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आपके फेसबुक, ट्विटर पर सरकार की नजर!

कुमार संभव श्रीवास्तव / नई दिल्ली 12 06, 2018

आरटीआई में हुआ खुलासा

... सोशल मीडिया

दो साल से खंगाल रही थी सरकार लोगों का डेटा
अप्रैल में जारी की थी निविदा, अगस्त में ली वापस
सरकार आम चुनाव तक जारी रखना चाहती थी व्यवस्था

बिजनेस स्टैंडर्ड आपके फेसबुक, ट्विटर पर सरकार की नजर!सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने अगस्त में उस निविदा को वापस ले लिया जिसके जरिये वह लोगों के सोशल मीडिया अकाउंट पर नजर रखने के लिए एक एजेंसी की सेवाएं लेना चाहती थी। उच्चतम न्यायालय ने चेतावनी दी कि इससे भारत ऐसा देश बन सकता है, जहां सरकार लोगों की गतिविधियों पर नजर रखती है। इसके बाद सरकार ने अप्रैल में जारी इस निविदा को वापस ले लिया। सरकार लोगों के सोशल मीडिया और ईमेल रिकॉर्ड खंगालना चाहती थी। साथ ही वह सरकारी नीतियों के बारे में उनकी राय भी जानना चाहती थी।

सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत दाखिल एक आवेदन में यह खुलासा हुआ है कि मंत्रालय पहले से ही लोगों के सोशल मीडिया अकाउंट और पोस्ट पर नजर रख रहा है। अप्रैल में निविदा जारी होने से दो साल पहले से ही सोशल मीडिया कम्युनिकेशन हब के जरिये लोगों की सोशल मीडिया गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। इस निविदा का मकसद मंत्रालय की पहले से चल रही योजना का एक साल के लिए विस्तार करना था यानी सरकार इसे अगले आम चुनावों तक बढ़ाना चाहती थी। 

दस्तावेज के मुताबिक मंत्रालय ने अप्रैल, 2016 में सोशल मीडिया कम्युनिकेशन हब में निगरानी सेवाओं के लिए ऑब्जेक्टवन इनफॉरमेशन सिस्टम्स को दो साल का ठेका दिया था। कंपनी को लोगों के सोशल मीडिया अकाउंट पर नजर रखने, प्रभावशाली यूजर की पहचान करने और किसी मैसेज, ट्वीट या डेटा पर प्रतिक्रिया की निगरानी के लिए एक सॉफ्टवेयर और सुनने में सक्षम टूल लगाने की जिम्मेदारी दी गई थी। यह सॉफ्टवेयर पेड और प्राइवेट मीडिया डेटा सहित पूरी सोशल मीडिया को खंगाल सकता है, सोशल मीडिया की नब्ज पकड़ सकता है और गतिविधियों को समस्याग्रस्त और बिना समस्या वाली श्रेणियों में बांट सकता है। लोगों की सोशल मीडिया गतिविधियों की निगरानी के आधार पर कंपनी दैनिक, साप्ताहिक और मासिक आधार पर रिपोर्ट बनाती थी। दस्तावेज के मुताबिक सरकार ने कंपनी को एक साल के लिए 1.09 करोड़ रुपये का भुगतान किया। 

कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव के वेंकटेश नायक ने मई में आरटीआई आवेदन दाखिल किया था लेकिन शुरुआत में मंत्रालय ने सूचना देने से इनकार किया। जब नायक ने इसके खिलाफ अपील दायर की तब जाकर मंत्रालय ने उनके साथ जानकारी साझा की। 28 नवंबर को बिज़नेस स्टैंडर्ड ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और ऑब्जेक्टवन इनफॉरमेशन सिस्टम्स को इस बारे में प्रश्नावली भेजी थी। उनसे पूछा गया था कि दो साल के दौरान लोगों की सोशल मीडिया गतिविधियों के कितने और किस तरह के आंकड़े एकत्र किए गए और उनका क्या इस्तेमाल किया गया। कई बार याद दिलाने के बावजूद न तो मंत्रालय ने और न ही कंपनी ने इसका कोई जवाब दिया। 

ब्रिटेन की राजनीतिक सलाहकार फर्म क्रैंब्रिज एनालिटिका के लोगों के सोशल मीडिया डेटा को उनकी सहमति के बिना राजनीतिक प्रचार के लिए इस्तेमाल किए जाने के प्रकरण के सामने आने के बाद दुनिया भर में सोशल मीडिया डेटा के दुरुपयोग को लेकर चिंता बढ़ गई हैं। कंपनी पर आरोप है कि उसने लाखों लोगों के सोशल मीडिया पोस्ट का विश्लेषण करके उनका मनोवैज्ञानिक प्रोफाइल बनाया और फिर वोटिंग रुझान को प्रभावित करने के लिए उन्हें लक्षित मैसेज भेजे गए। 

स्क्रॉल डॉट इन ने खबर दी थी कि इस निविदा का मकसद एक ऐसे सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करना था जो लोगों की राय के बारे में पूरी जानकारी जुटा सके और सरकार की नीतियों के बारे में उनकी राय को प्रभावित करने के लिए लक्षित मैसेज भेज सके। उसने बाद में खबर दी कि 40 से अधिक सरकारी विभाग दिल्ली के इंद्रप्रस्थ इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी द्वारा विकसित खास टूल का इस्तेमाल कर रहे हैं जो लोगों की सोशल मीडिया गतिविधियों पर व्यापक निगरानी रखता है। इसके बाद निजता के उल्लंघन के आधार पर सरकार की निविदा को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई थी।

हालांकि मंत्रालय ने निविदा को वापस ले लिया है लेकिन कई सरकारी विभाग ने इसे जायज ठहराया है। उनकी दलील है कि वे केवल उसी जानकारी को खंगाल रहे हैं, जो सार्वजनिक तौर पर पोस्ट की गई हैं। अलबत्ता निजता के समर्थकों का तर्क है कि सरकार के इस कदम का लोगों की बोलने की आजादी के अधिकार पर प्रतिकूल असर हो सकता है।
Keyword: social media, twitter, facebook,,
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