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प्रोत्साहन की दरकार

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  December 07, 2018

बीते कुछ सप्ताहों में तीन बातें एकदम स्पष्ट हो गई हैं। पहली, अर्थव्यवस्था में धीमापन आ रहा है। जुलाई-सितंबर तिमाही के दौरान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्घि के आंकड़े अनुमान से कम रहे। इसके बाद अधिकांश विश्लेषकों ने पूरे वर्ष की वृद्घि दर को लेकर अपने अनुमान कम कर दिए। कुछ विश्लेषकों ने दूसरी छमाही में वृद्घि दर के 7 फीसदी से कम रहने की बात कही। निवेश में सुधार अच्छा संकेत है जबकि अभी तक यह काफी कमजोर था। परंतु उपभोक्ता व्यय में आई कमी ने इसे ढक लिया है। रिजर्व बैंक इस बात को समझ रहा है लेकिन वह पूरे वर्ष की वृद्घि दर 7.4 फीसदी के आसपास बता रहा है। इसमें भी दूसरी छमाही में 7.2 फीसदी की वृद्घि दर की बात शामिल है जो वर्ष 2014 के बाद से चले आ रहे असंतोषजनक रुझान से कतई बेहतर नहीं है। 

 
दूसरी बात, मुद्रास्फीति उम्मीद से कहीं अधिक तेजी से गिरी है। आरबीआई ने 4 फीसदी मुद्रास्फीति का लक्ष्य रखा था। इसकी मौजूदा दर तीन महीने से इससे नीचे चल रही है। अक्टूबर महीने में तो यह दर 3.3 फीसदी रह गई। कृषि मूल्य मुद्रास्फीति अभी भी काफी कम है। तिमाही जीडीपी आंकड़ों में कृषि के क्षेत्र में तेजी से कमी आई है। इससे पता चलता है कि आखिर क्यों किसान इतनी बुरी स्थिति में हैं। इस बीच कमजोर ग्रामीण मेहनताने ने कमजोर ग्रामीण मांग में भी योगदान दिया है। 
 
तीसरी बात, पूरे वर्ष का राजकोषीय घाटा लक्ष्य अक्टूबर के अंत में ही पार हो गया था। सरकार का जोर इस बात पर है कि यह घाटा पूरे वर्ष के दौरान जीडीपी के 3.3 फीसदी के तय लक्ष्य के दायरे में रहेगा जबकि पिछले दो वर्ष के दौरान यह 3.5 फीसदी रहा था। परंतु इस बात की भी काफी संभावना है कि वह ऐसा केवल उस भुगतान को रोककर ही कर सकेगी जो विभिन्न मदों में देय है। दूसरे शब्दों में कहें तो सरकार को इसके लिए बाजीगरी करनी होगी। पहले दो संकेतक यानी कमजोर आर्थिक वृद्घि और लक्ष्य से नीचे मुद्रास्फीति बताते हैं कि आर्थिक प्रोत्साहन की आवश्यकता है। खासतौर पर उस वक्त जबकि मांग में धीमापन आ रहा हो और ऐसी क्षमता मौजूद हो जिसका इस्तेमाल किया जा सकता हो। इसके बावजूद नीतिगत प्रतिक्रिया अपेक्षित नहीं रही है। सरकार लगातार इस बात पर जोर दे रही है कि वह नीतिगत संकुचन कायम रखेगी। वहीं आरबीआई की दलील है कि उसे मूल्य रुझान समझने के लिए और वक्त चाहिए। यही वजह है कि उसने 6.5 फीसदी की अपनी नीतिगत दर में कमी नहीं की है। ऐसा तब है जब इस दर और मौजूदा मुद्रास्फीति की दर में 3 फीसदी से अधिक का अंतर है। सरकार और आरबीआई दोनों को अपनी स्थिति को नए सिरे से परखना चाहिए। 
 
बाजार में ऋण दरें बहुत अधिक हैं। एचडीएफसी की आवास ऋण दर 8.8 फीसदी से 9.5 फीसदी के बीच है। ऐसा उस वक्त है जबकि आवास कीमतों में लगातार गिरावट आ रही है। स्वाभाविक सी बात है कि आवास की मांग कमजोर है। अधिकांश बैंकों ने अपने श्रेष्ठ ग्राहकों के लिए ऋण दर 9 फीसदी से ऊपर रखी है। छोटे और मझोले उपक्रम कहीं ऊंची ब्याज दर पर ऋण ले रहे हैं। अधिकांश कंपनियों के लिए प्रभावी ऋण दर प्राय: उनकी पूंजी पर मिल रहे रिटर्न से अधिक है। यह दर अव्यावहारिक है और इसमें गिरावट जरूरी है। 
 
राजकोषीय रुख अपेक्षाकृत कम कड़ाई भरा नजर आ रहा है। सरकार द्वारा अतिशय व्यय का एक बड़ा खतरा यह है कि इससे मुद्रास्फीति को ढील मिलती है। आज की तारीख में यह बड़ा खतरा नहीं है क्योंकि मुद्रास्फीति की दर लक्ष्य से नीचे है और तेल कीमतों में तेजी का खतरा भी गुजर चुका है। ऐसे में सरकार को घाटे का स्तर जीडीपी के 3.5 फीसदी तक ही रहने देना चाहिए। यह स्तर पिछले दो वर्षों के समान ही है। मौजूदा हालात में इसे आसानी से जायज ठहराया जा सकता है। इसलिए कि इस वर्ष घाटा सात महीने में ही 3.3 फीसदी का पूरे वर्ष का लक्ष्य पार कर चुका है। 
 
कृषि जिंसों का मूल्य बढ़ाने के लिए नीतिगत पैकेज जरूरी है। खासतौर पर उन फसलों के लिए जिनकी कीमत में स्थिरता ज्यादा है। कृषि निर्यात को दोगुना करना इसकी शुरुआत है। ऐसा तभी होगा जबकि किसानों को उपज का बेहतर मूल्य मिले, ग्रामीण गरीबी कम हो और वहां मांग बढ़े। राजनीतिक दृष्टि से वाजपेयी सरकार ने खाद्य कीमतों का दमन किया और इसकी कीमत चुकाई। मनमोहन सिंह सरकार ने पहले कार्यकाल में इसे सुधारा और दोबारा चुनकर आई। अब तक मोदी सरकार वाजपेयी सरकार की गलतियां दोहरा रही है। अगर अभी सुधार किया जाए तो यह राजनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से बेहतर होगा।
Keyword: GDP, fiscal deficit, agri, jins,,
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