बिजनेस स्टैंडर्ड - बाड़मेर में जसवंत सिंह की विरासत अब भी बरकरार!
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बाड़मेर में जसवंत सिंह की विरासत अब भी बरकरार!

साई मनीष /  12 05, 2018

राजस्थान विधानसभा चुनाव

वर्ष 2014 में बाड़मेर से निर्दलीय प्रत्याशी थे जसवंत सिंह

बिजनेस स्टैंडर्ड बाड़मेर में जसवंत सिंह की विरासत अब भी बरकरार!राजस्थान में यह पहला ऐसा विधानसभा चुनाव है जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के संस्थापक सदस्य जसवंत सिंह की आंखें खुली होंगी लेकिन वह दिमागी रूप से निष्क्रिय होंगे। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के करीबी दोस्त रहे जसवंत सिंह का जन्म बाड़मेर जिले में हुआ था जो पश्चिमी राजस्थान का एक सूखा क्षेत्र है। सिंह की जिंदगी की कई विडंबनाओं में एक विडंबना यह भी थी कि जब वह अपनी जन्मभूमि से पहली बार चुनाव लड़े तब वह उस पार्टी के टिकट पर चुनाव क्षेत्र में नहीं उतरे जिसकी स्थापना में उन्होंने अपना अहम योगदान दिया था। 2014 के चुनावों में बाड़मेर से वह एक निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनावी जंग में उतरे। यह पहला मौका था जब वह इस संसदीय सीट से चुनाव लड़े थे। लेकिन उन्हें भाजपा के कर्नल सोनाराम चौधरी से मात खानी पड़ी जो कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे। 

बिजनेस स्टैंडर्ड बाड़मेर में जसवंत सिंह की विरासत अब भी बरकरार!इस वक्त सिंह एक अलग ही दुनिया में हैं। 2014 में सिर के चोट की वजह वह कोमा में चले गए लेकिन अब भी वह लोगों के दिमाग में अपनी जगह जरूर बनाए हुए हैं। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने उनकी विरासत का अंदाजा लगाने के लिए बाड़मेर के कई विधानसभा क्षेत्रों का जायजा लिया जिसके बाद मिली-जुली तस्वीर बनकर उभरी। जसवंत सिंह की याद दिलाने पर कुछ लोगों की आंखों में चमक दिखती है जबकि कुछ को महसूस होता है कि उन्हें भाजपा ने नुकसान पहुंचाया। हालांकि कुछ लोगों का यह भी मानना है कि वह जिस जगह से ताल्लुक रखते थे वहां उन्होंने कुछ खास नहीं किया। कुछ लोग उन्हें इस वजह से याद करते हैं क्योंकि वह ठीक नहीं हैं। कुछ का कहना है कि वह अवसरवादी थे और कुछ मानते हैं कि उनके बेटे मानवेंद्र को जसवंत सिंह की विरासत संभालने में दिक्कत होगी।

जसोल में जसवंत सिंह का जन्म हुआ था। जसोल की मेवा नगर तहसील के पंचायत उप कार्यालय में विकास कुमार बैठे हैं। कुमार का जन्म उस साल हुआ था जब इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट आईसी-814 को अगवा कर लिया गया था और बंधकों के बदले में पांच आतंकियों को छोडऩे जैसी मुश्किल स्थिति का सामना सिंह को करना पड़ा जिनमें मौलाना मसूद अजहर भी शामिल था। कुमार का कहना है, 'मैं हर वक्त जसवंत सिंह के बारे में सुनते हुए बड़ा हुआ हूं। मैं उन्हें एक मजबूत शख्सियत के तौर पर जानता था। वह जो थे अपनी बदौलत थे। वह भाजपा का सदस्य होने की वजह से जसवंत सिंह नहीं बने। उन्होंने तो उन्हें चुनाव लडऩे के लिए एक टिकट तक नहीं दिया और उन्हें पार्टी से निकाल दिया। भाजपा ने उनके साथ जो कुछ भी किया वह गलत था।'

बाड़मेर के बाकी इलाकों की तुलना में खेती के लिहाज से संपन्न एक बड़े गांव गुडामलानी के लोग भी कुछ ऐसी ही बातें करते हैं। सवर्ण जाति के संपन्न किसान नेमीचंद गेहूं और जीरे की खेती करते हैं। वह कहते हैं, 'मैं जसवंत सिंह की वजह से ही भाजपा को अपना समर्थन दिया करता था। मैं अब भी उस व्यक्ति को अपना समर्थन दूंगा जो जसवंत सिंह के नाम पर वोट की मांग करेगा। उनके बेटे मानवेंद्र ने भाजपा को खारिज कर दिया और उनका बागी होना निश्चित तौर पर भाजपा की छवि के लिए घातक होगा।'

बाजरा और जीरे की खेती करने वाले एक बुजुर्ग व्यक्ति भंवरलाल माली कहते हैं, 'मैंने जीवन में पहली बार उन्हें पिछली सरकार के शासनकाल के दौर में ही देखा था। वह बगल के शहर में प्रचार के लिए आए थे। मुझे नहीं याद है कि उन्होंने यहां कोई विकास का काम किया हो। उनके साथ जो कुछ भी हुआ वह ठीक नहीं था।' सिवाना विधानसभा क्षेत्र से अरावली की पहाडिय़ां अब भी देखी जा सकती हैं। इस इलाके के दृष्टिकोण में बदलाव दिख रहा है। यहां के गांव में एक स्थानीय दुकानदार गौतम भाई पूछते हैं, 'जसवंत सिंह की विरासत यहां खत्म हो गई है। कभी-कभार लोग उनका नाम लेते हैं। लेकिन अब यह सब केवल जसोल में ही होता है और कहीं नहीं। मैं यहां जीवन भर रहा और मैंने उन्हें यहां एक बार भी आते नहीं देखा। उन्होंने यहां विकास का कोई काम नहीं कराया। इसके बाद उन्होंने भाजपा को मुश्किल स्थिति में ला दिया। आखिर उनको पार्टी के खिलाफ जाने की क्या जरूरत थी?'

एक स्थानीय भाजपा कार्यकर्ता सुरेंद्र सिंह स्थानीय उम्मीदवार हमीर सिंह के लिए प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। वह कहते हैं, 'जसवंत सिंह के साथ जो कुछ भी हुआ वह गलत था। लेकिन अब इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। अब जब मैं उनके बारे में सहानुभूति के साथ सोचता हूं क्योंकि वह बीमार हैं। उनके बेटे ने भी पार्टी को धोखा दिया है।'

2014 के चुनावों में जसवंत सिंह को हराने वाले कर्नल सोनाराम चौहान कहते हैं, 'जसवंत सिंह एक भरोसेमंद दोस्त और अच्छे व्यक्ति थे। हम राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी जरूर थे लेकिन हमने कई मुद्दों पर मिलकर काम किया। मानवेंद्र सिंह, जसवंत सिंह नहीं हैं। जसवंत सिंह जनाधार वाले नेता थे। मानवेंद्र सिंह अपने पिता के नाम को भुना रहे हैं। इससे उन्हें कोई फायदा नहीं मिलेगा। मैं यह देखना चाहता हूं कि अगले पांच सालों में मानवेंद्र सिंह कहां होंगे।' वहीं दूसरी ओर मानवेंद्र सिंह इस बात से अभिभूत दिखते हैं कि जसवंत सिंह की विरासत लोगों की स्मृतियों में कैद है। उनका कहना है कि वह इस तथ्य से अभिभूत हो जाते हैं कि बाड़मेर के लोग उन्हें याद करते हैं और बाड़मेर ही हमेशा उनका घर होगा लेकिन झालरापाटन में उन्हें अपना कतव्र्य निभाना है।

बाड़मेर से जैसलमेर के रास्ते में राष्ट्रीय राजमार्ग 68 के दोनों तरफ शिव कस्बा पड़ता है जहां मानवेंद्र सिंह विधायक रहे हैं। 50 वर्षीय अदरिम खान कहते हैं, 'मानवेंद्र सिंह उनके बेटे हैं और निश्चित तौर पर उन्हें विरासत में अपने पिता की खूबियां मिली हैं। मुझे उन्हें पोकरण में देखने का मौका मिला था। वह हमारा हाल-चाल पूछते थे और वह निजी तौर पर हमसे संपर्क करते थे। वह मुसलमानों के लिए भी अच्छे दोस्त थे।'
Keyword: election, chattisgarh, telangana, rajsthan, madhya pradesh,,
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