बिजनेस स्टैंडर्ड - एनपीएस पर टिके रहने की जरूरत
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एनपीएस पर टिके रहने की जरूरत

अजय शाह /  December 05, 2018

राष्ट्रीय पेंशन योजना से किसी भी प्रकार का विचलन राजकोष पर बहुत बड़ा बोझ बन सकता है। वर्ष 2002 के बाद से हर राजनीतिक नेतृत्व ने इसके लिए लड़ाई लड़ी है। जानकारी दे रहे हैं अजय शाह

 
भारत में अफसरशाहों की तादाद बहुत अधिक नहीं है लेकिन उनको वेतन भत्ते बहुत उदारता से मिलते हैं। पारंपरिक तौर पर अफसरशाहों की पेंशन बहुत ज्यादा थी। सन 1990 के दशक के आखिरी दिनों में इन समस्याओं को समझा गया और राष्ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस) सुधार को अंजाम दिया गया। एक पीढ़ी के लिए एनपीएस एक महंगा उपाय था। सुधारों में निरंतरता का अभाव था और सशस्त्र बल एक रैंक, एक पेंशन (ओआरओपी) की मांग पर अड़ गए। अब हमें ऐसे युवा अफसरशाह मिलते हैं जो एनपीएस की शिकायत करते हैं। उन्हें यह पसंद नहीं है। वर्ष 2002 के बाद से हर राजनीतिक नेतृत्व ने एनपीएस के लिए लड़ाई लड़ी है। हमें इस रास्ते पर टिके रहना चाहिए। 
 
नियुक्तियों के संदर्भ में देखें तो हमारा देश बहुत बड़ा नहीं है। हालांकि वेतन भत्तों का ढांचा कुछ ऐसा है कि बाजार में शीर्ष पर वे कम हैं जबकि निचले स्तर पर काफी अधिक। उदाहरण के लिए निजी स्कूल शिक्षकों को सरकारी स्कूलों की तुलना में काफी कम वेतन देते हैं। चूंकि शीर्ष पर बहुत कम कर्मचारी होते हैं इसलिए प्रति कामगार कुल व्यय निजी स्कूलों के मानक की तुलना में बहुत अधिक निकलता है। पारंपरिक तौर पर अफसरशाहों की पेंशन उनके वेतन का करीब आधा हुआ करती थी। सन 1990 के दशक में पेंशन व्यय में विस्फोटक वृद्धि देखने को मिली। खासतौर पर सशस्त्र बलों और रेलवे की पेंशन में। उस दौर में पेंशन में होने वाली वृद्धि, वेतन में होने वाली वृद्धि की तुलना में कहीं अधिक तेजी से हो रही थी। मासिक पेंशन देने का वादा एक तरह से मासिक कूपन वाले मासिक बॉन्ड की तरह है। इस सफर में एक अहम पड़ाव था अप्रत्यक्ष पेंशन ऋण का अनुमान। वित्त मंत्रालय और एशियाई विकास बैंक ने एक आम सर्वे की फंडिंग की जिसकी सहायता से अफसरशाहों और पेंशनधारकों की तादाद का अनुमान लगाया गया। इसका इस्तेमाल सुरेंद्र दवे और गौतम भारद्वाज ने एक पर्चे में किया। अनुमान था कि अप्रत्यक्ष पेंशन व्यय जीडीपी के 65 प्रतिशत के बराबर था।
 
सन 1999 में सामाजिक न्याय मंत्रालय ने सुरेंद्र दवे के नेतृत्व में प्रोजेक्ट ओएसिस की शुरुआत की। इसने एनपीएस का डिजाइन तैयार किया। एनपीएस एक पैकेज डील थी जिसमें अफसरशाहों के वेतन में 10 फीसदी की बढ़ोतरी करने और एक बेहतर परिभाषित सहयोग व्यवस्था को अपनाने की बात शामिल थी। एनपीएस को तैयार करने की प्रक्रिया में नौसेना और वायुसेना के उच्चस्तरीय अधिकारी भी शामिल हुए। वे इसे लेकर उत्साहित थे लेकिन परियोजना नियोजन में यह बात शामिल थी कि व्यवस्था के स्थिर होने के बाद ही सशस्त्र बलों को इसमें शामिल किया जाएगा। इन सुधारों को यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह, लालकृष्ण आडवाणी ने अंजाम दिया था और अटल बिहारी वाजपेयी ने 12 दिसंबर, 2002 को इन्हें मंजूरी दी थी। एक जनवरी, 2003 के बाद की सभी सरकारी नियुक्तियां एनपीएस व्यवस्था के तहत की जानी थी।
 
वर्ष 2004 में जब संप्रग की सरकार आई तो इन सभी सवालों का नए सिरे से आकलन किया गया। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी गठबंधन साझेदार थी और सुधारों को लेकर उत्सुक नहीं थी इसलिए नया कानून पारित नहीं किया जा सका। इसलिए इसके क्रियान्वयन की शुरुआत मजबूत विधिक उपायों और सेवा प्रदाताओं के साथ अनुबंधों से हुई। आखिरकार वर्ष 2013 में इस बारे में कानून पारित किया जा सका और पीएफआरडीए के रूप में सेवा प्रदाताओं का सांविधिक नियामक सामने आया। दुनिया के तमाम अन्य देशों में हुए पेंशन सुधारों की तरह हमारे यहां मौजूदा कामगारों या पेंशनधारकों की पेंशन में कोई कमी नहीं की गई। एक पीढ़ी के लिए सरकार 10 फीसदी वेतन वृद्धि के साथ नए कामगारों के लिए सहयोग राशि का भुगतान कर रही है और पहले से नियुक्त कामगारों को पेंशन दी जा रही है। राजकोषीय लाभ उन कर्मचारियों के निधन से उत्पन्न होता है जिनकी नियुक्ति 1/1/2004 से पहले हुई थी। ये लाभ वर्ष 2004 से आरंभ होकर 75 वर्ष की कालावधि में विस्तारित होंगे।
 
इस अवधि में भारतीय सुधार प्रक्रिया बहुत अच्छी नजर आई। यह प्रचुर प्रमाणों, आधारभूत बदलावों, गहन प्रशासनिक बदलाव और दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दलों समेत तमाम राजनीतिक नेतृत्व की संबद्धता का दौर था। इसने भारत की कठिन समस्याओं का सामना करने और उनसे निपटने की क्षमता को सामने रखा। परंतु आने वाले वर्षों में हालात उतने बेहतर नहीं रह गए। एनपीएस सुधारों के आरंभिक दौर से सशस्त्र बल इस योजना का हिस्सा थे। जैसा कि हमने पहले कहा नौसेना और वायु सेना के साथ चर्चा हुई थी। विचार यह था कि यह क्रियान्वयन अफसरशाहों के लिए संस्थागत ढांचा बनने के बाद किया जाएगा। परंतु वित्त मंत्रालय ने इसे आगे नहीं बढ़ाया।
 
संप्रग के दूसरे कार्यकाल में एक रैंक, एक पेंशन की मांग उठी। दोनों प्रमुख दलों ने बिना किसी गुणा गणित के इसे मान लिया। सन 2015 में मैंने और रेणुका साने ने अनुमान लगाया कि इस निर्णय की लागत बहुत अधिक थी। सशस्त्र बल न केवल इस सुधार से वंचित रहे बल्कि उनके लिए हालात बद से बदतर होते गए। एक रैंक, एक पेंशन ने राजकोषीय क्षमताओं को कमजोर किया और इस प्रकार भारतीय राज्य की सैन्य शक्ति को भी। ये समस्याएं भारतीय राज्य की बैलेंस शीट से इतर जवाबदेही के व्यापक प्रश्न का हिस्सा हैं। सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले बॉन्ड के दृश्य भंडार से इतर ढेर सारे वादे ऐसे भी होते हैं जो सरकार के अलग-अलग धड़े करते हैं। हम भारी भरकम कर्ज, बॉन्ड जारी करने आदि की चिंता तो करते हैं, हमें वादों को लेकर और अधिक चिंतित रहना चाहिए।
 
सरकार के वादों को पूरा करने और उनमें सुधार करने का काम राजनीतिक नेतृत्व का है। परंतु ये निर्णय मजबूत सूचना तंत्र के अधीन किए जाने चाहिए। एनपीएस की बात करें तो दोनों दलों के नेतृत्व ने 10 प्रतिशत वेतन वृद्धि और 20 प्रतिशत सहयोग दर को मंजूरी देने के पहले विभिन्न नीतिगत विकल्पों के सांख्यिकीय विश्लेषण, विकल्पों आदि पर पूरा विचार किया। कई अन्य परिस्थितियों में देश की नीति निर्माण प्रक्रिया बिना किसी आकलन के नतीजे पर पहुंच गई। इस बारे में काफी कुछ कहा जा सकता है परंतु हमें 75 वर्ष के दायरे में एनपीवी को देखने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
 
राजकोषीय व्यवस्था बैलेंस शीट से इतर जवाबदेहियों को लेकर व्यापक विचार किस प्रकार अपना सकती है? स्वैच्छिक खरीदारों वाले बॉन्ड बाजार और सार्वजनिक ऋण प्रबंधन एजेंसी (पीडीएमए) की आवश्यकता है। बॉन्ड के स्वैच्छिक खरीदार भविष्य के राजकोषीय तनाव को लेकर चिंतित होंगे। पीडीएमए बॉन्ड के खरीदारों से संबद्ध होगा और बॉन्ड बाजार के नजरिये को नीतिगत प्रक्रिया में लाएगा। इससे नीतिगत निर्णयों में संतुलन कायम होगा।
Keyword: pension, NPS,,
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