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एनबीएफसी क्षेत्र में आगे वृद्धि और मार्जिन पर रहेगा दबाव

बीएस संवाददाता /  December 09, 2018

बैंकिंग क्षेत्र में कई अड़चनों के चलते बीते 10 वर्षों के दौरान गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) और आवास वित्त कंपनियां (एचएफसी) विशेष ऋणदाता से बैंकों, विशेष रूप से सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी हासिल करने वाली कंपनियां बन गई हैं। हालांकि हाल में इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस) के अपना कर्ज चुकाने में चूक करने से एनबीएफसी और एचएफसी की उस सफलता की चमक धुंधली पड़ी है। दिग्गज विशेषज्ञों ने एनबीएफसी की आगे की राह के बारे में चर्चा की। 

 
एनबीएफसी जिस स्थिति का सामना कर रही हैं, उसे लेकर आपका क्या मानना है? 
 
गगन बंगा : निस्संदेह यह एक संकट है। किसी भी वित्त सेवा कंपनी को यह ध्यान में रखते हुए अपना कारोबार खड़ा करना चाहिए कि उसे हर 3 से 5 साल में किसी न किसी वजह से नकदी संकट से गुजरना पड़ेगा। यह इस उद्योग में पिछले 10 साल में चौथा संकट है और हर बार वजह अलग-अलग रही हैं। 
 
एस एस मुंदड़ा : बाजार में अतार्तिक तेजी या निराशा का माहौल बन सकता है। आज एनबीएफसी को लेकर यह डर अचानक किसी खुलासे से पैदा नहीं हुआ है। एनबीएफसी किस तरह काम कर रही हैं, उसके सभी मानदंड पहले से उपलब्ध थे। मेरा मानना है कि विश्लेषकों ने तब समस्या महूसस नहीं की। 
 
एनबीएफसी की सभी गतिविधियों को लेकर पर्याप्त वित्तीय आंकड़े उपलब्ध होने के बावजूद यह स्थिति कैसे पैदा हुई? 
 
रेणुका रामनाथ : मैं दो दशकों से निवेशक हूं। मेरा अनुभव है कि किसी भी कारोबार में आसानी से पैसा कमाने जैसी कोई चीज नहीं है। हाल के वर्षों में एनबीएफसी का दायरा बढ़ा है। ऐसे में बहुत से नए खिलाडिय़ों का मानना है कि इस क्षेत्र में आसानी से मोटा पैसा कमाया जा सकता है।
 
जसपाल बिंद्रा : हर एनबीएफसी का अपना कारोबारी मॉडल और ऋण देने का मॉडल है। लोग इन दोनों में अंतर को लेकर भ्रमित हैं। हो सकता है कि आपका कारोबारी मॉडल अच्छा हो, लेकिन ऋण मॉडल में दूरदर्शिता का अभाव हो। कोई भी वित्त कंपनी अपने वित्त पोषण के लिए पर्याप्त लाभ नहीं अर्जित कर सकती। उसे हमेशा कर्ज लेने की जरूरत पड़ती है, इसलिए यह मसला वित्तीय मॉडल के प्रबंधन का है। 
 
अब तक एनबीएफसी ने जो भूमिका निभायी है, क्या वे उसे आगे भी बरकरार रख पाएंगी? 
 
बंगा : न सभी बैंक और न सभी एनबीएफसी एकसमान हैं। आपको उनमें अंतर करना पड़ेगा। ऐसे कुछ बैंक या एनबीएफसी हो सकती हैं, जो नियमों के अनुसार नहीं चल रही हैं। लेकिन ज्यादातर उत्पादक कार्य कर रही हैं। 
 
रामनाथ : मैं अब भी एनबीएफसी को एक बड़े मौके के रूप में देखता हूं। देश को इनकी बहुत जरूरत है। अगर हमें 10 से 12 साल में 6 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना है तो इसका मतलब है कि हमें 4 लाख करोड़ डॉलर ऋण वृद्धि हासिल करनी होगी। यह ऋण सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक नहीं बल्कि निजी क्षेत्र के बैंकों को देना होगा। 
 
इस समय इस क्षेत्र पर दबाव है, लेकिन अल्पावधि डेट बाजार में कुछ सुधार आया है। आगे क्या स्थिति रहेगी? 
 
बिंद्रा : मुझे नहीं लगता कि हमें सभी एनबीएफसी को एक ही नजरिये से देखना चाहिए, लेकिन ऐसे हालातों में प्रत्येक को दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा, लेकिन इसका स्तर अलग-अलग होगा। यह मानना ठीक है कि जब कोई क्षेत्र मुश्किल दौर से गुजरता है तो इस क्षेत्र से जुड़ी सभी कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ता है। हम ऐसा इस्पात क्षेत्र में देख चुके हैं क्योंकि इस्पात को सुस्त कीमतों के लंबे दौर से गुजरना पड़ा। अब हम ऐसा बिजली और सोना एवं आभूषण क्षेत्र में देख रहे हैं। 
 
मुंदड़ा : इसके कुछ सकारात्मक नतीजे सामने आएंगे। इससे कुछ एकीकरण हो सकते हैं और कुछ एनबीएफसी खत्म हो सकती हैं। नियमन के स्तर पर भी आगे कुछ बदलाव देखने को मिल सकते हैं। इनमें संपत्ति-देनदारी प्रबंधन, नकदी और कुछ प्रवेश प्रतिबंध शामिल हैं। उद्योग को लघु अवधि में वृद्धि और मार्जिन दबाव के लिए तैयार करना होगा। 
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