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ऊर्जित पटेल: बोले कम मगर दिखाया ज्यादा असर

अनूप रॉय / मुंबई 12 10, 2018

ऊर्जित का इस्तीफा

बिजनेस स्टैंडर्ड ऊर्जित पटेल: बोले कम मगर दिखाया ज्यादा असरभारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के 24वें गवर्नर बनने से पहले उर्जित आर पटेल इस केंद्रीय बैंक में डिप्टी गवर्नर थे। डिप्टी गवर्नर के तौर पर मौद्रिक नीति की जिम्मेदारी संभालने के दौरान पटेल को 10 जनवरी 2016 को अपने तीन वर्षीय कार्यकाल का विस्तार मिला था। केन्या में जन्मे और अंतरराष्ट्रीय ख्याति के अर्थशास्त्री पटेल संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के दौरान भारत आए। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनके बारे में कहा था, 'वह देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।'

सामान्य तौर पर किसी को शांत रहकर विवाद टालने के लिए जाना जाता है। पटेल को शुरू में खासकर नोटबंदी जैसे मुद्दों पर सरकार का करीबी माना गया। लेकिन उनकी यह चुप्पी जल्द टूट गई, क्योंकि पटेल ने अन्य किसी आरबीआई गवर्नर से अलग हटकर कुछ नीतिगत मामलों पर अपने सख्त तेवर दिखा दिए। नोटबंदी पर, उन्होंने न ही इस निर्णय से खुद को अलग किया और न ही सार्वजनिक रूप से इसका समर्थन किया। उन्होंने और उनकी टीम ने हालांकि यह सुनिश्चित किया कि कुछ महीनों में व्यवस्था में नकदी लौट आई।

पटेल ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा था, 'उल्लू बुद्धि का पारंपरिक प्रतीक है। इसलिए हम न तो कबूतर हैं और न ही बाज, लेकिन उल्लू हैं और जब अन्य सोते हैं तो हम जागते हैं।' पटेल अपनी बुद्धि और सतर्कता से एक भयंकर उल्लू साबित हुए। उनके मार्गदर्शन में मुद्रास्फीति स्थिर बनी रही, क्योंकि केंद्रीय बैंक ने उपभोक्ता कीमत सूचकांक (सीपीआई)-आधारित मुद्रास्फीति को 4 प्रतिशत के केंद्र बिंदु (+ - 2 प्रतिशत) में बनाए रखा। पटेल ने पुनर्गठन, दिवालिया संबंधित मानकों, दिवालिया से जुड़े व्यावसायिक समूहों की बिक्री जैसे मुद्दों पर सरकार के रुख का समर्थन करने से इनकार किया और भारतीय बैंकों के बहीखाते में फंसे कर्ज के समाधान को लेकर ढृढ़ बने रहे। 

वह और उनके डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने यह स्पष्ट कर दिया कि सार्वजनिक क्षेत्र के 11 बैंकों को त्वरित सुधारात्मक कार्य (पीसीए) ढांचे के तहत बनाए रखा जाना चाहिए। लेकिन जिस चीज ने पटेल को निराश किया, वह शायद आरबीआई में स्वायत्तता का अभाव था जिस बारे में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) भी पुष्टि कर चुका है। जनवरी 2018 में आईएमएफ ने अपने फाइनैंशियल सेक्टर एसेसमेंट प्रोग्राम (एफएसएपी) में महसूस किया कि आरबीआई स्वायत्तता के मुद्दे पर गैर-अनुपालन से जुड़ा हुआ है।

आईएमएफ ने अपनी रिपोर्ट में कहा, 'आरबीआई ऐक्ट में कई ऐसे अधिकार शामिल हैं  जो इस केंद्र सरकार को आरबीआई के निर्णयों का उल्लंघन करने में सक्षम बनाते हैं। भले ही इन अधिकारों का इस्तेमाल नहीं किया गया है, लेकिन वे व्यापक हैं और उनका अस्तित्व आरबीआई की कानूनी स्वतंत्रता को नजरअंदाज करता है।'इस पृष्ठभूमि के खिलाफ आरबीआई ने गैर-निष्पादित आस्तियों (एनपीए) और इनके पुनर्गठन के संबंध में 12 फरवरी को एक सर्कुलर जारी किया। केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट कहा कि यदि ऋण 91 दिन से अधिक समय से बकाया है, तो यह दिवालिया की श्रेणी में है और वसूली प्रक्रिया संबद्घ खाते के खिलाफ शुरू की जा सकती है।

इससे सरकार और आरबीआई के बीच टकराव बढ़ गया क्योंकि सरकार विद्युत क्षेत्र की कंपनियों के पक्ष में प्रावधान में बदलाव चाहती थी।  कुल मिलाकर, इसी तरह के टकरावों की वजह से पटेल और सरकार के बीच तनातनी तेजी होती गई। पटेल यह भी चाहते थे कि सरकार आरबीआई को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक बोर्डों को लेकर अधिक अधिकार सौंपे। पटेल भी इन मुद्दों को लेकर मुखर होते गए और उन्होंने राजकोषीय घाटे और बॉन्ड की बढ़ती आपूर्ति जैसे मुद्दों पर एक संवाददाता सम्मेलन में सरकार की खुलकर आलोचना कर डाली।  निजी क्षेत्र के बैंकों के संदर्भ में पटेल ने यह स्पष्ट कर दिया कि आरबीआई खासकर फंसे कर्ज से निपटने के संबंध में कोई नरमी नहीं बरतेगा। साथ ही पटेल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर भी समान नियंत्रण चाहते थे। 
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