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संतुलनकारी कदम

संपादकीय /  December 09, 2018

राजकोषीय मोर्चे पर आई एक बुरी खबर के मुताबिक इस वर्ष अप्रैल से अक्टूबर महीनों के बाद सरकारी व्यय राजस्व से अधिक रहा।  दूसरे शब्दों में कहें तो वित्त वर्ष 2018-19 की पहली छमाही में ही हम पूरे वर्ष के लिए तय राजकोषीय घाटे की सीमा पार कर गए। चालू वित्त वर्ष के दौरान राजकोषीय घाटे के लिए जीडीपी के 3.3 फीसदी का स्तर तय किया गया है। यह लक्ष्य खुद अतीत के राजकोषीय समेकन के लक्ष्य से विचलन दर्शाता है।  हालांकि सरकार का सोचना इससे अलग है और इस बात की प्रबल आशंका है कि सरकार इस लक्ष्य से चूक सकती है। यह चुनावी वर्ष है और कई सरकारों ने दोबारा निर्वाचित होने की कोशिश में अपना खजाना खोल दिया है। धीमी वृद्धि दर, व्यय में ठहराव, अनिश्चित राजस्व और लोकलुभावन दबाव आदि कारकों के चलते राजकोषीय घाटे का लक्ष्य हासिल होना और भी मुश्किल होता जा रहा है।

 
अच्छी बात यह है कि मुद्रास्फीति की स्थिति इस विपरीत राजकोषीय हालात में भी ठीक बनी हुई है। वह आरबीआई द्वारा तय 4 फीसदी के लक्ष्य से बराबर नीचे बनी हुई है। अक्टूबर में वह 3.3 फीसदी के स्तर पर थी। इससे अर्थव्यवस्था के कई पहसू सामने आते हैं। इसमें कमजोर कृषि कीमतें भी शामिल हैं। बीते तीन महीनों के दौरान वैश्विक तेल कीमतें 30 फीसदी तक गिरी हैं। इससे आरबीआई की मौजूदा नीतिगत दर में एक अंतराल उत्पन्न हुआ है। अब यह सवाल है कि आरबीआई कब तक कड़ाई का रुख बरकरार रखता है? जीडीपी के हालिया आंकड़े बताते हैं कि निजी क्षेत्र का निवेश लंबी अवधि के बाद फिर से बहाल होता दिख रहा है। परंतु मुद्रास्फीति के स्तर को देखते हुए वास्तविक ब्याज दर ऊंची बनी हुई है। 
 
ऐसे में वृद्धि दर के गति पकडऩे की संभावना नहीं नजर आती। इस बीच आरबीआई के सतर्कता बरतने की कई वजह हैं। उदाहरण के लिए यह स्पष्ट नहीं है कि तेल कीमतें अगले वर्ष कैसी रहेंगी। पेट्रोल निर्यातक देशों का समूह और रूस समेत गैर ओपेक देशों ने गत सप्ताह वियना में बैठक की और वे आगामी वर्ष में उत्पादन में कमी करने के लिए राजी हो गए हैं। कहा जा सकता है कि तेल कीमतों में एक बार फिर तेजी आएगी। अभी यह भी निश्चित नहीं है कि अमेरिका ने ईरान के तेल के मामले में चीन, भारत और जापान को जो रियायत दी है, वह भविष्य में की जाने वाली समीक्षा के बाद भी जारी रहेगी।
 
यानी सरकार के सामने की राह अस्पष्ट है। एक ओर राजकोषीय कठिनाइयां, लोकलुभावन दबाव और खर्च बढ़ाने की बात है तो दूसरी ओर वास्तविक अर्थव्यवस्था में व्याप्त तनाव है। आगे चलकर अनुकूल आधार प्रभाव समाप्त हो सकता है जो वर्ष की पहली छमाही में बरकरार था। अगर ऐसा होता है तो यह अनुमान लगाना काफी कठिन हो जाएगा कि पूरे वर्ष के दौरान देश की आर्थिक वृद्धि दर 7 फीसदी से कितनी अधिक होगी। होगी भी या नहीं। किसानों की आय बढ़ाने की कवायद चुनावी लाभ तो दिला सकती है और किसानों की निराशा कम कर सकती है लेकिन इसकी कीमत एक बार फिर बढ़ी हुई खाद्य मुद्रास्फीति के रूप में चुकानी होगी। वह पुन: ढांचागत समस्या में तब्दील हो जाएगी। ऐसे में सरकार के लिए बेहतर यही होगा कि वह राजकोषीय स्थिति को लेकर अपना रुख लचीला रखे और यह सुनिश्चित करने का प्रयास करे कि गैर कर राजस्व पर्याप्त हो। इसके बीच ही उसे अर्थव्यवस्था को और अधिक जीवंत बनाने के प्रयास भी करने चाहिए। ये प्रयास ऐसे होने चाहिए कि भारी भरकम खर्च पर निर्भरता न हो। 
Keyword: fiscal deficit, ICRA, GDP, राजकोषीय घाटा,
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