्तों को पत्थरों, खंभों या वृक्षों से चिह्नित किया जाता था। रास्ते जिन जमींदारों की जमीन से होकर गुजरते थे उन्हें चौकीदार दिए गए थे और उनको वहां से गुजरने वालों से मामूली टोल वसूलने की इजाजत थी। अमलगुजार या मजिस्ट्रेट अपने-अपने क्षेत्र में चोरी होने वाली सभी वस्तुओं के लिए जिम्मेदार होते थे। ऐसे में कहा जा सकता है कि सुरक्षा की स्थिति चाक-चौबंद रहती थी। 18वीं सदी के अंतिम दिनों की बात है, बनारस के रेजिडेंट जॉनथन डंकन ने बनारस की ओर आने वाली सड़कों पर चौकी शुल्क समाप्त कर दिया। पहले तो कारोबारियों ने यह कहकर इसका विरोध किया कि वे लूटे जाने का जोखिम उठाने के बादले शुल्क चुकाना पसंद करेंगे।' जमींदारों की जिम्मेदारी रक्षा एवं सुरक्षा से कहीं अधिक थी, 'बंगाल प्रेसिडेंसी में स्थानीय सड़कों को खोलने और उनके रखरखाव का काम जमींदारों के जिम्मे डाल दिया गया और सन 1822 के नियम 7 और 1833 के नियम 9 के अधीन सभी अस्थायी रूप से निर्मित परिसंपत्तियों पर 1 फीसदी का उपकर लगाया गया। ऐसा सड़क फंड बनाने के लिए किया गया ताकि जरूरी खर्च निपटाए जा सकें। स्थानीय जरूरतों को पूरा करने के बाद इस फंड से निकलने वाला कोई भी अधिशेष मुख्य मार्गों में सुधार कार्य के लिए काम में लाया जाता।' ऐसे में कहा जा सकता है कि सड़क उपकर का विचार नया नहीं है।
 
सड़क विकास की जिम्मेदारी अपने आप में कई तरह की परतें समेटे रहती है। 'बंगाल बोर्ड ऑफ गवर्नर जनरल द्वारा 1841 से 1849 के बीच बनाई गई रिपोर्ट से साफ पता चलता है कि कैसे उन दिनों प्रांत और प्रमुख मार्गों का रखरखाव अराजकता का शिकार था। प्रांतीय सरकार अपने अधिकारियों के माध्यम से वास्तविक काम को अंजाम दे रही थी और धन की आपूर्ति की जा रही थी। कई बार यह आपूर्ति सर्वोच्च सरकार द्वारा सीधे तौर पर की जाती और कई बार स्थानीय सरकार द्वारा। कई दफा यह काम सरकार और जमींदार तथा कारोबारी आंशिक तौर पर करते। कई बार यह काम राजाओं और अन्य बड़े लोगों द्वारा दिए गए दान के माध्यम से भी किया जाता था। ये वे लोग होते थे जिनके  क्षेत्र से ये सड़कें गुजरती थीं।' जब भी सरकार की ओर से जिम्मेदारी में बदलाव आता, एक किस्म का विकेंद्रीकरण होता।
 
'सड़क निर्माण चालू रखने और उनके रखरखाव से जुड़ा एक अन्य बड़ा कारक स्थानीय स्वशासन का विस्तार है...जो नगरपालिकाएं अपने सीमा क्षेत्र में सड़कों के रखरखाव के लिए जिम्मेदार थीं उनकी संख्या सन 1860 और 1870 के बीच बहुत तेजी से बढ़ी। सन 1870-71 में लार्ड मेयो के कार्यकाल में स्थानीय नीतियों और मामलों के नियंत्रण को लेकर उनके अधिकारों में भी काफी इजाफा किया गया। सन 1881-84 में लॉर्ड रिपन के कार्यकाल में इनमें और इजाफा हुआ।' इन उपायों के परिणामस्वरूप ब्रिटिश इंडिया के अधिकांश प्रंातों में अब जिला और उप जिला स्तरीय बोर्ड हैं जिनका प्राथमिक काम है भूमि उपकर तथा आय के अन्य स्थानीय स्रोतों से मिलने वाली आय से बने कोष का इस्तेमाल स्थानीय संचार माध्यमों के रखरखाव और सुधार कार्यों पर करना। इसी प्रकार जिस तरह पुराने सैन्य बोर्डों का स्थान लोक निर्माण विभाग ने ले लिया, लॉर्ड मेयो और लॉर्ड लिटन1 ने भारत सरकार को सक्षम बनाया कि वह सड़क निर्माण की अपनी अधिकांश जवाबदेही स्थानीय सरकारों को सौंप सके।
 
इसके विस्तृत ब्योरे में अंतर हो सकता है लेकिन तब भी सड़कों का एक वर्गीकरण तो अवश्य था। 'सड़क निर्माण और रखरखाव के कारोबार के लिए एक उपयुक्त ढांचे के निर्माण के साथ ही मौजूदा और भविष्य में बनने वाली सड़कों का एक क्रमानुसार वर्गीकरण आवश्यक हो गया। अब तमाम सड़कों को इस प्रकार वर्गीकृत किया गया है: पहली श्रेणी, धातु (अ) पुल या फेरी, तथा सूखा (ब) आंशिक रूप से पुल और सूखा। दूसरी श्रेणी, बिना धातु के (अ) पुल और फेरी तथा पूरी तरह शुष्क (ब) आंशिक रूप से पुल और शुष्क। तीसरी श्रेणी, तटीय और सतह पर लेकिन शुष्क नहीं। चौथी श्रेणी, तटीय लेकिन सतह वाली नहीं, आंशिक रूप से पुल वाली और शुष्क। पांचवीं श्रेणी, साफ और आंशिक रूप से पुल और शुष्क। छठी श्रेणी, केवल साफ। पहली श्रेणी की (अ) सड़कें और कुछ अन्य क्षेत्रों में ऐसे इलाके हैं जहां पौधरोपण किया गया। हालांकि अब मुख्य मार्गों पर चौकीदारी के लिए चौकियां बनाने की कोई आवश्यकता बाकी नहीं रह गई थी लेकिन सड़कों के किनारे यात्रियों के लिए आरामगृह तथा सराय का निर्माण कराने पर किए गए व्यय को उचित माना जा सकता है।'
 
वर्ष 1927-28 में भारतीय सड़क विकास समिति का गठन किया गया। इसकी अध्यक्षता एम आर जयकर के नाम पर है। जयकर समिति की अनुशंसाओं के बाद सन 1934 में भारतीय सड़क कांग्रेस का गठन किया गया। यह राजमार्ग इंजीनियरों की सर्वोच्च संस्था थी। सन 1943 में नागपुर में सभी राज्यों के चीफ इंजीनियर्स की एक बैठक आयोजित की गई। इसी के जरिए नागपुर योजना सामने आई। यह योजना सन 1943 से 1963 के बीच सड़क विकास के लिए बनाई गई थी। जयकर समिति ने सड़कों के बहुस्तरीय नेटवर्क पर विचार किया। इसमें मुख्य सड़कें और फीडर रोड दोनों शामिल थीं। नागपुर योजना ने इसे बढ़ावा दिया और वर्गीकरण को और अधिक स्पष्ट किया: (क) राष्ट्रीय राजमार्ग, (ख) राज्य राजमार्ग, (ग)प्रमुख जिला मार्ग, (घ) छोटे जिला मार्ग और (च) ग्रामीण सड़कें। इससे एक बात का अंदाजा तो मिलता है कि जो कुछ अब हो रहा है, वह पहले भी हो चुका है।
Keyword: road, transport, NHAI,,
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