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आभूषण क्षेत्र के लिए धन जुटाना अब भी मुश्किल

पवन लाल / मुंबई December 09, 2018

रत्न एवं आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद (जीजेईपीसी) के पदाधिकारियों का मानना है कि सरकार और अधिकारी नकदी की तंगी से जूझ रहे उद्योग पर ध्यान दे रहे हैं। लेकिन उद्योग से जुड़े दूसरे लोगों का कहना है कि अगर तंगी की मौजूदा स्थिति बनी रही तो इसका असर देश के निर्यात पर पड़ेगा। नोटबंदी और जीएसटी से जूझ रहे उद्योग के लिए नीरव मोदी घोटाला किसी परेशानी से कम नहीं था। अब  आईएलऐंडएफएस के दिवालिया होने के बाद गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) की नकेल कसने से फंडिंग की स्थिति और गड़बड़ हो गई है। 
 
भारत डायमंड बोर्स के अध्यक्ष अनूप मेहता कहते हैं कि बैंकों ने उधार देना बंद कर दिया है और मौजूदा सीमाओं को भी कम कर दिया है। इससे हीरा उद्योग प्रभावित हो रहा है। पिछले साल मुंबई में कम से कम 4-5 और गुजरात में करीब 20 घटनाओं के साथ हीरा क्षेत्र में दिवालियापन के मामले सामने आए हैं। हीरा कंपनियों से जुड़े कारखाने लंबे समय से बंद रहे हैं जिन्हें दीवाली की छुट्टिïयों के बाद दो सप्ताह के लिए फिर से खोला गया। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी राजकिरण राय ने कहा कि मौजूदा ग्राहकों की वर्तमान उधारी चल रही है (लेकिन) कोई नया लेनदेन नहीं हो रहा है। उन्होंने कहा कि बैंक ने रत्न एवं आभूषण उद्योग के उधार लेने वालों के कागजात की जांच में इजाफा कर दिया है। बैंक उन देनदारों या ग्राहकों के संबंध में अधिक सावधानी बरत रहा है जो उससे उधार ले रहे हैं।
 
आभूषण उद्योग सोने पर मौजूदा 10 प्रतिशत शुल्क को छह प्रतिशत तक करने और हीरे पर शुल्क को 7.5 प्रतिशत से कम करके 2.5 प्रतिशत लाने के लिए सरकार से गुहार लगा रहा है। हाल ही में वाणिज्य और उद्योग मंत्री सुरेश प्रभु ने उद्योग के प्रतिनिधियों को प्रोत्साहित करने वाली बातें कही थीं लेकिन उद्योग का मनोबल कमजोर है। इसलिए कि जमीनी हकीकत यह है कि ताजा धन व्यय नहीं किया जा रहा है। कोलकाता के एक थोक आभूषण विक्रेता ने कहा कि सरकारी अधिकारी, बैंक या उद्योग की संस्थाएं भले ही कुछ कहें लेकिन कारोबार का वित्त पोषण रुक गया है।
 
विनिर्माता शांति गोल्ड के प्रबंध निदेशक पंकज जागावत कहते हैं कि दिक्कत यह है कि बैंकों को सोने और हीरा कंपनी में अंतर नहीं दिखता। ये दोनों अलग-अलग क्षेत्र हैं। सोने को अंतरराष्टï्रीय मानकों से सहायता मिलती है। इसकी जांच आसान होती है और मुद्रा के रूप में स्वीकृत किया जाता है जबकि हीरे को श्रेणीबद्ध करना ज्यादा कठिन होता है। कृत्रिम और प्राकृतिक हीरे में अंतर बताने के लिए प्रयोगशाला की जरूरत पड़ती है और इन्हें सामान्य हीरों में मिलना ज्यादा आसान होता है। मेहता कहते हैं कि अगर उद्योग को अगले छह से आठ महीनों में आसान वित्तीय सुविधा नहीं मिली तो और ज्यादा भागीदारों पर मंदी का प्रभाव पडऩे की आशंका बढ़ जाएगी। बैंकों को उधार की अपनी कार्यप्रणाली पर फिर से विचार करना चाहिए। वर्तमान में भारत करीब 40 अरब डॉलर मूल्य का रत्नाभूषण निर्यात करता है और देश के जीडीपी में इसका सात प्रतिशत योगदानरहता है। मेहता चेतावनी देते हैं कि अगर वित्त पोषण का मसला जारी रहता है तो निर्यात बाजार में मंदी आ सकती है।
 
बड़े भागीदारों के लिए हालात बेहतर हैं। इनका पहले नौ महीनों में दर्ज किया गया शुद्ध निर्यात पिछले साल के मुकाबले अधिक रहा है। राजेश एक्सपोट्र्स ने 17 प्रतिशत, टाइटन इंडस्ट्रीज ने 34.5 प्रतिशत और त्रिभुवनदास भीमजी जावेरी (टीबीजेड) ने 53 प्रतिशत इजाफा दिखाया है।
Keyword: GJEPC, gold,सराफा बाजार, आभूषण,
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