बिजनेस स्टैंडर्ड - एनबीएफसी में बैंकों जैसे नियम
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एनबीएफसी में बैंकों जैसे नियम

रघु मोहन / नई दिल्ली 12 09, 2018

... सख्त होंगे नियम

एनबीएफसी में संरचनात्मक तरलता का ब्योरा होगा सख्त
तरलता और एएलएम के मामले में एनबीएफसी बनेंगी बैंकों के अनुरूप
संसाधनों के लिए वाणिज्यिक प्रतिभूतियों को सीमित करने पर विचार
एनबीएफसी इक्विटी और मध्यम अवधि के बॉन्ड सेे जुटाएंगे ज्यादा धन
इन उपायों से बढ़ सकती है पूंजी की लागत

बिजनेस स्टैंडर्ड एनबीएफसी में बैंकों जैसे नियमभारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) की ओर से दाखिल किए जाने वाले संरचनात्मक तरलता के ब्योरे (एसएलएस) की समीक्षा करके इसे और सख्त बनाएगा। यह एनबीएफसी के लिए प्रस्तावित परिसंपत्ति देनदारी प्रबंधन (एसएलएम) मानकों का हिस्सा होगा। इससे एनबीएफसी तरलता के ब्योरे के मामले में बैंकों के बराबर आ जाएंगी।  देश में हजारों एनबीएफसी हैं और संभव है कि सभी नए ढांचे के तहत न आएं। लेकिन वे एनबीएफसी निश्चित रूप से इसके दायरे में आएंगी जिनकी परिसंपत्ति का आकार 500 करोड़ रुपये है। वाणिज्यिक पत्रों पर एनबीएफसी की निर्भरता सीमित करने पर भी काम चल रहा है। अगर ऐसा होता है तो इन कंपनियों को इक्विटी पूंजी पर ज्यादा जोर देना होगा और अपने संसाधनों में विविधता लानी होगी। इससे उनकी पूंजी जुटाने की लागत बढ़ जाएगी। 

वित्तीय उद्योग के एक सूत्र ने कहा कि बैंक हर पखवाड़े आरबीआई को समेकित रिपोर्ट भेजते हैं जबकि आंकड़े हर सप्ताह भेजे जाते हैं। बैंक घरेलू और विदेशी मुद्रा में जमा-निकासी की स्थिति के बारे में रिपोर्ट देते हैं जो उनके एसएलएस का हिस्सा होता है। ये रिपोर्ट दस समय श्रेणियों में भेजी जाती हैं। ये दैनिक, 2-7 दिन, 8-14 दिन, 15-28 दिन, 29 दिन, एक साल का तिमाही ब्योरा, 1-3 साल, 3-5 साल और पांच साल से अधिक हैं। यह व्यवस्था नवंबर 2012 में शुरू की गई थी। तब तक बैंक रोज घरेलू एसएलएस तैयार करते थे और हर पखवाड़े आरबीआई को रिपोर्ट भेजते थे।

एनबीएफसी के मामले में एसएलएस की व्यवस्था नहीं है। सभी एनबीएफसी के पास जमा की सुविधा नहीं है और यही वजह है कि उनकी रिपोर्टिंग की व्यवस्था बैंकों जैसी सख्त नहीं है। उनकी रिपोर्ट भेजने का समय भी अलग है। जिन एनबीएफसी में पैसा जमा कराने की सुविधा है, उनमें भी चालू और बचत खाते का प्रावधान नहीं है और बैंकों की तरह वे कॉल-मनी मार्केट या निपटान व्यवस्था का हिस्सा नहीं होते हैं। लेकिन आईएलऐंडएफएस प्रकरण ने इस क्षेत्र की खामियों को उजागर कर दिया है जिसके बाद इस पर सख्ती की जरूरत महसूस की जा रही है। 

एनबीएफसी के मामले में सितंबर 2008 में अल्पावधि गतिशील तरलता के ब्योरे को मासिक आधार पर देने तथा संरचनात्मक तरलता ब्योरे छमाही आधार पर दाखिल की व्यवस्था की गई थी। इसके तहत महीने की समाप्ति के दस दिन के अंदर और छमाही ब्योरा छह माह खत्म होने के 20 दिन के अंदर दाखिल करना होता था। आरबीआई ने एनबीएफसी को उस समय में मोहलत दी थी और कहा था कि नियम में बदलाव करते हुए सितंबर 2008 को समाप्त अवधि के लिए पहला रिटर्न जनवरी 2009 के पहले हफ्ते तक देने की अनुमति दी थी।

उद्योग के सूत्रों ने कहा कि इस समयसीमा को फिर से सख्त बनाया जा सकता है। नया प्रारूप आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य की टिप्पणी के अनुरूप है। आचार्य ने इस साल अक्टूबर के पहले हफ्ते में कहा था, 'मैं सभी वित्तीय फर्मों से अपील करना चाहता हूं कि वह दीर्घावधि की संपत्तियों के लंबी अवधि के वित्तपोषण के लिए इक्विटी और अन्य माध्यमों पर ज्यादा ध्यान दें न कि अल्पावधि में अत्यधिक मात्रा में प्रतिभूतियों पर इसके लिए निर्भर रहेें।' 

Keyword: NBFC, bank, micro finance, RBI,,
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