बिजनेस स्टैंडर्ड - फ्लोटिंग दर वाले कर्जदार और आरबीआई का रुख
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, January 18, 2019 09:38 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

फ्लोटिंग दर वाले कर्जदार और आरबीआई का रुख

देवाशिष बसु /  December 10, 2018

फ्लोटिंग दर वाले कर्जदारों के प्रति आरबीआई के अचानक उमड़े लगाव को लेकर अपनी राय सामने रख रहे हैं देवाशिष बसु

 
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने गत 5 दिसंबर को बैंकों तथा वित्तीय कंपनियों द्वारा खुदरा ऋण (आवास ऋण, कार ऋण तथा छोटे कारोबार आदि) पर फ्लोटिंग दर पर की जाने वाली वसूली में कुछ बदलाव किए हैं। एक अप्रैल 2019 से बैंकों को ऐसे ऋण पर ली जाने वाली ब्याज दर को अपने आंतरिक मानक के बजाय एक बाहरी मानक से जोडऩा होगा। किसी ने इसकी विडंबना पर ध्यान नहीं दिया और लगभग हर प्रकाशन ने इसका स्वागत किया। विडंबना यह कि नियामक ने दो दशक तक बैंकों को खुली छूट दी कि वे फ्लोटिंग दर पर ऋण लेने वाले ग्राहकों को लूटते रहें। प्रश्न यह है कि अब ये कदम क्यों उठाया गया है?
 
सबसे पहले मैं आपको यह मसला समझाता हूं। फ्लोटिंग व्यवस्था के अधीन जब ब्याज दरें ऊपर जाती हैं तो बैंक तत्काल दरें बढ़ा देते हैं लेकिन जब दरें कम होती हैं तो ऋण लेने वाले को बैंक जाकर अनुरोध करना होता है और वह कुछ भुगतान करके दरों में कमी करवा पाता है। दरें कम न करने के पीछे बैंक की दलील क्या थी? उनके मुताबिक आवास ऋण एक अनुबंध है और बैंक एकतरफा तरीके से दरें नहीं घटा सकते। यह अच्छी दलील है लेकिन दरों में इजाफे के वक्त यह कहां चली जाती है? कोई व्यक्ति यह क्यों चाहेगा कि उसकी ब्याज दर कम न हो? जाहिर है आप अब तक हर कुछ महीने में जो सुर्खियां पढ़ते आए हैं कि आपका आवास ऋण सस्ता हो रहा है, वह एक तरह से झूठ है। 
 
20 वर्ष की लूट
 
आरबीआई करीब 20 वर्ष से इस लूट का समर्थन करता आया है। अपनी अकादमिक भाषा में वह जो कुछ कहता है उसे अगर सरल शब्दों में समझें तो बैंक ग्राहकों से ज्यादा पैसा वसूल रहे थे। एक दशक बाद अप्रैल 2003 में आरबीआई ने बैंकों और वित्तीय कंपनियों को सलाह दी कि वे मानक पीएलआर (बीपीएलआर) दर के आधार पर शुल्क लें। क्या यह तरीका कारगर हुआ? आरबीआई ने कहा कि कुल मिलाकर पीएलआर और बीपीएलआर दोनों वास्तविक अर्थव्यवस्था में पर्याप्त मौद्रिक पारेषण नहीं कर सकीं। इससे इन मानकों को पेश करने का उद्देश्य ही पूरा नहीं हुआ। यह एक तरह से अपना घर बनाने के लिए जूझ रहे आम लोगों से खुली लूट थी। पीएलआर या मानक दर वह दर है जिस पर कोई बैंक अपने प्राथमिकता वाले ग्राहकों ऋण देता है। सोचिए एक ऐसी नकदी संपन्न कंपनी के बारे में जिसे नकदी की कोई खास आवश्यकता न हो। जाहिर है पीएलआर बैंक की सबसे निचली दर होगी। बाकियों से अधिक शुल्क लिया जाएगा। परंतु हकीकत यह है कि हर किसी से पीएलआर से कम दर ली जा रही थी। पीएलआर एक घोटाला था। इसे कृत्रिम रूप से बढ़ाकर रखा जाता था ताकि हर किसी को कमतर दर की पेशकश की जा सके। जब दरें ऊपर जातीं तो पीएलआर ऊपर जाती और आपकी ब्याज दर भी। जबकि देखने में ऐसा लगता कि दरें पीएलआर से कम हैं। इसके अलावा भेदभाव भी जाहिर था। नए ग्राहकों को कम दर की पेशकश की जाती। आरबीआई की नाक के नीचे यह सब चलता रहा।
 
इस लूट को रोकने के लिए आरबीआई ने एक बार फिर आधा-अधूरा प्रयास किया लेकिन इस काम में भी सात साल लग गए। यह जानने के बावजूद कि आंतरिक दरों यानी कि पीएलआर और बीपीएलआर के साथ छेड़छाड़ की जा रही है, आरबीआई ने कभी इन आंतरिक मानकों पर काम नहीं किया जबकि वे इस अनुचित व्यवस्था के मूल में थे। वर्ष 2010 में आरबीआई ने प्रमुख ग्राहकों के लिए आधार दर की व्यवस्था दी। बैंकों से कहा गया कि वे ऋण दरों को इससे कक न करें। हालांकि वित्तीय कंपनियों को अभी भी पीएलआर के इस्तेमाल की इजाजत थी। आंतरिक मानक दरों को लेकर किए गए प्रयोग के नतीजोंके बारे में आरबीआई की खुद की स्वीकारोक्ति कहती है, 'फंड की लागत तय करने के मामले में बैंकों को जो लचीलापन मुहैया कराया गया, उससे अस्पष्टता पैदा हुई। बैंक अक्सर कुछ ग्राहकों के लिए आधार दर बदलते रहे जबकि उन कर्जदारों की ऋण गुणवत्ता में कोई खास फर्क नहीं आया होता और आधार दर अपरिवर्तित रहती।'
 
रघुराम राजन ने अमेरिका में आर्थिक संकट की पूर्व चेतावनी दे दी थी। इसके पहले उन्होंने वहां के बैंकों की नियामकीय स्थिति का अच्छी तरह अध्ययन किया था। उनको पता था कि 2008 के संकट ने यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में वित्तीय नियमन को उपभोक्ताओं के अनुकूल बनाया। परंतु भारत में ऐसा नहीं हुआ। आधार दर के छह वर्ष बाद राजन के कार्यकाल में आरबीआई ने फंड आधारित ऋण की मार्जिनल लागत (एमसीएलआर) की व्यवस्था लागू की। विचार यह था कि ब्याज दरों का कर्जदारों तक पारेषण सहज होगा क्योंकि जमा की मार्जिनल लागत आरबीआई की रीपो दर के मुताबिक ऊपर नीचे होगी। यह बात पूरी तरह अकादमिक थी। एमसीएलआर भी आंतरिक दर है जिसे बैंक अपनी मर्जी से बदल सकते हैं।
 
आखिरकार 5 दिसंबर के कदम के बाद मानक बाहरी तो हुआ लेकिन इसमें 20 वर्ष का वक्त लग गया। कल्पना कीजिए कि म्युचुअल फंड 20 वर्ष तक अपना प्रदर्शन आंतरिक मानक के आधार पर बताते रहे जिसका किसी ने अंकेक्षण नहीं किया। एक और बात, सन 2010 के आधार दर सर्कुलर ने कहा था 'बैंकों को ऐसे किसी बदलाव के लिए शुल्क नहीं लेना चाहिए।' राजन की एमसीएलआर के समय में यह संरक्षण भी हटा लिया गया और खुली लूट की व्यवस्था बन गई। बैंकों और वित्तीय कंपनियों को यह अधिकार दिया गया कि वे ग्राहकों के साथ आपसी सहमति वाली दर वसूल करें। यह ग्राहकों का अधिकार होना चाहिए था लेकिन वे इस स्थिति में नहीं थे कि कर्जदाता के सामने अपनी बात रख पाते। कई तो दरों में कटौती से इतने खुश थे कि उन्हें लगा ही नहीं कि वे लूट के शिकार हो रहे थे।
 
क्या दो दशक बाद अचानक आरबीआई का हृदय परिवर्तन हो गया? ऐसा नहीं है। वह मनीलाइफ फाउंडेशन द्वारा अक्टूबर में दायर एक जनहित याचिका पर जवाब दे रहा था जिसके बारे में जवाब देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने आरबीआई को छह सप्ताह का वक्त दिया था। याचिका में उस अन्याय का ब्योरा है जिसका जिक्र हमने ऊपर किया। उसमें अनुरोध किया गया कि अन्य बातों के अलावा अतिशय ब्याज दर के सवाल को भी हल किया जाए। आरबीआई को अभी इसका जवाब देना है लेकिन इस बीच उसने मांगों में से एक मानते हुए बाहरी मानक जरूरी कर दिया। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि हर बार नियामकों के उचित व्यवहार के लिए अदालत का सहारा क्यों लेना पड़ता है?
Keyword: RBI, bank, rate, loan, debt,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या गोयल का प्रस्ताव जेट के कर्जदारों को आएगा रास?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.