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विलय योजनाओं की समीक्षा का अधिकार न्यायालयों को मिले

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  December 04, 2018

अगर मीडिया रिपोर्ट पर यकीन किया जाए तो राष्ट्रीय कंपनी कानून अधिकरण (एनसीएलटी) के न्यायाधिकार में कटौती का प्रस्ताव लाया गया है। कंपनियों के बीच समझौता एवं सुलह से संबंधित योजनाओं को मंजूरी देने की शक्ति एनसीएलटी से लेकर कंपनी मामलों के मंत्रालय को स्थानांतरित कर दी जाएगी। पहली नजर में यह तार्किक लग सकता है। एक योजना को संस्तुति देना एक नियमित प्रशासकीय मामला लग सकता है और इससे एनसीएलटी को अन्य अहम मसलों पर सुनवाई के लिए अधिक समय मिल सकेगा। लेकिन सच्चाई यह है कि इस तरह का कदम न केवल अनर्थकारी होगा बल्कि इससे मौजूदा त्रासदी बढ़ जाएगी। पहले यह उच्च न्यायालयों का क्षेत्राधिकार हुआ करता था लेकिन बाद में यह दायित्व एनसीएलटी को दे दिया गया। वर्ष 2000 के दशक की शुरुआत में भी कंपनी मंत्रालय को यह शक्ति सुपुर्द करने की कोशिश की गई थी और कंपनी अधिनियम 2013 में दोबारा इसकी पहल की गई। लेकिन दोनों ही प्रयास न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ गए। 

 
उच्चतम न्यायालय ने न्यायाधिकार बदलने को मंजूरी दे दी लेकिन यह भी साफ किया कि एनसीएलटी की संरचना ऐसी हो कि उसके न्यायिक सदस्य ही कंपनी कानून पर फैसला करें। संक्षेप में, न्यायालय ने इस प्रस्ताव को शर्तों में बांध दिया, न्यायाधिकार में परिवर्तन के लिए ढांचे को काट-छांट दिया और सुरक्षात्मक उपाय किए। अब इस न्यायाधिकार को सीधे कंपनी मंत्रालय को देने का प्रस्ताव उच्चतम न्यायालय की इस मंजूरी के आधार से सीधे टकराव की स्थिति पैदा करेगा। इस तरह का कदम विभिन्न कारणों से बुद्धिमानी भरा फैसला नहीं होगा। 
 
पहला, जब एक अदालत कंपनियों के विलय एवं अधिग्रहण संबंधी प्रस्तावों पर विचार करती है तो वह समग्र रूप से पूरी जनता को सुनती है क्योंकि इस प्रस्ताव से उस कंपनी के स्वरूप में बदलाव आ जाएगा। कंपनी भी समाज के साथ जुड़ी हुई एक कृत्रिम वैधानिक इकाई है। ऐसे में बाकी समाज के साथ संपर्क रखने वाली किसी इकाई के चरित्र में बदलाव होता है तो किसी प्राधिकरण द्वारा उस बदलाव की समीक्षा किए जाने की जरूरत होती है और वह प्राधिकरण ऐतिहासिक रूप से उच्च न्यायालय ही रहा है। नए कंपनी कानून के लागू होने के बाद से एनसीएलटी ने उच्च न्यायालयों का यह न्यायाधिकार अपने पास ले लिया था। अदालत या अधिकरण को समाज से उठने वाली तमाम आपत्तियां सुननी होती हैं और अन्य वैधानिक संस्थाओं और विभागों से मिली सूचनाओं को भी ध्यान में रखना होता है।
 
लेकिन अब किसी सरकारी एजेंसी के लिए प्रस्तावित योजना को लेकर आपत्ति जताने का कोई फायदा नहीं रह गया है। लंबे समय से विभिन्न विभाग किसी विलय-अधिग्रहण योजना पर अनमने ढंग से अनापत्ति देते थे या अगर आपत्ति करते भी थे तो उनका आधार काफी कमजोर हुआ करता था। उच्च न्यायालय उन आपत्तियों पर गौर करते थे और सरकार के कामकाज से अवगत होने के बाद उन आपत्तियों को नकारने या स्वीकार करने पर निर्णय करते थे। मसलन, आयकर विभाग अदालत का ध्यान इस ओर दिलाता था कि वही लेनदेन अन्य साधनों से होने की स्थिति में सरकार को अधिक राजस्व मिला रहता। उच्च न्यायालय इन पर नियमित रूप से गंभीरता से निर्णय देते रहे हैं जो एक संवैधानिक अदालत ही कर सकती है। 
 
यह शक्ति एनसीएलटी को दिए जाने के बाद सरकारी विभागों की तरफ से उठाई जाने वाली आपत्तियों का आकलन कर पाना अधिक मुश्किल हो गया। मसलन, आयकर विभाग की तरफ से लेनदेन संरचना पर उठाई जाने वाली आपत्ति को न्यायालय यह कहते हुए खारिज कर देते थे कि सरकारी विभाग पसंदीदा ढांचे के बारे में निर्देश नहीं दे सकता है और यह संबद्ध पक्षों का विषय है। अदालतों ने बार-बार यह कहा है कि वे कंपनियों की बुद्धिमत्ता को कम नहीं आंकती हैं। लेकिन उच्च न्यायालयों का अधिकार एनसीएलटी को दिए जाने के बाद सरकारी विभागों की अनुमानित राजस्व क्षति के आकलन की सीमा बढ़ गई।
 
अब उसी तरह का काम कंपनी मंत्रालय के अधिकारियों को देकर गैर-न्यायिक दायरे में लाने की तैयारी है। इसका असर यह होगा कि विलय एवं अधिग्रहण की योजनाएं लटक जाएंगी और उन्हें मंजूरी मिलने में देरी होगी। हालांकि ऐसा बदलाव संवैधानिक रूप से अवैध नहीं होगा और न ही यह संवैधानिक रूप से सही ठहराने के लिए उच्चतम न्यायालय की तरफ से रखी गई शर्तों का ही उल्लंघन करेगा। फिर भी न्यायिक मस्तिष्क लगाने का दायित्व कोई न्यायिक प्रशिक्षण या अनुभव न रखने वाले सरकारी अधिकारियों को सौंपना निहायत भी बेवकूफी भरा कदम होगा। असल में, एनसीएलटी के अधिकार- क्षेत्र का अहम विषय एक सरकारी विभाग को देने से कारोबारी सुगमता सूचकांक में कुछ अतिरिक्त अंक मिल सकते हैं लेकिन जमीनी स्तर पर इसके नतीजे काफी बुरे होंगे।
 
ऐसा लगता है कि नीति-निर्माताओं को यह अहसास हुआ है कि ऋणशोधन एवं दिवालिया संहिता 2016 के तहत दायर मामले बढऩे से एनसीएलटी पर बोझ काफी बढ़ गया है। इसी तरह यह देखना तर्कसंगत है कि क्षेत्राधिकार में बदलाव इतना निर्बाध नहीं रहा है। अगर ये प्रस्ताव वाजिब हैं तो फिर हमें यह मानना होगा कि विलय संबंधी योजनाओं पर विचार का अधिकार उच्च न्यायालयों से लिया जाना एक गलती थी और उस गलती को सुधारने की जरूरत है। सुधार यही होगा कि उच्च न्यायालयों को दोबारा यह अधिकार दे दिया जाए, न कि न्यायिक मस्तिष्क का इस्तेमाल करने वालों में और गिरावट लाई जाए।
 
(लेखक अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)
Keyword: NCLT, नैशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी),
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