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म्यूनिस: स्मार्ट शहरों के लिए स्मार्ट बॉन्ड

विनायक चटर्जी /  December 06, 2018

बेहतर नियमन और व्यवस्था के साथ आने वाले दिनों में म्युनिसिपल बॉन्ड शहरों की वित्तीय बुनियाद बन सकते हैं। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं विनायक चटर्जी 

 
बीते कुछ वर्षों में देश की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को गैर सरकारी वित्तीय सहायता को गहरा झटका लगा है। ऋण देने वाले संस्थानों ने या तो ऋण देना बंद कर दिया है या फिर वे इसके इच्छुक नहीं हैं। पूंजी बाजार संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं। विदेशी हित ब्राउनफील्ड (पुरानी) परियोजनाओं के परिचालन में हैं न कि नई यानी ग्रीनफील्ड परियोजनाएं शुरू करने में। फंसे हुए कर्ज का आकार इतना बड़ा है कि हर कोई उससे वाकिफ है। बुनियादी ढांचा क्षेत्र की कंपनियों को लेकर हाल में एक के बाद एक दिवालिया होने के मामले सामने आए हैं। यह सबकुछ नियमित और भलीभांति जांची-परखी बुनियादी परियोजनाओं के साथ हुआ है जो मोटे तौर पर बिजली और परिवहन क्षेत्र में चल रही हैं।
 
शहरी बुनियादी ढांचे का वित्त पोषण हमेशा से मुश्किल रहा है, यहां तक कि तब भी ऐसा था जब तमाम मौजूदा नकारात्मकता ने सर नहीं उठाया था।  ऐसे में पुणे ने अपनी जलापूर्ति योजनाओं की धन की जरूरत के लिए गत वर्ष जून में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में म्युनिसिपल बॉन्ड जारी करके 200 करोड़ रुपये जुटाए। ऐसा नहीं है कि यह देश में अब तक जारी सबसे बड़े म्युनिसिपल बॉन्ड का हिस्सा भर था। पुणे ऐसा करके 2264 करोड़ रुपये जुटाना चाहता है। असल बात यह है कि इसके अलावा भी शहरी बुनियादी परियोजनाओं की भरपाई के लिए अन्य बड़े फंड स्रोत तैयार किए जा रहे हैं। 
 
फंड जुटाने की यह प्रक्रिया और हैदराबाद में इसी वष फरवरी में अपनाई गई एक प्रक्रिया (वहां भी 200 करोड़ रुपये जुटाए गए), दोनों सरकार की स्मार्ट सिटी पहल से जुड़ी सबसे बड़ी चिंता यानी फंडिंग की परेशानी को दूर कर सकते हैं। यह स्पष्ट था कि ये शहर 2 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाओं के लिए नकदी संकट से जूझ रही सरकारों का भरोसा नहीं कर सकते। न ही निजी-सार्वजनिक भागीदारी की संभावनाएं नजर आ रही हैं। केंद्र सरकार का समर्थन केवल एक सीमा तक ही मिल सकता है। वर्ष 2011 के अनुमान के अनुसार देखें तो देश के तेजी से विकसित होते शहरों को अगले कुछ दशकों के दौरान नगरीय निकाय सुविधाएं मुहैया कराने के लिए करीब 80,000 करोड़ डॉलर से 1.2 लाख डॉलर की राशि की आवश्यकता होगी। यह अनुमान सरकार और मैकिंजी दोनों का है। 
 
वैश्विक स्तर पर म्युनिसिपल बॉन्ड फंडिंग का स्थापित और प्रमुख स्रोत हैं। उदाहरण के लिए अमेरिका को लें जहां म्युनिसिपल बॉन्ड को प्यार से 'म्यूनिसÓ कहा जाता है। अमेरिका में म्युनिसिपल बॉन्ड बाजार का आकार 3.8 लाख डॉलर का है।  भारत में म्युनिसिपल बॉन्ड बाजार का इतिहास पुणे बॉन्ड जारी होने से भी करीब 20 वर्ष पुराना है। बेंगलुरू ऐसा बॉन्ड जारी करने वाला पहला शहर था। उसने सरकारी गारंटी वाला ऐसा बॉन्ड सन 1997 में जारी किया था। ज्ञानाग्रह सेंटर फॉर सिटिजनशिप ऐंड डेमोक्रेसी के मुताबिक तब से 2015 तक देश के शहरी निकाय केवल 29.1 करोड़ रुपये की राशि जुटा पाने में कामयाब रहे हैं। चेन्नई, अहमदाबाद, हैदराबाद और नासिक ऐसे शहर हैं जिन्होंने प्राय: जलापूर्ति संबंधी परियोजनाओं के लिए ऐसा किया। 
 
वर्ष 2015 में जब भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने नियमन जारी करके शहरी निकायों को बॉन्ड जारी करने और उन्हें सूचीबद्घ करने की व्यवस्था की। म्युनिसिपल बॉन्ड में निवेशकों की रुचि की कमी की सबसे बड़ी वजहों में से एक यह है कि शहरी निकायों के कामकाज में पारदर्शिता देखने को नहीं मिलती। जैसा कि उक्त रिपोर्ट भी कहती है, 'भारत में म्युनिसिपल बॉन्ड संभावित निवेशक इसलिए नहंी जुटा सके हैं क्योंकि वित्तीय और परिचालन निष्कर्षों को लेकर स्पष्टता नहीं है।Ó सेबी के नियमों ने ऐसे बॉन्ड जुटाने के लिए मानक पात्रता तय कर दी है। इसके चलते एक स्तर की पारदर्शिता भी सुनिश्चित हुई है। 
 
वर्ष 2017 में 500 प्रस्तावित स्मार्ट सिटी और अमृत योजना (अटल मिशन फॉर रिजुवनेशन ऐंड अबर्न ट्रांसफॉर्मेशन) की क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने रेटिंग की। यह बाजार तक पहुंच सुनिश्चित करने की कोशिश का पहला कदम था। इन शहरों में से 55 को निवेश श्रेणी की रेटिंग मिली थी। केंद्र सरकार ने भी किसी भी नगरपालिका द्वारा जारी कुल बॉन्ड राशि पर 2 फीसदी ब्याज सब्सिडी देने की पेशकश की। संभावित निवेशकों के लिए आई राहत की बात करें तो जारीकर्ताओं के लिए मानकों का मानकीकरण, खातों में पारदर्शिता सुनिश्चित करना और संभावित जारीकर्ता की क्रेडिट रेटिंग आदि काफी अहम हैं। एक ओर जहां कम साख वाले शहरों को हमेशा सरकारी मदद की आवश्यकता होगी वहीं बड़े और आर्थिक रूप से व्यवहार्य शहर निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक क्यों नहीं होंगे, यह समझ पाना थोड़ा मुश्किल है। वे सरकारी वित्त पर अपेक्षाकृत कम निर्भर होंगे।
 
परंतु दिक्कत यहीं है। बेंगलुरू का उदाहरण लें तो इसमें दो राय नहीं कि आर्थिक स्तर पर यह शहर खूब फलफूल रहा है। परंतु म्युनिसिपल बॉन्ड से पैसा जुटाने वाला पहला शहर बनने के 20 वर्ष बाद शहर की वित्तीय व्यवस्था ठप पड़ चुकी है। अपने आधे राजस्व के लिए शहर अभी भी सरकारी अनुदान पर निर्भर है।  दूसरा उदाहरण पुणे का है। हिंदुस्तान टाइम्स समाचार पत्र में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक म्युनिसिपल बॉन्ड से 200 करोड़ रुपये जुटाने के एक वर्ष बाद भी फंड का इस्तेमाल नहीं किया गया और वह पैसा अभी भी सावधि जमा में लगा हुआ है। जिस जलापूर्ति योजना के लिए पैसे जुटाए गए थे उसके लिए जारी निविदाओं को रद्द करना पड़ा था क्योंकि निगम पार्षदों ने आरोप लगाया कि बोली की प्रक्रिया स्वीकार्य नहीं है। सावधि जमा से निगम को उस राशि की तुलना में कम प्राप्ति होती है जो उसे बॉन्ड इश्यू पर ब्याज के रूप में चुकानी होती है।
 
पूंजी बाजार सुधार, केंद्र सरकार की सब्सिडी और खातों में पारदर्शिता आदि वे तत्त्व हैं जो म्यूनिस बॉन्ड को गति प्रदान करने के लिए जरूरी हैं परंतु असली समस्या कहीं और ही है। दरअसल यह गहन ढांचागत समस्या है जो सभी भारतीय शहरों को चपेट में लिए हुए है। फिर चाहे मामला जरूरत के वक्त परिसंपत्ति कर जुटाने का हो या शहरी राजनीति के प्रबंधन की। जैसे-जैसे देश के शहर इन समस्याओं से निपटते जाएंगे, बॉन्ड निवेशकों का उत्साह भी बढ़ेगा। ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि ये स्मार्ट बॉन्ड हमारे स्मार्ट सिटीज के लिए वित्तीय मदद का स्रोत बनेंगे। 
 
(लेखक फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं। लेख में प्रस्तुत विचार उनके निजी हैं।)
Keyword: smart city, bond, projects, sebi,
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