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कैसे सुधरे संग्रह?

संपादकीय /  December 06, 2018

केंद्र सरकार ने भरोसा जताया है कि चालू वित्त वर्ष के दौरान वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह का लक्ष्य हासिल करने में कामयाबी मिलेगी। परंतु अब तक के आंकड़े एकदम अलग कहानी कहते हैं।  नवंबर महीने का संग्रह जिसमें पिछले महीने किए गए लेनदेन पर चुकता कर शामिल है, वह 97,600 करोड़ रुपये रहा। यह राशि एक लाख करोड़ रुपये के मासिक लक्ष्य से कम है। अप्रैल से नवंबर के बीच केवल दो महीनों में यह राशि एक लाख करोड़ रुपये का स्तर पार कर सकी। एक बार अप्रैल में और दूसरी बार अक्टूबर में। वर्ष 2018-19 के पहले 8 महीनों में जीएसटी संग्रह 7.76 लाख करोड़ रुपये रहा। यह वार्षिक लक्ष्य का महज 58 फीसदी है। अब तक का रुझान यह भी बताता है कि अगर वार्षिक लक्ष्य हासिल करना है तो बचे हुए महीनों में मासिक लक्ष्य 1.43 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहेगा। मौजूदा मानकों के हिसाब से देखें तो यह कठिन प्रतीत होता है। मौजूदा हालात में यह समझ पाना मुश्किल है कि बचे हुए महीनों में जीएसटी संग्रह में अप्रैल से नवंबर तक के औसत संग्रह की तुलना में 47 फीसदी का इजाफा कैसे होगा।

 
इस वर्ष यह संग्रह लक्ष्य से पीछे क्यों रह गया, इसकी कई वजह हो सकती हैं। ये अनुमान कि वर्ष बीतने के साथ जीएसटी व्यवस्था के क्रियान्वयन की दिक्कतें अपने आप दूर होती चली जाएंगी, थोड़े अतिरंजित प्रतीत होते हैं। व्यवस्था काफी हद तक संतुलित हो चुकी है लेकिन अनुपालन के स्तर में बहुत ज्यादा सुधार नहीं हुए हैं। कई करदाताओं का अनुभव अभी भी संतोषजनक नहीं है।  पंजीकृत करदाताओं की कुल संख्या अभी भी 1.1 करोड़ है लेकिन करदाताओं द्वारा फाइल किए गए रिटर्न में बढ़ोतरी की गति बरकरार नहीं है। सितंबर 2018 के अंत तक ऐसे रिटर्न 67 लाख ही थे। अगर भविष्य में अनुपालन दर में सुधार नहीं होता है तो इसकी एक वजह यह हो सकती है कि रिटर्न फाइल करना सुगम नहीं है। ऐसे में जाहिर सी बात है कि आने वाले महीनों में कर संग्रह पर नकारात्मक असर होगा। 
 
सबसे अहम बात यह है कि जीएसटी की दरें तय करने वाली संस्था यानी जीएसटी परिषद ने दिसंबर 2017 और जुलाई 2018 की दो हालिया बैठकों में कई वस्तुओं की कर दरें 28 फीसदी के उच्चतम स्लैब से कम करके 18 फीसदी कर दी हैं। दरों में की गई इस कटौती ने भी बाद के महीनों में जीएसटी से अर्जित होने वाले राजस्व में कमी की है।  उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले महीनों में शुल्क दरें कम होने के कारण राजस्व वृद्घि जोर पकड़ेगी। ऐसा दरें कम होने के कारण इन वस्तुओं की बिक्री में इजाफा होने से हो सकता है। 28 फीसदी के स्लैब वाली जिंसों और वस्तुओं की दरों में कटौती की दलील पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है। बहरहाल, एक बात जो दलील से परे है वह यह कि जीएसटी परिषद ने अब तक कर स्लैब में कमी करने का कोई प्रयास नहीं किया है। कहीं अधिक समझदारी भरी नीति यह होती कि 28 फीसदी के स्लैब वाली वस्तुओं और सेवाओं की दरों में कमी करके उनको 18 फीसदी के दायरे में लाया जाता, साथ ही कम कर दायरे वाली कुछ वस्तुओं की कर दरों में इजाफा भी किया जाता। 
 
ऐसा करने से परिषद को कर स्लैब को दो या तीन श्रेणियों में सीमित करने में भी सहायता मिलती। परिषद की अगली बैठक में इस बारे में विचार विमर्श होना चाहिए। इससे न केवल जीएसटी सुधार के एजेंडे को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी बल्कि कर संग्रह में आई कमी की समस्या से भी निपटा जा सकेगा।
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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