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लोकतांत्रिक संस्थान हैं जोखिम में

जोया हसन /  December 04, 2018

भाजपा ने अपने जनादेश का इस्तेमाल एक बहुसंख्यक राज्य तैयार करने में किया है। इस प्रक्रिया में उसने असहमति की गुंजाइश खत्म की है। विस्तार से बता रही हैं जोया हसन 

 
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) कांग्रेस पार्टी, सोनिया गांधी और भूतपूर्व राष्ट्रीय सलाहकार परिषद पर लगातार हमले करते हुए यह कहती आई है कि वे रिमोट कंट्रोल से सरकार चलाते थे और इस प्रकार उन्होंने राजनीतिक प्रक्रियाओं और सार्वजनिक संस्थानों को क्षति पहुंचाई है। इस आलोचना के बाद यह माना जाने लगा कि अगर भाजपा सत्ता में आई तो वह लोकतांत्रिक संस्थानों की पवित्रता और प्रभुता बहाल करेगी। परंतु अब लग रहा है कि इसका उलटा हुआ है। उसके कार्यकाल में सरकारी और गैर सरकारी दोनों तरह के संस्थान दबाव महसूस कर रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि सरकार अपनी प्रभुता मजबूत करने और संस्थानों पर वैचारिक नियंत्रण कायम करने के क्रम में रिश्तों का समायोजन करने में लगी है। आजादी के बाद से भारत की राजनीति ने केंद्रीय सहमति की व्यवस्था विकसित कर ली है। सन 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से ही यह सहमति टूटने लगी है। भाजपा ने अपने जनादेश का इस्तेमाल बहुसंख्यकवादी राज्य बनाने में किया है। इस प्रकार उसने लोकतंत्र को नए सिरे से परिभाषित करना शुरू किया। मोदी सरकार के प्रभाव के बीच संस्थानों की स्वायत्तता सवालों के घेरे में है। निर्वाचन आयोग, केंद्रीय जांच ब्यूरो, केंद्रीय सतर्कता आयोग, संघ लोक सेवा आयोग, भारतीय रिजर्व बैंक, मीडिया और विश्वविद्यालयों आदि को समझौतापरक बनना पड़ा है। असहमति की जगह घटी है। देश की उच्च ध्रुवीकरण वाली राजनीति में असहमति का अपराधीकरण किया जा रहा है। सरकार असहमति को देश को नुकसान पहुंचाने वाले कदम के रूप में प्रस्तुत कर रही है। मीडिया पर लगाम की बात भी सर्वज्ञात है।
 
विश्वविद्यालयों में भी यही हाल है। कई उच्च शिक्षा संस्थानों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विश्वस्तों की भर्ती की गई है, भले ही उनके पास जरूरी काबिलियत तक नहीं थी। यह पहला मौका नहीं था जब सत्ता ने अपने पसंदीदा लोगों को प्रभावशाली पदों से नवाजा हो। इसके बावजूद अतीत में अकादमिक संस्थाओं के प्रमुखों या सदस्यों का एक पेशेवर कद होता था लेकिन इस सरकार द्वारा पदस्थापित लोगों का रिकॉर्ड तो अत्यधिक निराश करने वाला है। उनके पास विशेषज्ञता और उपलब्धि के नाम पर कुछ नहीं है। इन नवनियुक्त लोगों ने अपने-अपने संस्थान में लोकतांत्रिक कार्य प्रणाली को खत्म करने में अहम भूमिका निभाई है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय इसका उदाहरण है।
 
अक्सर एजेंसियों और संस्थानों पर आरोप लगता है कि वे सरकार को ध्यान में रखते हुए काम कर रहे हैं। दो उदाहरण लेते हैं: निर्वाचन आयोग की भूमिका को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं जबकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस संस्थान की स्वायत्तता और स्वतंत्रता अत्यंत आवश्यक है। निर्वाचन आयोग ने सरकार द्वारा चुनावी चंदे की सफाई के लिए लाए गए इलेक्टोरल बॉन्ड को उचित ही अतीतगामी कदम ठहराया था लेकिन जल्दी ही उसने अपना मन बदलकर इसे सही कदम में उठाया गया कदम बताना शुरू कर दिया। जबकि यह स्पष्ट था कि ये बॉन्ड राजनीतिक फंडिंग को और अधिक अस्पष्ट बना रहे थे। निर्वाचन आयोग की प्रतिष्ठा को तब और अधिक झटका लगा जब उसने 2017 के अंत में गुजरात और हिमाचल विधानसभा चुनावों के लिए अलग-अलग तारीख घोषित की। आमतौर पर यहां एक साथ चुनाव होते आए थे। ऐसा करने से केंद्र और राज्य सरकारों को सत्ता विरोधी माहौल से निपटने वाली घोषणाएं करने में मदद मिली।
 
चुनाव आयोग ने दावा किया कि उसने गुजरात चुनाव की घोषणा में इसलिए देरी की ताकि चुनाव आचार संहिता से बाढ़ राहत का काम प्रभावित न हो। यह बात भरोसे लायक नहीं थी क्योंकि इस देरी का बाढ़ राहत से कोई संबंध नहीं था। इससे आशंका बढ़ गई कि संवैधानिक स्थिति को सीमित कर सत्ताधारी दल के राजनीतिक हित साधे जा रहे हैं। आरबीआई की स्वायत्तता को भी नुकसान पहुंचा। बीते कुछ वर्षों में वित्त मंत्रालय ने अक्सर बिना आरबीआई से मशविरा किए कई घोषणाएं कीं। नोटबंदी जैसा बड़ा फैसला भी बिना केंद्रीय बैंक से मशविरा किए लिया गया। बाद में आरबीआई को कागजी कार्रवाई करके यह दिखाना पड़ा कि नोटबंदी आरबीआई बोर्ड की मंजूरी से की गई। पूंजी भंडार को लेकर तथा छोटे और मझोले उपक्रमों को आसान ऋण को लेकर सरकार और आरबीआई के बीच टकराव बढ़ा। सरकार बैंकिंग संकट से निपटने के लिए आरबीआई के पूंजी भंडार का इस्तेमाल करना चाहती है। 19 नवंबर की बोर्ड बैठक के बाद भी यह तय नहीं हो सका है कि दोनों के बीच शांति कायम हुई है या केंद्रीय बैंक की पराजय हुई है। इस विवाद ने सरकार और आरबीआई के रिश्ते के तनाव को नए सिरे से सामने ला दिया। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अटल बिहारी वाजपेयी स्मृति व्याख्यान में इस बारे में कहा कि भारत देश किसी भी सरकार या संस्थान से बड़ा है। उन्होंने अफसोस जताया कि निर्वाचित सरकार को कमजोर करने के प्रयास किए गए और गैर निर्वाचित गैर जवाबदेह संस्थानों को अधिकार देने का प्रयास किया गया। निर्वाचित गैरनिर्वाचित की यह बहस ही छद्म और अलोकतांत्रिक है। गैरनिर्वाचित संस्थानों को नुकसान पहुंचाना देश के लोकतांत्रिक ढांचे को नुकसान पहुंचाना है। एक प्रमुख समाचार पत्र ने लिखा कि लोकतंत्र में राष्ट्र बनाम संस्थान जैसा कुछ नहीं होता। 
 
संस्थानों की स्वायत्तता को लेकर मोदी सरकार की असहजता को समझा जा सकता है क्योंकि यह उसकी अधिनायकवादी प्रवृत्ति पर अंकुश लगाते हैं। कई संस्थानों ने सरकार के विरुद्घ अपने अस्तित्व को बचाना भी शुरू कर दिया। वर्ष 2019 के आम चुनाव करीब आ रहे हैं और राजनीतिक परिदृश्य बदल रहा है। ऐसे में कई संस्थानों को लग रहा है कि सरकार बदल सकती है। उनके भीतर प्रतिरोध का साहस पैदा हुआ है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कांगे्रस ने संस्थानों को कमजोर करने की शुरुआत की थी। इंदिरा गांधी ने अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा के चलते पार्टी, संसद, नौकरशाही, न्यायपालिका, राष्ट्रपति पद और यहां तक कि भारतीय लोकतंत्र जैसे संस्थान को नुकसान पहुंचाया। प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के कद के अधीन संस्थानों को और भी नुकसान पहुंचा है। इसके पीछे सीधा तर्क यह है कि एकमात्र वैध प्राधिकार सत्ताधारी दल का नेता है। ऐसे में स्वायत्त और स्वतंत्र संस्थानों को उनका विरोधी मानना निश्चित है। परंतु संस्थानों को क्षति पहुंचाकर या राजनीतिक नेताओं की वैचारिकता को बढ़ावा देकर लोकतंत्र को मजबूत नहीं किया जा सकता। भाजपा की इन कोशिशों से उन संस्थानों की स्थिरता को खतरा उत्पन्न हो गया है जो देश ने दशकों में तैयार किए हैं। इससे लोकतंत्र को बढ़ा नुकसान पहुंचेगा। नेताओं को यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए ये संस्थान आवश्यक हैं। 
 
(लेखिका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के राजनीतिक अध्ययन केंद्र की अवकाशप्राप्त प्रोफेसर हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: congress, rahul gandhi, BJP, narendra modi, court, election,,
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