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जीत की गारंटी नहीं हैं राजनीतिक रेवडिय़ां

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  December 09, 2018

इससे पहले कि आप तेलंगाना और देश के सबसे तेज विकसित होते महानगर और उसकी राजधानी हैदराबाद की 'दीवारों पर लिखी इबारत' पढ़ें, आपको उस इबारत के रंग पर ध्यान देना चाहिए। मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर) और उनकी पार्टी टीआरएस ने पूरे प्रदेश को गुलाबी रंग में रंग दिया है। ऐसा लग रहा है मानो केवल एक ही पार्टी ये चुनाव लड़ रही हो। मैंने कभी किसी एक दल का दृश्य प्रचार पर ऐसा दबदबा नहीं देखा। गुजरात में भाजपा और कांग्रेस के बीच इसका अनुपात 20:1 का था। तेलंगाना में यह 90:1 है। मैंने जब अपनी खिड़की से देखा तो मुझे सात विशाल होर्डिंग दिखे जो केसीआर और टीआरएस के थे। सभी उनकी पार्टी के गुलाबी रंग में थे। अकेले राजधानी में ऐसे 700 होर्डिंग हैं। 

 
वह प्रतिद्वंद्वियों पर हमलावर होने में नहीं चूक रहे। वह कांग्रेसनीत प्रजाकुटमी पर भी हमलावर हैं और भाजपा पर भी। यह ऐसा दुर्लभ चुनाव है जिसमें सत्ताधारी दल पूरी तरह अपने पिछले प्रदर्शन के भरोसे मैदान में है। वे केवल दीवारें रंग रहे हैं जिन पर उनके अब तक के काम का ब्योरा है। इनमें उनकी कल्याणकारी योजनाओं और निशुल्क दी जाने वाली चीजों का बखान है। परंतु क्या उनकी योजनाएं लागू की जा सकती हैं? कहीं घाटा बेकाबू तो नहीं हो रहा? ऐसे सवालों को बकवास करार देते हुए वह कहते हैं कैसा घाटा? प्रोफेसर केसीआर अर्थशास्त्र पर ज्ञान देते हुए कहते हैं, 'दुनिया में किस देश का घाटा सबसे अधिक है, अमेरिका का? उसके बाद जापान और फिर चीन का क्या? लोगों को कुछ पता नहीं होता। बस बातें करते हैं।' तमिलनाडु ने रेवडिय़ा बांटने की राजनीति शुरू की, खासतौर पर जयललिता ने। केसीआर उसे अलग स्तर पर ले गए। ये चुनाव बताएंगे कि तरीका कारगर साबित हुआ या नहीं।
 
पाठक जानते हैं कि उपहारों की राजनीति को लेकर मेरे मन में तमाम शंकाएं हैं। राजस्थान में वर्ष 2008-13 के दौरान कांग्रेस की सरकार को बाड़मेर के केयर्न तेल क्षेत्र के कारण कच्चे तेल की भारी रॉयल्टी मिली। वह चुनाव निशुल्क उपहारों की प्रयोगशाला बना और मतदाताओं ने सोनिया गांधी और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की कल्पनाओं को विराम देते हुए अशोक गहलोत की कांग्रेस सरकार को 200 सदस्यों वाली विधानसभा में 163-21 से परास्त कर दिया।  जयललिता जब तमिलनाडु में दोबारा चुनाव जीतने में कामयाब रहीं तो गरीबोन्मुखी राजनीति का बहुत जश्न मनाया गया। इसका श्रेय उनकी उन नीतियों को दिया गया जिसके तहत वे मंगलसूत्र, मिक्सर ग्राइंडर जैसी तमाम चीजें बांट रही थीं। परंतु हकीकत यह थी कि 13 प्रतिशत वोट उनसे दूर हुए थे और अगर विपक्ष के वोट बंटे नहीं होते तो वे यकीनन हार जातीं।
 
लब्बोलुआब यह कि अभी तक ये साबित नहीं हुआ है कि ये रेवडिय़ां निश्चित तौर पर वोट दिलाती हैं। परंतु ये बातें केसीआर से मत कहिए। उन्हें दो ही चीजों पर गर्व है: अमल का रिकॉर्ड व उनकी कल्पनाशीलता। तेलंगाना के अलग-अलग इलाकों से गुजरते हुए आप उनकी बात का वजन समझ पाएंगे। युवतियों को उनके विवाह पर एक लाख रुपये उपहार स्वरूप दिए जा रहे हैं। मुस्लिम युवतियों के लिए इस योजना को 'शादी मुबारक' का नाम दिया गया है जबकि बाकी के लिए 'कल्याण लक्ष्मी।' उन्होंने गरीबों के लिए दो शयनकक्ष वाले आवास बनाने की योजना भी पेश की है जिसे 2बीएचके योजना का नाम दिया गया है।
 
अपने पहले कार्यकाल में वे ऐसे 5 लाख मकान बनवा रहे हैं और तेलंगाना में इस योजना का प्रभाव महसूस किया जा सकता है। उनके निर्वाचन क्षेत्र गजवेल में ये आवास दिखते हैं। वह कहते हैं, 'मोदी एक कमरे का मकान दे रहे हैं, उनमें महिलाएं कपड़े कहां बदलेंगी?' क्या वे 7.50 लाख रुपये वाले इन 2बीएचके आवास का खर्च उठा पाएंगे? इसका जवाब कई नवाचारों में छिपा है। वे सरकारी जमीन दे रहे हैं, सीमेंट को करमुक्त कर रहे हैं, बालू निशुल्क दे रहे हैं, ताप बिजली घरों की राख से बनी सब्सिडी वाली ईंट इस्तेमाल में ला रहे हैं, प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए मिलने वाली 1.50 लाख रुपये की राशि का इस्तेमाल 7.50 लाख रुपये की लागत में कर रहे हैं। ये बेहतर सुविधाओं वाले मकान हैं। 
 
इनके अलावा भी तमाम अच्छी-बुरी और दिलचस्प योजनाएं हैं। उन्होंने निशुल्क बढिय़ा सरकारी अस्पताल बनवाए।  गर्भवती स्त्रियों के लिए निशुल्क एंबुलेंस योजना शुरू की। अस्पताल से घर आने वाली प्रसूता और उसकी संतानों को सूटकेस दिया जाता है जिसमें कपड़े, प्रसाधन सामग्री तथा खिलौने होते हैं। इसे केसीआर किट कहा जाता है। इस पर उनका बड़ा सा चित्र होता है। करीमनगर के अस्पताल में हमें ये तीनों देखने को मिले। हमने माताओं और परिवारों से बात भी की। वे सभी बहुत कृतज्ञ दिखे।
 
एक योजना ऐसी भी है जिसका खुले दिमाग से परीक्षण करने की आवश्यकता है। यह योजना है रैयत बंधु यानी कृषक मित्र। कृषि संकट राष्ट्रीय समस्या है। कच्चे माल में सब्सिडी से लेकर न्यूनतम समर्थन मूल्य तक इससे निपटने की तमाम कोशिशें नाकाम रही हैं। तेलंगाना किसानों को प्रति वर्ष प्रति फसल 4000 रुपये एकड़ की राशि दे रहा है, भले ही उनकी जोत का रकबा कुछ भी हो। यानी हर वर्ष 8000 रुपये एकड़। पिछले साल इस योजना पर 12,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इसकी काफी आलोचना हुई क्योंकि अमीर और सैकड़ों एकड़ के किसान भी इस योजना का लाभ ले रहे हैं। 
 
आंकड़े अलग ही कहानी कहते हैं। 58.30 लाख लाभार्थियों में से (3.5 करोड़ की आबादी में यह तादाद बहुत अधिक है) केवल 14,900 ही 50 एकड़ या अधिक के काश्तकार थे। कुल लाभार्थियों में से केवल 1.15 लाख या 2 फीसदी से भी कम 10 एकड़ से अधिक जमीन रखते हैं। यानी यह योजना काफी आकर्षक है। केसीआर के अर्थशास्त्र में सबके लिए कुछ न कुछ है। चरवाहा जातियों के लिए 20 भेड़ और एक मेढ़ा। धोबी समुदाय के लिए औद्योगिक वॉशिंग मशीन। मछलियों के लिए मछलियों के बीज आदि। जातीय एकता के लिए काम करने वाले विद्वान कांचा इलैया का मानना है कि इससे भविष्य की पीढिय़ां जाति आधारित पेशों की ओर बढ़ेंगी। ये सब वोट जुटाने की तरकीब हैं और रेवडिय़ां सबको पसंद आती हैं।
 
सवाल यह है कि क्या लोग इनके बदले वोट देते हैं? इस बारे में रुझान मिलेजुले हैं लेकिन मोटे तौर इन्हें नकारात्मक माना जा सकता है। हमने देखा कि कैसे 2013 में राजस्थान को भारी हार का सामना करना पड़ा था। तमिलनाडु तो रेवड़ी राजनीति का गढ़ है लेकिन वहां भी सत्ताधारी दल क्रम से बदलते रहे हैं। पंजाब में अकाली-भाजपा सरकार निशुल्क बिजली और आटा-दाल योजना के बावजूद नहीं चली। गुजरात, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल आदि में मुख्यमंत्री तो एक से अधिक बार जीते लेकिन वहां ऐसे निशुल्क उपहारों का चलन नहीं है। कर्नाटक में सिद्धारमैया के नेतृत्व में कांग्रेस ने जयललिता की शैली में पैसे उड़ाए लेकिन वह भाजपा को नहीं हरा पाए। छत्तीसगढ़ में जरूरी निशुल्क चावल वितरण के चलते मुख्यमंत्री रमन सिंह को चावल वाले बाबा का नाम मिला और उन्हें दो बार चुनाव जीतने में भी मदद मिली। अब उनके प्रतिद्वंद्वियों ने उनसे भी अधिक बढ़चढ़ कर दावे किए।
 
मतदाता को पता है कि एक बार मिला उपहार वापस नहीं होता। याद कीजिए कैसे मोदी 2014 में मनरेगा की आलोचना करते थे लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्होंने उस योजना में काफी पैसा खर्च किया। तेलंगाना में भाजपा मुफ्त में गाय देने की पेशकश कर रही है। परंतु अब मामला निशुल्क उपहारों से कहीं आगे निकल चुका है। पहचान, अंतरराज्यीय प्रतिद्वंद्विता, धर्म, राष्ट्रवाद और राज्यों के चुनाव में उपराष्ट्रवाद तक।  एक नुक्कड़ पर केसीआर के बेटे और हैदराबाद के परेड मैदान में उनके पिता की सभा में एक बात साझा है। दोनों नेता 'जय' की पुकार लगाते हैं और जनता जोर से तेलंगाना कहती है। अब प्रजाकुटमी के मंच से यह नारा नहीं दोहराया जा सकता क्योंकि वहां आंध्र प्रदेश के चंद्रबाबू नायडू साझेदार हैं। शायद केवल निशुल्क उपहारों के दम पर केसीआर सत्ता में वापसी न कर पाएं, तेलंगाना गौरव का जुड़ाव संभावनाओं में इजाफा अवश्य करता है।
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