बिजनेस स्टैंडर्ड - दिवालिया संहिता से वसूली में उल्लेखनीय सुधार
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दिवालिया संहिता से वसूली में उल्लेखनीय सुधार

बीएस संवाददाता /  12 09, 2018

देश के प्रमुख बैंकों के मुख्य कार्यधिकारियों ने गुरुवार को बिज़नेस स्टैंडर्ड वार्षिक बैंकिंग फोरम, 2018 में कहा कि ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का एक दिन की चूक का नियम बैंकिंग उद्योग के लिए क्रांतिकारी रहा है और कॉर्पोरेट ऋण श्रेणी में वसूली दोगुनी हो गई है। अलबत्ता उन्होंने साथ ही आगाह किया कि खुदरा श्रेणी में दबाव बढ़ सकता है। 

 
गैर निष्पादित परिसंपत्तियों पर राजकिरण राय जी: रूझान साफ है कि सकल एनपीए में कमी आ रही है और चूके के मामले भी घट रहे हैं। पूरी व्यवस्था में एनपीए की स्वीकार्यता का हिस्सा अब खत्म हो रहा है। अब हमारे सामने प्रावधान वाला हिस्सा है। 
 
चंद्र शेखर घोष: हमने इस बात को महसूस है कि ऋण का आकार जितना कम होगा, भुगताान की दर उतनी ही बेहतर होगी। भुगतान दरों में सुधार आया है जिससे नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का प्रभाव खत्म हो गया है। लेकिन कुछ ग्राहक नियमित रूप से भुगतान नहीं कर रहे हैं। हम उन्हें नियमित करने की कोशिश कर रहे हैं। 
 
प्रमीत झावेरी: वैश्विक ऋण संकट के दस साल बाद भी यह कहना मुश्किल है कि दुनिया भर में बैंकिंग व्यवस्था पूरी तरह इससे उबर चुकी है। भारत में राष्टï्रीय कंपनी कानून पंचाट (एनसीएलटी) के गठन, आईबीसी व्यवस्था और दूसरे नए नियमों से कर्जदारों के व्यवहार में बदलाव आया है।  रोमेश सोबती: परिसंपित्तयों और कमाई चक्र के नुकसान के बारे में मुझे लगता है कि हम मंजिल के बेहद करीब हैं। संभव है कि 80 फीसदी स्वीकार्यता हो चुकी है। अब ऋण प्रावधान का चक्र पीछे चल रहा है।  रजनीश कुमार: जहां तक एनपीए चक्र का सवाल है तो मार्च 2018 में यह चरम पर था और उसके बाद इसमें गिरावट आ रही है। हमारे बैंक की बैलेंस शीट अब पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है। 
 
खुदरा और सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उपक्रमों (एमएसएमई) के बारे में 
 
सोबती: खुदरा क्षेत्र में दस साल पहले नकारात्मक धारणा की स्थिति बनी थी। मेरा 45 साल का अनुभव बताता है कि इसका अपना एक चक्र है। शायद रेटिंग एजेंसियों की भूमिका को बढ़ाचढ़ाकर पेश किया गया है लेकिन लोगों को अनुशासित रखने में उन्होंने भूमिका निभाई है। 
 
कुमार: जहां तक कार या आवास ऋण का संबंध है तो दोनों में ज्यादा संख्या में ऋण को प्रोसेस करने के लिए विशेषज्ञता और क्षमता की जरूरत होती है। खुदरा और परियोजना या बड़े कॉर्पोरेट ऋण में में हर बैंक की क्षमताएं अलग-अलग होती हैं। किसी भी बैंक के लिए पोर्टफोलियो का पुनर्संतुलन समय का तकाजा है।
 
राय: एमएसएमई में दबाव है लेकिन बैंकिंग प्रणाली में जोखिम प्रबंधन की गुणवत्ता में भी सुधार हो रहा है। यहां जीएसटी जबरदस्त भूमिका अदा कर रहा है क्योंकि पहले एमएसएमई आकलन पूर्वानुमान पर आधारित होता था, नकदी प्रवाह पर नहीं। अब जीएसटी से ज्यादा आंकड़े मिल रहे हैं और एमएसएमई नया खुदरा होगा। 
 
घोष: एमएसएमई श्रेणी में फायदा उठाने के लिए बैंक के कर्मचारियों की दक्षता की सबसे अधिक भूमिका है। आपको ग्राहकों तक पहुंचने की जरूरत है। नोटबंदी और जीएसटी के बावजूद, जब हम नरमी के साथ ग्राहकों से संपर्क करते हैं तो वे पैसा लौटाते हैं। मानवीय संवेदना बहुत जरूरी है। 
 
आईबीसी और परिसंपत्तियों की वसूली 
 
कुमार: पहले बैंकिंग व्यवस्था की सोच पुनर्वास की थी लेकिन अब हम ऐसा नहीं कर रहे हैं। आज अगर आपका खाता एनपीए है तो या तो आप मुझे भुगतान करेंगे या मैं इसे परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनियों (एआरसी) को बेच दूंगा या इसे एनसीएलटी में ले जाऊंगा। पुनर्वास, पुनगर्ठन, आज के माहौल में संभव नहीं है।
 
सोबती: यद्यपि आईबीसी सोच विचार के साथ बनाया गया कानून है लेकिन कुछ चूककर्ता अब भी इसकी परीक्षा ले रहे हैं। यह ऐसी स्थिति है कि अगर मैं यह हार गया तो मैं उच्चतम न्यायालय जाऊंगा। यह स्थिति अगले छह से दस महीने में खत्म हो जाएगी। उच्चतम न्यायालय के एकाध फैसलों से ही कर्जदारों के व्यवहार में भारी बदलाव देखने को मिलेगा। पहली दो तिमाही के वसूली के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। 
 
राय: पहले छह महीने की वसूली पिछले पूरे साल की वसूली के बराबर है। इसका मतलब यह है कि इस साल हमारी वसूली दोगुना रहेगी। संभव है कि साल पूरा होते-होते वसूली चूक से बेहतर हो जाए। बैंक उद्योग के लिए यह सबसे अच्छा संकेत होगा कि उसका बुरा दौर बीत चुका है। दिवालिया कानून के कारण नहीं बल्कि उसके खौफ के चलते कंपनियों में सद्बुद्घि आ रही है। 
 
जवेरी : एक समय के बाद हम एक ऐसी व्यवस्था की तरफ चलना शुरू कर देंगे जो कारगर हो। आर्थिक चक्र ने भी वसूली में भूमिका निभाई है। अगर आप इस्पात उद्योग को देेखें तो जितनी वसूली हुई है उसकी वजह आथ्रिक चक्र ही है और यह कई लोगों की उम्मीद से परे है। 
 
आईबीसी या एकमुश्त निपटान
 
कुमार: अब हमारी सोच कुछ नहीं से कुछ भला वाली है। जिस तरह की स्थितियां हैं, उससे अगर मुझे उम्मीद के मुताबिक ठीकठाक राशि मिल सकती है तो मुझे एकमुश्त निपटान से कोई समस्या नहीं है। रिजर्व बैंक द्वारा भेजे गए पहले 12 बड़े खातों में वसूली 50 फीसदी से अधिक होगी लेकिन दूसरी सूची में यह करीब 35 फीसदी रहेगी। 
 
आईबीसी में कैसे होगा सुधार
 
सोबती: आज यह बहुत करीबी बोली प्रक्रिया है। यह इसकी कमजोरी है। जब किसी की बोली जीतती है तो हारने वाला सीधी बोली लगाता है और फिर आप इसे उच्चतम न्यायालय में चुनौती देते हैं। हम सीधे नीलामी करके मामले को वहीं खत्म क्यों नहीं कर देते हैं। उन सभी के पास पैसे हैं लेकिन वे सोचते हैं कि बैंकों ने 50 फीसदी नुकसान झेल लिया है तो वे इससे बच जाएंगे। वे सस्ते में खरीदना चाहते हैं लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। 
 
कुमार: अगर हमने ऐसा (दोबारा बोली) होने दिया तो भविष्य में इसके अच्छे संकेत नहीं जाएंगे। 14 महीने से हम इस प्रक्रिया को चला रहे हैं और फिर कोई नया प्रस्ताव लेकर आ जाता है। इस देरी के कारण बैंकों को अपना पैसा गंवाना पड़ रहा है। 
 
वृद्घिशील एनपीए के बारे में
 
कुमार: एनपीए हमेशा रहेगा लेकिन हमें वही चीजें करनी चाहिए जो हमारे जोखिम ढांचे के दायरे में है। मुझे नहीं लगता है कि आज की स्थिति की पुनरावृत्ति होगी। मुझे नहीं लगता है कि हम उस तरह कर्ज देंगे जैसे हमने 2008 से 2010 के बीच दिया था। हमारे पास आईबीसी है, 12 फरवरी का आरबीआई का सर्कुलर (एक दिन चूक दिशानिर्देश) है जो आईबीसी से मजबूत है। 
 
घोष: नकद प्रवाह खोजने में सावधानी बरतने की जरूरत है। हमें अपने ग्राहकों को पहले इस कसौटी पर कसना चाहिए कि वे कर्ज लौटाने में सक्षम हैं या नहीं।
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