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धीमी वृद्धि के बावजूद निवेश में तेजी से आस

नीलकंठ मिश्र /  December 07, 2018

जीडीपी वृद्धि में थोड़ी सुस्ती दिखने के बावजूद निवेश में आ रही तेजी इसे एक संतुलित नजरिया दे रही है। आर्थिक परिदृश्य का विश्लेषण कर रहे हैं नीलकंठ मिश्र

 
अर्थव्यवस्था में अधिकतर पूर्वानुमानों के उलट थोड़ी 'सुस्ती' दिख रही है। गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों (एनबीएफसी) के लिए फंडिंग रुकने से आर्थिक गतिविधियों पर असर पडऩे के पहले से ही ऐसा होने लगा है। अधिकतर लोगों का मानना था कि यह वित्त वर्ष पिछले साल का ही प्रतिरूप होगा जिसमें पहली छमाही बेहद कमजोर रही थी। वर्ष 2017-18 की पहली छमाही में नोटबंदी एवं जीएसटी के  प्रभावों से आर्थिक वृद्धि छह फीसदी पर आ गई थी लेकिन दूसरी छमाही में वृद्धि के 7.4 फीसदी पहुंचने से हालात काफी हद तक सामान्य हो गए थे। लिहाजा, अर्थशास्त्रियों ने 'आधार प्रभाव' की वजह से वर्ष 2018-19 में पहली छमाही के दमदार प्रदर्शन एवं दूसरी छमाही के अपेक्षाकृत कमजोर रहने का अनुमान जताया था।
 
ऐसे पूर्वानुमानों के पीछे यह संकल्पना है कि अर्थव्यवस्था में एक अंतर्निहित तेजी है और अगर पिछले साल की समान अवधि में कोई अकेली मुश्किल रही होती तो आंकड़े अलग हो सकते थे। दो वर्षों की औसत वृद्धि की गणना करने से हम आर्थिक गतिरोध से परे देख पाते हैं और अंतर्निहित तीव्रता को भी आंक सकते हैं। पिछली पांच तिमाहियों में यह 6.8 फीसदी से लेकर 7 फीसदी के बीच रही है, जून तिमाही में दर्ज 8.2 फीसदी की वृद्धि भी पिछले साल की समान अवधि की 5.6 फीसदी की वृद्धि के आधार प्रभाव का नतीजा रही है। सितंबर तिमाही के लिए 7.1 फीसदी की वृद्धि न केवल अनुमानों से कम रही है बल्कि इसने दो वर्षों की वृद्धि को भी गिराकर 6.7 फीसदी पर ला दिया है। दूसरी छमाही का मजबूत आधार होने से वृद्धि के मुख्य आंकड़े चिंताजनक स्तर तक जा सकते हैं। 
 
साफ कहें तो जीडीपी के तिमाही आंकड़ों की कुछ खास विश्लेषणात्मक उपयोगिता नहीं होती है। अर्थव्यवस्था में अधिक अनौपचारिकता होने से वार्षिक जीडीपी आंकड़ों के मामले में भी केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) को अनुमान लगाना पड़ता है। तिमाही आंकड़ों के संदर्भ में तो समुचित आंकड़े मिल पाना और भी मुश्किल है। लेकिन ऋण प्रावधान में समस्याएं जारी रहने से वृद्धि का पहले से ही कमजोर होना चिंता का विषय है। अगले साल आर्थिक वृद्धि के 7.5-8.0 फीसदी रहने का अनुमान काफी क्षीण लग रहा है क्योंकि इसके लिए वृद्धि में एक फीसदी बढ़ोतरी की जरूरत पड़ेगी। गत तीन वर्षों में ऋण आवंटन में 30 फीसदी हिस्सा रखने वाली एनबीएफसी कंपनियों में से कई की बैलेंस शीट छोटी हो रही है और उन्हें तरलता  के लिए अपनी बेहतर संपत्तियां बैंकों को बेचनी पड़ रही हैं। इसकी पीड़ा उनसे कर्ज लेने वालों को झेलनी पड़ रही है। कई वितरकों, डीलरों और छोटी एवं मझोली इकाइयों को कार्यशील पूंजी जुटाने में मुश्किल आ रही है। इस स्थिति के जारी रहने तक यह आर्थिक वृद्धि को चोट पहुंचाती रहेगी।
 
यह ब्याज दरों के परिदृश्य को भी प्रभावित कर सकती है क्योंकि वृद्धि मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के अनुमानों से नीचे जाती दिख रही है। एमपीसी मुद्रास्फीति को तय दायरे में रखना चाहती है और कमजोर वृद्धि होने से मुद्रास्फीति-जनक दबाव बढ़ जाएंगे। खाद्य मुद्रास्फीति के नीचे रहने और पेट्रोल एवं डीजल के दामों में गिरावट आने से मुद्रास्फीति में 0.3 फीसदी तक की कमी आ सकती है और ऐसा होने पर ब्याज दरों में कटौती की चर्चा दोबारा शुरू हो जाएगी। लेकिन जीडीपी के घटकों में एक विलक्षण निहितार्थ भी है। सुस्ती मुख्य रूप से उपभोग में आई है जबकि निवेश लगातार तीसरी तिमाही में दोहरे अंक में बढ़ा है। पूरी तिमाही में कंपनी जगत का रुख सकारात्मक होने के बावजूद निजी उपभोग में कमजोरी रही और कंपनियों के तिमाही नतीजे उम्म्ीद से कम होते हुए भी वृद्धि एक साल पहले की समान अवधि के मुकाबले मजबूत ही रही। लिहाजा, जीडीपी के ताजा आंकड़े बताते हैं कि कुल उपभोग उतना मजबूत नहीं हो सकता है जितना बड़ी कंपनियों की बिक्री में दिखा है। वैसे सोचने वाली बात है कि आर्थिक सुस्ती जताने वाले आंकड़े सीएसओ को किस तरह मिले? अनौपचारिक क्षेत्र के चलते ऐसा होने की संकल्पना के बारे में भी सटीक आंकड़े नहीं हैं। जीएसटी से अर्थव्यवस्था को औपचारिक स्वरूप देने में आई तेजी के अलावा यह भी संभव है कि कमजोर खाद्य कीमतें धनी से गरीब को होने वाली आय हस्तांतरण को धीमा कर सकती हैं।  
 
उपभोग में सुस्ती आना एक तरह से जरूरी था। जून और अगस्त के बीच अर्थव्यवस्था में भुगतान संतुलन का बड़ा घाटा देखा गया था। अब कच्चे तेल की कीमतों में कमी आने से यह घाटा लगभग शून्य पर आ चुका है और तेल कीमतों के मौजूदा स्तर पर रहने पर और गिरावट की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। असल में, पहली छमाही की तुलना में अर्थव्यवस्था में करीब 1.1 लाख करोड़ रुपये बचेंगे जो घरों, ट्रांसपोर्टरों और उद्योग के पास जाएंगे। हालांकि सितंबर तिमाही के बाद से ही ऐसे संकेत दिख रहे हैं कि उपभोग की रफ्तार कमजोर हुई है जिसके चलते जीडीपी के आगे के आंकड़े और कम रह सकते हैं। कार जैसे महंगे गैर-जरूरी उत्पादों से यह दौर शुरू हुआ था लेकिन अब यह अन्य उत्पाद समूहों को भी अपनी गिरफ्त में लेने लगा है। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने से बढ़े हुए वेतन एवं पेंशन के तौर पर 4.5 लाख करोड़ रुपये बढ़ गए थे लेकिन अब उसका असर कम होने लगा है। महाराष्ट्र वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने वाला संभवत: अंतिम राज्य है। वह जनवरी 2019 से ये सिफारिशें लागू करने जा रहा है।
 
जीडीपी के अनुपात में निवेश में लगातार बढ़ोतरी होना इकलौता उत्साहजनक पहलू है। इस निवेश का गैर-आनुपातिक हिस्सा केंद्र एवं राज्यों के पास जा रहा है। राज्य सरकारों का बजट से अधिक व्यय करना शायद नजर में नहीं आया है और ऐसा होने पर निवेशकों  एवं अर्थशास्त्रियों के बीच एक तरह का अविश्वास देखा जा रहा है। इसकी वजह यह है कि निवेश चक्र में तेजी के पिछले दौर की तरह का जोशीला माहौल इस बार नदारद है। राज्य सरकारें शहरी परिवहन जैसे सघन आपूर्ति अवरोधक क्षेत्रों में व्यय कर रही हैं। पांच वर्षों से सात फीसदी की वृद्धि होने से मांग 40 फीसदी बढ़ी है और कई क्षेत्रों की क्षमता पर दबाव दिखने लगा है। हवाईअड्डा, दूरसंचार एवं इस्पात क्षेत्रों में भारत एक बार फिर शुद्ध आयातक बन चुका है। व्यस्त समय में बिजली की मांग तेजी से बढऩे से जल्द ही बिजली उत्पादन में निवेश जरूरी हो जाएगा।
 
कारोबारी चक्र में बदलाव शुरू होने के लिहाज से ये शुरुआती दिन हैं लेकिन ऐसा लगता है कि ऋणशोधन एवं दिवालिया संहिता ने कारोबारी समूहों को कर्ज लेकर विस्तार करने की रणनीति से परहेज करने को मजबूर कर दिया है और आक्रामक निवेश केवल बाजार हिस्सेदारी बनाए रखने तक ही सीमित हो गया है। जो भी हो, निवेश बढऩे से भारत की जीडीपी वृद्धि में एक जरूरी संतुलन आता है भले ही कुल रफ्तार धीमी हो।
 
(लेखक क्रेडिट सुइस की एशिया-प्रशांत रणनीति के सह-प्रमुख हैं) 
Keyword: GDP, fiscal deficit, dollar, bond, राजकोषीय घाटा जीडीपी,
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